अजित पवार जिस तरह से अपने समर्थक विधायकों और पार्टी के दिग्गज नेताओं के साथ भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार में शामिल हुए हैं, उसकी भनक भी लीडरशिप को नहीं लग पाई।
दो दिन पहले तक शरद पवार कह रहे थे कि 2019 में उन्होंने बीजेपी को जांचने के लिए समर्थन देने पर गुपचुप बात की थी और शपथग्रहण से ठीक पहले पीछे हटना उनकी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन, अब अजित पवार ने जिस तरह से उनको झटका दिया है, उसके बाद सवाल है कि बुजुर्ग पवार के पास विकल्प क्या बच गए हैं?
नगालैंड की तरह मजबूरी वाला समर्थन?
इस साल नगालैंड विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह से एनडीपीपी और बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी, उससे लग रहा था कि 7 विधायकों वाली एनसीपी ही मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में रहेगी। लेकिन, राज्य के सियासी हालातों के बीच एनसीपी ने एनडीपीपी और बीजेपी गठबंधन सरकार को समर्थन देने का फैसला किया।
तब एनसीपी चीफ शरद पवार ने पार्टी के फैसले पर सफाई दी कि, वह नगालैंड के सीएम नेफ्यू रियो को समर्थन दे रहे हैं, जो एनडीपीपी के हैं, न कि बीजेपी को। यानी यहां पार्टी भाजपा के गठबंधन वाली सरकार को समर्थन भी दे रही है, लेकिन राजनीतिक तौर पर बीजेपी से दूर रहने की भी बात कह रही है।
एनसीपी का अस्तित्व बचाने के लिए ‘सरेंडर’ करेंगे?
शपथग्रहण के बाद उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने दावा किया है कि पार्टी के ज्यादातर सांसद और विधायक उन्हीं के गुट के साथ हैं। इस आधार पर उन्होंने यह भी दावा किया है कि पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी उन्हीं के साथ रहेगा। वहीं छगन भुजबल ने भी कहा है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे सरकार को एनसीपी के तौर पर ही समर्थन दिया है। ऐसे में शरद पवार के पास पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए एक विकल्प यह हो सकता है कि वह धारा के साथ बह जाएं और भतीजे के सामने ‘सियासी सरेंडर’ कर दें!
उद्धव की तरह ही पवार भी लड़ेंगे पार्टी पर कब्जे की लड़ाई?
शरद पवार के पास एक विकल्प अब विधानसभा स्पीकर से लेकर लोकसभा स्पीकर तक जाने का भी हो है। यह रास्ता अगर लंबा हुआ तो वह चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक में भी जा सकते हैं। लेकिन, लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अब एक साल से भी कम का समय बचा है, इसे देखते हुए इसपर जल्द कोई फैसला आने की संभावना कम है।
उनके नए राजनीतिक मित्र उद्धव ठाकरे भी अभी अपनी पार्टी के लिए चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि, उन्हें फिलहाल चुनाव आयोग से बड़ा झटका लग चुका है और सुप्रीम कोर्ट से भी कोई खास झुनझुना नहीं मिला है। शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह पर चुनाव आयोग ने सीएम एकनाथ शिंदे गुट का दावा मंजूर किया है। और विधायकों की अयोग्यता का मामला विधानसभा अध्यक्ष के पास फैसले के लिए लंबित है।
जनता की अदालत में जाने का विकल्प
लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं, इसको देखते हुए मराठा नेता पवार अपने पास बचे हुए संगठन और कार्यकर्ताओं के दम पर ही चुनाव मैदान में जाने का फैसला ले सकते हैं। अगर राजनीतिक सहानुभूति के दम पर उन्होंने चुनावी मैदान में बाजी मार ली और भतीजे को पटखनी दे पाए तो अपनी बेटी सुप्रिया सुले के लिए एक सफल सियासी विरासत छोड़ सकते हैं।
सक्रिय राजनीति से संन्यास
शरद पवार जिंदगी के 82 बसंत देख चुके हैं। पिछले महीने ही उन्होंने एनसीपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर होने की इच्छा का भी संकेत दिया था। हालांकि, बाद में पार्टी के राजनीतिक घटनाक्रम में उन्होंने इस्तीफा वापस लेने का फैसला किया। वह अपनी बेटी सुप्रिया सुले और सहयोगी प्रफुल्ल पटेल को आगे की राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी शुरू भी कर दी है। हो सकता है कि उम्र के इस पड़ाव पर और ज्यादा सियासी फजीहत झेलने से बचने के लिए वह सियासी संन्यास का विकल्प चुन लें?






