महाराष्ट्र में लाउडस्पीकर और हनुमान चालीसा पर राजनीति गरमा गई है. अमरावती से सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा ने सीएम उद्धव ठाकरे के आवास मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने का ऐलान किया है. इसके बाद भारी संख्या में शिवसैनिक नवनीत राणा के घर के बाहर जमा हो गए. बैरिकेड तोड़ दिए गए. पुलिस और शिवसैनिकों के बीच धक्कामुक्की की भी खबर है. आइए बताते हैं, राणा दंपति की जिंदगी और राजनीतिक सफर के बारे में.
रवि राणा और नवनीत राणा दोनों ही महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके से ताल्लुक रखते हैं. रवि बडनेरा से तीन बार के निर्दलीय विधायक हैं, जबकि नवनीत अमरावती (एससी) सीट से पहली बार सांसद चुनकर आई हैं. 36 साल की नवनीत और उनके पति युवा स्वाभिमान नाम की पार्टी चलाते हैं. अमरावती के शंकरनगर के मूल निवासी रवि राणा ने अमरावती कॉलेज से बीकॉम की डिग्री हासिल की है.
लाउडस्पीकर के बाद अब हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) को लेकर विवाद छिड़ गया है। अमरावती से निर्दलीय सांसद नवनीत राणा (Navneet Rana) ने सीएम उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के घर मातोश्री (MatoShree) के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने की जिद पकड़ ली। रोके जाने पर उन्होंने सवाल किया कि शिवसेना (Shivsena) को इससे दिक्कत क्या है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि शिवसेना हिंदू धर्म भूल गई है। इस पर शिवसेना सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने पलटवार करते हुए कि यह सब दिखावे की राजनीति नहीं है। नवनीत मातोश्री ना पहुंचे, इसके लिए वहां सुरक्षाबलों की तैनाती की गई। यही नहीं, नवनीत राणा के घर के बाहर शिवसैनिकों ने भारी हंगामा किया। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कभी कट्टर हिंदूत्व पार्टी कही जाने वाली शिवसेना इतना डरी हुई क्यों है? क्या उद्धव की डर वजह कुछ और है?
महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे जिस तरह से संभलकर चल रहे, उससे तो यही लग रहा कि वे कोई भी कदम जल्दबाजी में नहीं उठाएंगे। शिवसेना पार्टी के संस्थापक बाला सहब ठाक (Bal Thackeray) तो खुलेआम कहते हैं थे कि वे कट्टर हिंदू समर्थक हैं और ऐसे मामलों पर उन्होंने कभी भी बोलने से गुरेज नहीं किया। बाबरी ढांचा ढहाये जाने की जिम्मेदारी किसी दल ने नहीं ली। लेकिन बाला साहब ने कहा था कि हमारे लोगों ने ये गिराया है और मुझे उसका अभिमान है। उन्होंने एक समय यहां तक कह दिया था कि अब हिंदू अब मार नहीं खाएंगे, उनको हम अपनी भाषा में जवाब देंगे। फिर उद्धव क्यों डर रहे?
सरकार गिरने का डर?
महाराष्ट्र में इस समय एनसीपी, कांग्रेस और शिसवेना की सरकार है। सीएम हैं उद्धव ठाकरे। बीजेपी उद्धव को सीएम नहीं बनाना चाहती थी। ऐसे में उन्होंने एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। लेकिन पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र की राजनीति में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। एनसीपी के मुखिया शरद पवार कई मौकों पर सरकार की खिलाफत कर चुके हैं। उन्होंने विधायकों को आवास देने का खुलकर विरोध किया। उद्धव की दूसरी सबसे बड़ी परेशानी है कांग्रेस।
महाराष्ट्र कांग्रेस के विधायक उद्धव से नाराज हैं। कांग्रेस के 45 में से 25 विधायक सरकार की कार्यशैली से नाराज हैं। इसकी शिकायत पहले तो उन्होंने पार्टी आलाकमान से चिट्ठी लिखकर की। जब सुनवाई नहीं हुई तो ये विधायक दिल्ली पहुंचे और वहां उन्होंने सोनिया गांधी से मिलकर अपनी बात रखी। इस मुलाकात के बाद से कयास लगने शुरू हुए कि गठबंधन की सरकार में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा।
महाराष्ट्र की पत्रिकारिता में लगभग 25 सालों से सक्रिय वरष्ठि पत्रकार अरुण उपाध्याय कहते हैं, ‘भले ही बाला साहब कहते थे कि उनकी मंशा कभी सरकार में रहने की नहीं है। लेकिन उद्धव ठाकरे की सोच उनसके अलग है। उद्धव सरकार में न सिर्फ रहना चाहते, सीएम भी बने रहना चाहते हैं। यही वजह है कि जो पार्टी कभी खुलकर हिंदूत्व के मामलों पर बोलती थी आज उसके मुखिया कुछ भी बोलने से परहेज कर रहे हैं।’ उद्धव ये जरूर कहते हैं कि भाजपा के पास हिंदूत्व का पेटेंट नहीं है। लेकिन अब उन्हें सरकार भी चलानी है। ऐसे में वे अब बोलने से कतरा रहे हैं। अरुण आगे कहते हैं।
शिवसेना की सोच कैसे बदली?
शिवसेना के लिए दशहरे की रैली बेहद महत्वपूर्ण होती है। विधानसभा चुनाव के बाद साल 2019 के अक्टूबर महीने में भी हुई दशहरा रैली में शिवसेना के पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे बाला साहब की ही तरह गरजे थे। हालांकि इस रैली में उन्होंने हिंदुत्व की कम और सेकुलरिज्म की ज्यादा बात की थी। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा था कि शिवाजी महाराज की सेना में महाराष्ट्र के मुसलमान और दूसरे धर्मों के लोग शामिल थे। जिन्होंने दिल्ली के शासकों का तख्त हिला दिया था। शिवसेना मुसलमानों का भी स्वागत करती है और अन्य मजहब के लोगों का भी। शिवसेना मुस्लिमों और धनगर समाज के लोगों भी आरक्षण देने के पक्ष में है।
बाला साहेब की छवि और विचार वाले राज ठाकरे लेंगे उद्धव की जगह, सांसद नवनीत राणा का शिवसेना पर हमला
दो दशक पहले शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने औरंगाबाद शहर का नाम बदलकर संभाजीनगर कर दिया था। साल 1995 में औरंगाबाद नगर निगम शहर का नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी थी। लेकिन तब एक कांग्रेस के पार्षद ने इसे बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर बाद में सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया। तब से लेकर अब तक यह मामला फंसा हुआ है। शिवसेना ने इसे लेकर कोई पहल नहीं की है। कांग्रेस के नेता बालासाहेब थोरात कहते हैं कि कांग्रेस नाम बदलने में नहीं काम करने में यकीन करती है। ऐसे में शिवसेना के लिए यह कदम उठाना काफी मुश्किल होगा। अगर शिवसेना ऐसा करती भी है तो महा विकास अघाड़ी में फूट पड़ सकती है।





