गुजरात के अहमदाबाद की एक अदालत ने अडानी समूह के संस्थापक गौतम अडानी के अपहरण के बीस साल पुराने मामले में दो आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है. इन आरोपितों में से एक फज़ल-उर-रहमान को 2006 में भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया था. वहीं दूसरे आरोपित भोगीलाल दर्जी को 2012 में दुबई से निर्वासित किए जाने के बाद गिरफ्तार किया गया था.
देश के शीर्ष उद्योगपतियों में शुमार गौतम अडानी के अपहरण से जुड़ा यह सनसनीखेज मामला 1998 का है. पुलिस की ओर से दायर किए गए आरोप पत्र के मुताबिक, एक जनवरी, 1998 को अडानी और उनके एक सहयोगी शांतिलाल पटेल को बंदूक के बल पर तब अगवा कर लिया गया था जब वे यहां के कर्णावती क्लब से निकलकर एक कार से मोहम्मदपुरा रोड जा रहे थे. आरोप पत्र के मुताबिक, इन दोनों को एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया और फिर छोड़ दिया गया.
पीटीआई के मुताबिक रहमान और दर्जी के अलावा इस मामले में छह अन्य लोग और आरोपित थे, जिन्हें 2005 में अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
रहमान और भोगीलाल दर्जी को शुक्रवार को बरी किया गया है. इस दौरान अडानी को अदालत में गवाही देनी थी लेकिन वे यहां उपस्थित नहीं हुए. अहमदाबाद मिरर से बात करते हुए इन आरोपितों के वकील कुणाल शाह ने कहा है, ‘हमें संदेह का लाभ दिया गया क्योंकि पहली बात तो यह थी कि इस मामले के पीड़ित गौतम अडानी अदालत में पेश नहीं हुए. दूसरी बात यह कि मामले के 25 गवाहों में से कोई भी मेरे मुवक्किलों की शिनाख्त नहीं कर पाया.’
पुलिस ने इस मामले में रहमान और दर्जी के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया था. हालांकि वह अदालत में इन दोनों के पास से कोई भी हथियार बरामद होने की बात साबित नहीं कर पाई.
अहमदाबाद की एक अदालत ने दो गैंगस्टर्स फैज़लुर रहमान उर्फ़ फैजु और भोगीलाल दर्जी उर्फ़ मामा को एक मामले में अपराधमुक्त कर दिया था। ये मामला जुड़ा है 27.5 बिलियन डॉलर (2.025 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति वाले उद्योगपति के फिरौती के लिए अपहरण करने से, वो उद्योगपति आज दुनिया का 155वाँ और भारत का 5वाँ सबसे अमीर व्यक्ति है, जिसका नाम है – गौतम अडानी, गुजरात के बड़े कारोबारी।
आज इस नाम से भारत में शायद ही कोई ऐसा हो, जो परिचित न हो। फैज़लुर रहमान के खिलाफ पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन पर सुनवाई चल रही है। उसे फ़िलहाल अहमदाबाद के साबरमती सेंट्रेल जेल में रखा गया है, जबकि दर्जी जमानत पर बाहर चल रहा है। दोनों के वकील कुणाल एन शाह ने बताया कि एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज डीपी पटेल ने उनके दोनों क्लाइंट्स को इस मामले में दोषमुक्त करार दिया।
उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ये साबित करने में नाकाम रहा कि फिरौती के लिए अपहरण हुआ था और उसमें इन दोनों का कोई रोल था। उन्होंने बताया कि कई बार समन दिए जाने के बावजूद गौतम अडानी या कोई भी पीड़ित अभिसाक्ष्य या बयान दर्ज कराने के लिए नहीं पहुँचा, जिसके बाद कोर्ट को ये निर्णय लेना पड़ा। गौतम अडानी को 2 बार समन भेजा गया। शाह ने दावा किया कि गवाह और पुलिस अधिकारी घटना का ठीक से विवरण नहीं दे पाए कि आखिर हुआ क्या था।
ये घटना जनवरी 1, 1998 की है, जब मोहम्मदपुरा से कार से जाते समय गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को कथित तौर पर फिरौती के लिए अपहृत कर लिया गया था। आरोप है कि सामने एक स्कूटर को खड़ा कर के कार को रोका गया और फिर कुछ लोग आए, जिन्होंने दोनों का अपहरण किया। तब सरखेज थाना के सब-इंस्पेक्टर रहे आरके पटेल ने FIR दर्ज की थी, जिसमें 9 अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
इसमें रहमान दर्जी, मोहम्मद उर्फ़ राजा जावेद, जयेश रतिलाल दर्जी, रियाज और अकील नामक अपराधी शामिल थे। आरोप है कि गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को छोड़ने के लिए 15 करोड़ रुपए की रकम माँगी गई थी और जब अपराधियों को रुपए मिल गए, तब उन्होंने गौतम अडानी को छोड़ दिया। 2009 में चार्जशीट फाइल की गई और इस मामले में 2014 में आरोप तय किए गए। आईपीसी की धारा-365 (अपहरण), 144 (गैर-कानूनी तरीके से भीड़ जुटाना) और आर्म्स एक्ट के तहत मामले दर्ज हुए थे।
लगभग 50-60 के बीच के उम्र वाला फैज़लुर रहमान मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसे एक जमाने में दाऊद इब्राहिम के टक्कर का रंगदार और गैंगस्टर माना जाता था। फिरौती, अपहरण, लूट और हत्या के मामलों में आरोपित फैज़लुर से तब कारोबारी काँपा करते थे। वो 90 के दशक में और 2000 की शुरुआत में सक्रिय था। हालाँकि, अब वो जेल में बैठ कर विभिन्न थानों में कई मामलों का सामना कर रहा है।
हाल ही में रवीश कुमार ने दावा किया था कि भारत सरकार ने अडानी को फायदा पहुँचाने के लिए कृषि कानून बनने से ठीक पहले ही अन्न भण्डारण करने के साइलोस गोदाम बना लिए थे। तीसरे फार्म बिल को सितंबर 22, 2020 को मंजूरी दे दी गई जबकि रवीश कुमार के दावे के विपरीत अडानी समूह वर्ष 2007 से ही साइलोस तैयार करता आ रहा है। कृषि सुधार बिलों के खिलाफ किसान विरोध प्रदर्शनों में नाम उछाले जाने के बाद खुद अडानी समूह ने कहा है कि वो न तो किसानों से खाद्यान्न खरीदता है और न ही खाद्यान्न का मूल्य तय करता है।