2 सब्जी बेचने वाले थे , एक का नाम था डॉलर , दूसरे का नाम था रुपेया
डॉलर आलू बेचा करता था और रुपेया टमाटर
आलू का भाव 20 रु किलो हुआ करता था और टमाटर का भी 20 रु
दोनों आपस मे आलू टमाटर 20 रु के हिसाब से एक दूसरे से ले लिया करते थे ताकि 2 सब्जी बेच सके
एक साल टमाटर की फसल कीड़े लगने से खराब हो गयी , और बाजार मे अच्छे टमाटर मिलना बंद हो गए , खराब क्वालिटी के होने के कारण अब टमाटर 10 मे बिकने लगा |
रुपेए को अब डॉलर को 1 किलो आलू के बदले मे 2 किलो टमाटर देने पड़ते थे |
यहा डॉलर वैसा ही है , रुपया कमजोर हो गया है और उसके कारण डॉलर मजबूत दिख रहा है
दूसरे साल टमाटर की फसल सामान्य रहती है और टमाटर का भाव वापस 20 रु किलो हो जाता है | लेकिन इस साल एक बड़े राज्य मे आलू की पैदावार नहीं हुई , जिसके कारण आलू की अवाक मे बहुत कमी आ गयी और आलू उसके कारण 40 रु किलो बिकने लगा
आलू 40 , टमाटर 20
अब रुपेए को 2 किलो टमाटर देकर एक किलो आलू लेना पड़ता है
यहा टमाटर कमजोर नहीं हुआ है, आलू मजबूत हो गया है
रुपेया कमजोर नहीं हुआ है , लेकिन डॉलर मजबूत हो गया है और इसके कारण रुपेया कमजोर दिख रहा है
बस येही फर्क है मनमोहन सिंह और मोदी के समय की रुपे की कमजोरी का
मनमोहन सिंह के समय रुपेया कमजोर हो रहा था , क्योकि महगाई 12% थी , फोरेक्स रिजर्व खाली हो रहा था, नोट छाप के किसानो के कर्ज चुकाए जा रहे थे , एफ़डीआई इनवेस्टमेंट नहीं हो रहा था , जीडीपी ग्रोथ कम होती जा रही थी
मोदी का समय महगाई बाकी देशो से सबसे कम, मजबूत फोरेक्स रिजर्व , कोई नोट छपाई नहीं , सर्वोच ऊंचे स्तर का एफ़डीआई आ रहा है , जीडीपी ग्रोथ दुनिया मे सबसे ज्यादा
लेकिंन अमेरिका मे बहुत ऊंची ब्याज दर , जिसके कारण डॉलर की सप्लाइ कम हो रही है , जिसके कारण डॉलर महगा हो रहा है
जिसको ये समझ मे नहीं आ रहा , उसको निर्मला सीतारमन की बात भी समझ मे नहीं आएगी ,
यूरोप की सरकारे , मनमोहन सिंह की स्टाइल वाली घटिया आर्थिक नीति पर चल रही है
करोना के बाद से लोन की सरकारी गारंटी मे भारी भरकम इजाफा हो रहा है
2020 के बाद के लोन
जर्मनी के 40% लोन सरकारी गारंटी के है, फ़्रांस के 70%
इटली के तो पूरे 100% ही है
अगर आप बैंक वाले हो आपको लोन देना है तो आप ठोक बजा के ही दोगे ,
पर अगर लोन पर सरकारी गारंटी मिले , तो एसे ही दोगे
डिफौल्टर के पैसे सरकार भरेगी
सरकारी गारंटी , राजनीतिक फायदे के हिसाब से मिलती है
मनमोहन सिंह के समय सब को लोन मिल रहा था, इस लोन से बड़ा इनवेस्टमेंट भी हो रहा था , जो बीच मे डिफ़ाल्ट करे उसके लोन को फिर से फ़ाइनेंस भी करवा देते थे , जैसे नीरव मोदी का 5 बार करवा दिया |
सरकारी बैंक की लोन बुक 20% से ग्रो हो रही थी |
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इस नीति के 2 नुकसान होते है , पैसा आसानी से मिल रहा है तो वो इनवेस्टमेंट भी होने लगता है , जो नहीं होना चाहिए , एरा गैरा भी बिज़नसमेन होने लगता है |
मनमोहन सिंह के समय हर कोई बिल्डर बन रहा था
दूसरा नुकसान महगाई बढ़ती है
तीसरा सबसे बड़ा नुकसान होता है एनपीए ब्लास्ट जो 5-15 साल मे होता है | फिर आपके बैंक ही दिवालिया होते है
जब सरकारे इस नीति पर चलती है तो वो महगाई को बढ्ने देती है , महगाई अगर बढ़ रही है , तो बिना टैक्स बढ़ाए ही , टैक्स की आय बढ़ जाती है |
सरकार को भी डिफ़ाल्ट के पैसे देने होंगे इसलिए आय बढ़ाना भी जरूरी होता है |
इसलिए मनमोहन सिंह के समय महगाई 10% के ऊपर ही रही
मनमोहन सिंह गए तो एनपीए बम फटा , कई कॉर्पोरेट कंगाल हो गए
सरकारी बैंक दिवालिया हो गए , जिनको रीकैपिटलाइज करके जिंदा किया गया
मोदी की किस्मत अच्छी थी की कोममोडिटी के भाव उस समय आधे हो गए थे , वरना देश दिवालिया ही था , आईएमएफ़ के सामने भीख मांगने बस जाना ही था
यूरोप मे अब येही शुरू हो गया है , पर यहा से थोड़ा अनुशाशन मे हो रहा है , मनमोहन सिंह की तरह भ्रष्ट तरीके से नहीं
ये सब भारत के लिए अच्छा है , पहले चाइना+1 हो रहा था , अब यूरोप+1 भी
(courtesy abhishek shukla)






