चारा घोटाला स्वतन्त्र भारत के बिहार राज्य का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार घोटाला था जिसमें पशुओं को खिलाये जाने वाले चारे के नाम पर 950 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से फर्जीवाड़ा करके निकाल लिये गये।सरकारी खजाने की इस चोरी में अन्य कई लोगों के अलावा बिहार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री लालू प्रसाद यादव व पूर्व मुख्यमन्त्री जगन्नाथ मिश्र पर भी आरोप लगा। इस घोटाले के कारण लालू यादव को मुख्यमन्त्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।
पशुओं को खिलाये जाने वाले चारे के नाम से सरकारी खजाने का पैसा का गबन किया गया।
चारा घोटाले में दोषी पाये जाने वाले लोगों में लालू प्रसाद यादव सबसे प्रमुख व्यक्ति हैं।
लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस मुद्दे को उठाया गया और सीबीआई जाँच की माँग की गयी। इस गबन की गूँज न सिर्फ़ भारत में बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन में भी सुनायी दी जिससे भारत की राजनीति बदनाम हुई। हालांकि यह घोटाला 1996 में हुआ था लेकिन जैसे-जैसे जाँच हुई इसकी पर्तें खुलती गयीं और लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र जैसे कई सफेदपोश नेता इसमें शामिल नजर आये। मामला लगभग दो दशक तक चला। मीडिया ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जिसके चलते सीबीआई और न्यायपालिका अपनी-अपनी कार्रवाई में कोई कोताही नहीं कर पायी
1998 में लोकसभा के चुनाव चल रहे थे. तारीख 1 जनवरी. रात के करीब साढ़े 8 बजे. आगरा में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की रैली हो रही थी. रैली में अटल बिहारी वाजपेयी एक किंवदंती सुनाते हैं, कहते हैं दिल्ली में थोड़े दिन पहले एक गाय कचहरी में पहुंच गई, पुलिस वालों ने बहुत रोका, गाय नहीं मानी. मेरी सुनवाई होनी चाहिए. मुझे मजिस्ट्रेट के सामने जाने दो. पुलिस वाले क्या करते बेचारे. वो भी गाय का दूध पीते हैं. उन्होंने कहा जाओ. गऊ माता जाओ. गाय पहुंच गई मजिस्ट्रेट के सामने. मजिस्ट्रेट हक्का बक्का रह गया. ये कैसा मुजरिम है या गवाह है ? ये माजरा क्या है ? फिर भी उन्होंने पूछा कहिए, आपको क्या कहना है ? वो कहती हैं- मैं बाहर चर्चा सुनती हूं कि जो भी चारा खाता है, वो पकड़ा जाता है. चारा..मुकदमा चलता है, जेल भेजा जाता है. मैं तो चारा ही चारा खाती हूं, इसलिए मुझे डर है कहीं पुलिस वाले मुझे पकड़ ना लें. इसलिए मैं अग्रिम जमानत के लिए आई हूं, एंटीसिपेट्री बेल के लिए आई हूं. अगर पुलिस वाला कोई पकड़ ले तो मैं बता हूं कि ये देखो मैं जमानत पर हूं. चारा मैंने खाया है, मगर मैं जमानत पर हूं.
अटल बिहारी वाजपेयी का अपना अंदाज था. लालू यादव का नाम भी नहीं लिया और पूरी तरह निशाने पर बांध दिया. चारा घोटाले का मामला तब नया-नया था, घोटाले का आरोप लालू यादव पर लगा था. दबाव बढ़ा तो 1997 की जुलाई में लालू यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. अपनी जगह पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया. तब का दिन और आज का दिन है. करीब 25 साल बीतने को हैं. मगर चारा घोटाला लालू यादव का पीछा नहीं छोड़ रहा है. आलम ये है कि लालू यादव का जेल-बेल के खेल से एक अटूट रिश्ता सा हो गया है.
