साथियों
कॉकरोचों की यह छटपटाहट
मुझे आश्चर्यचकित कर रही थी
यहाँ तक कि मैं स्वयं भी
धर्मेन्द्र प्रधान के प्रति सख्त था
और कुछ छूट देने के लिए तैयार नहीं था
वह व्यक्ति असफल रहा है
उसकी समीक्षा और जाँच-पड़ताल होना स्वाभाविक ह
किन्तु तभी..
एक प्रश्न सामने आया
इतनी बेचैनी क्यों ?बोस्टन क्यों ? जर्मनी क्यों ?
और अभी ही क्यों ?
6 जून 2026 में ही क्यों ?
तब मैंने गहराई से पड़ताल शुरू की
जो कुछ मेरे सामने आया
उसका प्रश्नपत्र-लीक से बहुत कम सम्बन्ध था
उसका सम्बन्ध धन से था
बहुत अधिक धन से..
प्रधान की मेज़ पर तीन निर्णय रखे हुए थे
सभी जुलाई–अगस्त 2026 के लिए निर्धारित
और तीनों में..
भारतीय शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप बदल देने की क्षमता थी
निर्णय 1
एनसीईआरटी
नई पाठ्यपुस्तकें.. कक्षा 9 से 12 तक
नए गणित पाठ्यक्रम में..
शुल्ब सूत्रों को सम्मिलित किया गया है
एक ख़तरनाक विचार
क्योंकि यह भारतीय बच्चों को वह बात बताता है
जिसे बहुत-से लोग छिपाए रखना चाहते हैं !!
कि गणित यहीं जीवित था
उस समय भी..
जब यूरोप ने अभी इस कथा पर
अपना स्वामित्व स्थापित नहीं किया था
नया इतिहास पाठ्यक्रम
इससे भी आगे जाता है
आर्य आक्रमण सिद्धान्त
बाहर..
सिंधु–सरस्वती सभ्यता
अंदर..
भारत की अपनी कहानी
भारत को वापस लौटाई गई
निर्णय 2
15 मई, 2026
सीबीएसई..
एक परिपत्र जारी करता है
कक्षा 9 से तीन भाषाएँ अनिवार्य
जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएँ हों
निर्णय 3
एनटीए के लिए के.राधाकृष्णन समिति के सुधार..
विकेन्द्रीकृत परीक्षाएँ
प्रौद्योगिकी-संप्रभु संरचना
न कोई एकमात्र
विफलता-बिन्दु
न कोई एकमात्र
हेरफेर-बिन्दु
अब वास्तविक प्रश्न पूछिए
यदि ये तीनों निर्णय लागू हो जाएँ..
तो सबसे अधिक नुकसान किसका होगा ?
शुरुआत अकादमिक जगत से कीजिए
हार्वर्ड का एसओएएस, लंदन का, कोलंबिया का,
शिकागो का !!
वे विभाग..
जिनकी बुनियाद ही..
आर्य प्रवासन सिद्धान्त पर टिकी हुई है
वार्षिक अनुदान दाँव पर लगे हैं !!
लगभग 500 मिलियन डॉलर !!
फिर विदेशी विश्वविद्यालय..
ब्रिटेन.. अमेरिका.. ऑस्ट्रेलिया..
ये सभी मिलकर
भारतीय विद्यार्थियों से
प्रतिवर्ष लगभग 3.7 अरब डॉलर अर्जित करते हैं
करीब 18 लाख विद्यार्थियों से
भारत की शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ कर दीजिए
आत्मविश्वास का निर्माण कर दीजिए
स्वाभिमान को पुनर्स्थापित कर दीजिए
इतने मात्र से..
विद्यार्थियों की वह धारा सिमटना शुरू हो जाएगी
इसके बाद आते हैं
कोचिंग इंडस्ट्री
चिंता पैदा करो
आशा बेचो
और यही चक्र..
दोहराते रहो
आज इसका मूल्य लगभग 58,000 करोड़ रुपये है
और 2028 तक इसके
1,33,995 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है
यह अभाव पर आधारित है
यह अंग्रेज़ी-प्रधान परीक्षाओं पर आधारित है
एनटीए का विकेन्द्रीकरण कर दीजिए
भारतीय भाषाओं का विस्तार कर दीजिए।
इतने मात्र से..
इनकी आर्थिक संरचना डगमगाने लगती है
एलन.. आकाश.. फिटजी.. बायजूज़.. रेज़ोनेंस..
दृष्टि आईएएस..
और ऐसे ही हज़ारों छोटे खिलाड़ी
वैश्विक निवेशकों ने
इस पूरे तंत्र में अरबों डॉलर झोंक दिए हैं
दान के लिए नहीं
देशभक्ति के लिए नहीं
Balki प्रतिफल के लिए..
फिर आता है एनजीओ तंत्र
आक्रोश का उद्योग.. अनुदानों का चक्र..
एक ऐसा विमर्श
जो केवल तभी जीवित रह सकता है
जब भारत बौद्धिक रूप से आश्रित बना रहे
बच्चों को उनका अपना इतिहास पढ़ाइए..
सही और तथ्यपरक रूप में..
ऐसा होते ही..
उस विमर्श का दम घुटने लगता है
अनुदान कथाओं के पीछे चलते हैं
और कथाओं के साथ ही..
चले भी जाते हैं
इन सबको जोड़कर देखिए
संयमित अनुमान के अनुसार—
लगभग 3 लाख करोड़ रुपये दाँव पर लगे हैं
35 अरब डॉलर से भी अधिक
यह अस्तित्व और व्यवसाय बचाने की लड़ाई है
भारत..
जिस व्यवस्था को ध्वस्त करने जा रहा था
वास्तविक संघर्ष उसी को लेकर था
यही कारण है
कि मीम-कारखाने को अचानक नई ऊर्जा मिल गई !!
यही कारण है
कि विरोध-प्रदर्शन “6 जून” को उतरता है
शैक्षणिक सत्र आरम्भ होने से पहले
सुधारों के अपरिवर्तनीय बनने से पहले
प्रधान जाएँ या न जाएँ
संभव है
उन्हें जाना चाहिए
यह एक अलग बहस है
किन्तु वास्तविकता..
युद्धभूमि नीतियाँ हैं
हमेशा से थीं
अधिकांश लोग..
अभी भी केवल सुर्खियाँ देख रहे हैं
और युद्ध को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं !!
🙏🙏……साभार…… 🙏🙏






