जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: जानिए कैसे अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।
उन्होंने कहा कि आरक्षण इनलोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।
नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।
उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एकमात्र व्यवहार्य समाधान है।”
दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।
संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”
1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।
इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।
अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध
संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।
आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।
संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”
जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।
पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए
पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।
भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।
गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद
महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।
उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।
पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान
24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।
अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।
हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।
भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।
हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।
समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।
बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।