आज भी चारा घोटाले के एक मामले में रांची की CBI स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया. लालू यादव को डोरंडा कोषागार से अवैध निकासी के मामले में दोषी करार दिया गया. घोटाले से जुड़ा ये 5वां मामला है, जिसमें RJD के संस्थापक लालू यादव दोषी पाए गए . इस मामले में कुल 99 आरोपी थे. जिसमें 20 आरोपी कोर्ट से बरी हो गए, 36 को जुर्माने के साथ 3 साल की सजा सुनाई गई. कुछ का देहांत हो चुका है. लालू यादव समेत बाकियों की सजा का ऐलान 21 फरवरी को होगा. लालू अभी बाकी मामलों जमानत पर थे. अब सजा की अवधि के साथ तय होगा कि लालू यादव को फिर जेल जाना पड़ेगा या नहीं. हालांकि दोषी साबित होते ही लालू यादव को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. मगर जेल नहीं भेजा गया. उनकी स्वास्थ्य हालत को देखते हुए फिलहाल रांची के ही रिम्स अस्पताल में उन्हें रखा गया है.
ये तो रहा आज का अपडेट मगर कईयों के मन में सवाल हो सकता है कि आखिर चारा घोटाला एक है, तो लालू यादव को बार-बार सजा क्यों हो रही है ? पहले जो सजा हुई उसका क्या ? जिन मामलों में जेल काट चुके हैं, उससे ये अलग कैसे है ? तो जरा अब तफसील से समझिए. साल 1990 से 92 के बीच चारा घोटाला हुआ, जब बिहार और झारखंड एक ही थे. तब के जमाने में चारा खरीद को लेकर कुल साढ़े 9 सौ करोड़ रुपये का गबन किया गया. गाय-भैंस को खिलाए जाने वाले चारा को खरीदा तो गया, मगर सिर्फ फाइलों में. मतलब चारे का पैसा खा लिया गया. जानवरों के मुंह का निवाला भ्रष्टचार के मुंह ने निगल लिया. देश विदेश में इसकी खूब फजीहत हुई.
धीरे-धीरे चारे के भूंसे से उठा गुबार बतौर मुख्यमंत्री रहे लालू यादव की आंखों तक पहुंचने लगा. पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा का भी आरोपी बने, बाद में वो बरी हो गए. मगर लालू यादव पर शिकंजा कसता चला गया. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद 30 जुलाई 1997 को लालू यादव पहली बार जेल गए.
इसके बाद घोटाले की फाइल मोटी होती चली गई, अलग-अलग जिलों के कोषागार यानी ट्रेजरी से अवैध तरीके से पैसा निकाला गया . जिसमें कुल 5 मामले बने. अब जरा पांचों मामलों को बारी-बारी से समझ लीजिए.
केस नं.1
चाइबासा कोषागार मामला, जिसमें 37.7 करोड़ रुपये निकाले गए थे. इस मामले में 30 सितंबर, 2013 को लालू दोषी साबित हुए. लालू समेत 44 अभियुक्तों को पहली बार सजा हुई. वो भी 5 साल की. इसी के बाद लालू यादव की लोकसभा से सदस्यता रद्द हो गई थी. तब सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश आ चुका था, जिसके तहत 2 साल से अधिक सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाती है.
केस नं.2
साढ़े 84 करोड़ देवघर कोषागार से निकाले गए थे, इसमें भी लालू यादव का दोष साबित हुआ. 23 दिसंबर 2017 को साढ़े तीन साल की सजा हुई.
केस नं.
चाईबासा के ही कोषागार 33 करोड़ 67 लाख अवैध तरीके से निकालने का मामला. इसमें 24 जनवरी, 2018 को लालू यादव को फिर से 5 साल की सजा हुई.
केस नं.4
दुमका कोषागार मामला, जिसमें 3 करोड़ 13 लाख रुपये निकाले थे. इस मामले 19 मार्च 2018 को लालू को फिर सजा हुई. और इस बार सबसे बड़ी सजा हुई. 7 साल की. जिसमें लालू सबसे ज्यादा वक्त जेल में भी रहे
अब तक लालू चारा घोटाले के कुल मामले में लालू यादव 3 साल 19 दिन जेल में बीता चुके हैं. चूंकि आधी सजा पूरी हो गई थी, इसलिए मेडिकल ग्राउंड पर उन्हें हाईकोर्ट से जमानत भी मिल गई. अब आज केस नंबर 5 का भी फैसला आ गया. डोरंडा कोषागार मामला. जिसमें सबसे बड़ी 139 करोड़ रुपयों की अवैध निकासी हुई.
