Tuesday, May 5, 2026
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सोनिया मनमोहन सरकार में ही NPA हो गया था ABG शिपयार्ड,,11 हज़ार करोड़ फिर मील थे 2013 में

 

सीबीआई (CBI) ने एबीजी शिपयार्ड (ABG Shipyard) और उसके निदेशकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. एबीजी शिपयार्ड और उसके निदेशकों पर कथित तौर पर 28 बैंकों के साथ फर्जीवाड़ा कर 22,842 करोड़ रुपये हड़पने का आरोप है. इस कंपनी ने जिन बैंकों को चूना लगाया है, उनमें देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और सबसे बड़े प्राइवेट बैंक आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) के भी नाम हैं. रिपोर्ट के मुताबिक सीबीआई की जांच के घेरे में आया यह सबसे बड़ा बैंक फ्रॉड केस है. जांच एजेंसी ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए एबीजी शिपयार्ड कंपनी, उसके पूर्व चेयरमैन और प्रबंध निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल पर केस दर्ज किया है.
आरोप में कहा गया है कि शिपयार्ड कंपनी ने बैंकों के कंसोर्टियम (आसान भाषा में बैंकों का समूह कह सकते हैं) के साथ धोखा किया और करोड़ों रुपये गबन कर लिए गए. पहले यह खबर आई कि बैंकों का कंसोर्टियम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अगुआई में बनाई गई और कंपनी को लोन दिए गए. हालांकि रविवार को समाचार एजेंसी ANI ने SBI के हवाले से एक ट्वीट में लिखा, ‘आईसीआईसीआई बैंक के नेतृत्व में 2 दर्जन से अधिक बैंकों के कंसोर्टियम व्यवस्था के तहत फाइनेंस किया गया. कंपनी के खराब प्रदर्शन के कारण उसका खाता नवंबर 2013 में एनपीए बन गया. कंपनी ऑपरेशन को फिर से चलाने के लिए कई प्रयास किए गए लेकिन सफल नहीं हो सके.”

क्या कहा SBI ने

SBI ने कहा है कि जिस कंसोर्टियम से एबीजी शिपयार्ड को लोन या पैसा मिला, उस कंसोर्टियम का लीडर आईसीआईसीआई बैंक था जबकि आईडीबीआई दूसरे नंबर पर नेतृत्व करने वाला बैंक था. चूंकि स्टेट बैंक इस कंसोर्टियम है और सबसे बड़ा सरकारी बैंक होने के नाते ही उसने सीबीआई में केस दर्ज कराया. इस मामले में पहला केस नवंबर 2019 में दर्ज कराया गया था और तब से लेकर अभी तक सीबीआई और बैंकों के बीच लगातार संपर्क बना हुआ है.

क्या है पूरा मामला

स्टेट बैंक ने कहा है कि शिपयार्ड कंपनी को पुन: खड़ा करने की कई कोशिशें की गईं. सीडीआर मेकेनिज्म के तहत मार्च 2014 में उसे री-स्ट्रक्चर किया गया. कंसोर्टियम के सभी बैंकों ने इसमें भाग लिया. लेकिन चूंकि शिपिंग इंडस्ट्री लगातार गिरावट में है, इसलिए कंपनी को जीवित नहीं किया जा सका. एसबीईआई के मुताबिक, शिपयार्ड कंपनी ने अपने सबसे बुरे दिन दिखे और उसके ऑपरेशन को दोबारा जिंदा नहीं किया जा सका. कंपनी की री-स्ट्रक्चरिंग फेल होने के बाद इसका खाता जुलाई 2016 में एनपीए में चला गया. इस केस में फ्रॉड का जो भी मामला है वह फंड के डायवर्जन को लेकर है. बैंकों का भरोसा तोड़ने का है.
ऋषि कमलेश अग्रवाल के अलावा, एजेंसी (केंद्रीय जांच ब्यूरो या CBI) ने तत्कालीन कार्यकारी निदेशक संथानम मुथास्वामी, निदेशक अश्विनी कुमार, सुशील कुमार अग्रवाल और रवि विमल नेवेतिया और एक अन्य कंपनी एबीजी इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को भी आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आधिकारिक दुरुपयोग के कथित अपराधों के लिए केस में नाम शामिल किया है.

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