सोफिया की ऑनर किलिंग का सच उजागर…
वामपंथी सिलेक्टिव सेकुलरिज़्म का नग्न प्रदर्शन
अहमदाबाद के सरखेज इलाके में हुई ऑनर किलिंग की बर्बर घटना पर तथाकथित वामपंथी और लिबरल गिरोह को बोलने की हिम्मत है?
यह वीभत्स हत्याकांड उस मजहबी दोहरेपन को बेनकाब करता है, जहां एक तरफ बेटियों को “शहजादी” बताने का ढोंग रचा जाता है, वहीं दूसरी तरफ झूठी शान के नाम पर पिता और भाई जैसे पवित्र रिश्ते कसाई बन जाते हैं।
यह घटना 12 अगस्त 2026 की रात को घटी, जिसका सच पुलिस जांच और सीसीटीवी फुटेज के बाद बेनकाब हुआ। जुहापुरा के एक अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करने वाली 22 वर्षीय सोफिया फारूक की उसके ही सगे पिता मोहम्मद फारूक नवाबखान (56) और भाई मोहम्मद हाबिल फारूक (38) ने हथौड़े से सिर कुचलकर निर्मम हत्या कर दी।
लगभग तीन महीने पहले सोफिया का एक पुरुष मित्र के साथ वीडियो वायरल होने के बाद, परिवार की तथाकथित मजहबी और इज्ज़त-ओ-आबरू बचाने के नाम पर दोनों ने इस हत्या की ठंडे दिमाग से साजिश रची थी।
वारदात की रात सोफिया का भाई मोहम्मद हाबिल अपनी पैंट में लोहे का हथौड़ा छिपाकर सोफिया को बाइक पर सरखेज के घेलजीपुरा गांव के पास एक सुनसान इलाके में ले गया, जहां पीछे से पिता मोहम्मद फारूक भी पहुंच गया।
वहां दोनों ने मिलकर सोफिया के सिर पर हथौड़े से ताबड़तोड़ वार किए। इसके बाद उन्होंने शव को मुख्य सड़क पर लाकर एक खौफनाक एक्सीडेंट का ड्रामा रचा और पुलिस के सामने अज्ञात वाहन की टक्कर की झूठी कहानी पेश की।
लेकिन सोला सिविल अस्पताल के डॉक्टरों के संदेह, सीसीटीवी कैमरों और पुलिस की सख्त पूछताछ ने इस घिनौनी साजिश की धज्जियां उड़ा दीं।
जिस बेटी को संकट के समय अपने पिता और भाई की ढाल बनने की उम्मीद थी, उसी बेटी के सगे रिश्ते रक्षक के बजाय उसके सबसे खूंखार भक्षक बन गए। यह घटना समाज के उस खोखले मजहबी कट्टरपन को उजागर करती है, जहां एक निर्दोष इंसान की जान से ऊपर झूठी शान को रखा जाता है।
इससे भी अधिक शर्मनाक और चिंताजनक बात यह है कि जब-जब ऐसी मजहबी कुरीतियों और बर्बरता पर बात आती है, तब-तब राहुल गांधी, स्वरा भास्कर, अरफ़ा ख़ानम और तमाम मजहबी ठेकेदारों की जुबान पर अचानक ताला लग जाता है।
सदियों पुरानी मनुस्मृति पर दिन-रात ज़हर उगलने वाले राहुल गांधी को आज के इस आधुनिक युग में घट रही इस मजहबी बर्बरता पर सांप क्यों सूंघ जाता है?
इतिहास के पन्नों से ‘जौहर’ को खोज-खोजकर उस पर तीखी टिप्पणी करने वाले और स्वघोषित जेंडर-जस्टिस के पैरोकार आज सोफिया के सिर पर पड़े हथौड़े की गूंज क्यों नहीं सुन पा रही?
यह वही सिलेक्टिव सेकुलरिज़्म है जहां सनातन धर्म की हजारों साल पुरानी परंपराओं पर उंगली उठाना ‘प्रोग्रेसिव’ माना जाता है, लेकिन किसी एक मजहब के भीतर बेटियों पर हो रहे इस तरह के अत्याचार पर एक शब्द बोलना भी इनके वोटबैंक और नैरेटिव का एजेंडा बिगाड़ देता है।
अरे दोगले वामपंथियों और चुनिंदा मानवाधिकार के ठेकेदारों, अब बोलो, बोलती बंद क्यों है?
जब तक ऐसे दोहरे मापदंडों, मजहबी बर्बरता और झूठी शान की मानसिकता का हर स्तर पर पुरजोर विरोध नहीं होगा, तब तक किसी भी मजहबी बेटी के लिए उसका अपना घर भी सुरक्षित नहीं हो सकता।
— सपना सी.पी. साहू
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