क्या है ये पूरा मामला ?
ये मामला भी 1990 से 92 के बीच का है. हुआ ये कि बिहार में अच्छी नस्ल के गाय पैदा करने के लिए दिल्ली और हरियाणा से 400 सांड मंगाए गए. CBI ने जांच में पाया कि अफसरों और नेताओं ने मिलकर फर्जीवाड़े का अद्भुत फॉमूर्ला तैयार किया.
हरियाणा और दिल्ली से कथित तौर पर स्कूटर और मोटरसाइकिल से सांड़ो को रांची लाया गया. यानी घोटाले में जिस गाड़ी नंबर को विभाग ने पशु को लाने के लिए दर्शाया था. वो मोटसाइकिल और स्कूटर के नंबर निकले. देश के सभी राज्यों के करीब 150 DTO और RTO से गाड़ी नंबर की जांच करा CBI ने ये सबूत जुटाए. 15 साल 575 गवाहों की गवाही दर्ज कराने में लग गए. मुख्यंमंत्री के नाते लालू यादव की भी इसमें संलिप्तता पाई गई. दोषी करार हुए अब सजा की बारी है.
सरकारी वकील खुश हैं. कहते हैं मेहनत सफल हुई. जब कोर्ट में सुनवाई चल रही थी तो रांची में समर्थकों का भारी जमावड़ा था. उम्मीद थी कि कोर्ट से उन्हें राहत मिलेगी. मगर कोर्ट भावनाओं नहीं सबूतों और गवाहों के मद्देनजर फैसला सुनाता है. फैसला आया तो RJD के खेमे में मायूसी छा गई. लालू यादव पर फिर से जेल जाने की तलवार लटक रही है.
जानकार बताते हैं कि अगर बाकियों की तरह ही 3 साल की सजा मिली तो तत्काल जमानत हो जाएगी. 5 साल की जेल हुई तो पहले काटी गई सजा के बिना पर बेल हो जाएगी. लेकिन 6 साल से ऊपर की सजा हो गई तो लालू यादव को फिर से जेल जाना पड़ सकता है.
हाईकोर्ट में बेल के लिए चक्कर लगाना पड़ सकता है.अब आगे इस पर लालू यादव के वकील क्या करेंगे ?
उन्होंने बताया
अगली डेट फरवरी 21की मिली है. हम इसमें पॉइंट ऑफ़ सेंटेंस में आर्गुमेंट करेंगे. उसके बाद जजमेंट हमारे सामने आएगा. इसके बाद हाई कोर्ट जाएंगे.
ये तो रही कोर्ट कचहरी की बात. लालू यादव तो देश के बड़ी सियासी शख्सियत हैं. तो इस पर सियासी प्रतिक्रियाएं भी अपरिहार्य हो गईं.
RJD नेताओं की लालू यादव के प्रति निष्ठा है तो मायूसी भी स्वाभाविक है. मगर लालू के धुर विरोधी सुशील मोदी और JDU के नेता इसे अलग चश्मे से देखते हैं.
लालू प्रसाद यादव, जिनके बिना बिहार की सियासत अधूरी मानी जाती है. कभी नारा लगता था जब तक रहेगा समूसे आलू, तब रहेगा बिहार में लालू. पुराने लोगों ने तो वो दौर भी देखा है जब सामाजिक न्याय की धुरी लिए लालू हाथी पर बैठकर प्रचार किया करते थे. मगर चारा घोटाले उन्हें हाथी से उतारकर पहले कोर्ट के कटघरे, फिर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. दिन भर कोर्ट के फैसले पर सोशल मीडिया पर भी चर्चा होती रही. विरोधियों भ्रष्टाचार पर नकेल बताया तो समर्थकों की तरफ से हमदर्दी भी खूब देखने को मिली. उनके अच्छे स्वास्थ और लंबी उम्र के लिए दुआएं की गई. मगर अब सबकुछ 21 फरवरी के कोर्ट के फैसले पर निर्भर है.





