सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में है करीब 19 फीसदी, लेकिन उनके लिए कितने इंस्टीट्यूट बनाए? देश के शहरी इलाकों में हायर एजुकेशन के लिए जाने वाले मुस्लिम बच्चे सिर्फ 19 फीसदी हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़ा सिर्फ 13 फीसदी पर सिमट कर रह गया है.
जिसका डर था वही हुआ, कानपुर से शुरू हुआ फसाद बरेली तक पहुंच गया, पहुंच क्या गया, बल्कि बरेली को जान बूझकर इस आग में झोंका गया. कुछ कथित मौलानाओं ने कौम के नाम पर मुसलमानों को बरगलाया, और फिर कुछ सिरफिरे लोगों ने पत्थरों की नुमाइश की. लेकिन क्या किसी ने मौलाना तौकीर रजा के बेटे या उनके घरवालों को जुलूस में जाते हुए देखा ? क्या उन्हें पत्थर बरसाते हुए किसी ने देखा ? देखेंगे भी नहीं क्योंकि उनके बच्चे विदेश में अपना करियर बना रहे हैं. उनके रिश्तेदार ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं. और आपके बच्चे उनकी जी हुजूरी कर रहे हैं.
क्या ये पैगंबर से सच्ची मोहब्बत है?
कोई इन मौलानाओं से पूछो कि रसूल अल्लाह के नाम पर शहर शहर जो बवाल मचाया जा रहा है क्या वो जायज़ है? क्या ये पैगम्बर मुहम्मद से सच्ची मुहब्बत है? क्या पैगम्बर मुहम्मद ने इसी दिन के लिए इस्लाम फैलाया था? सवाल ये भी कि बारावफात और मोहर्रम के नाम पर जो जुलूस निकाले जाते हैं क्या वाकई उनकी कोई जरूरत होती है ? क्या इस्लाम में किसी तरह के जुलूस और नुमाइशों का जिक्र है ? अगर ऐसा है तो अरब देशों में इस तरह के जुलूस क्यों नहीं निकाले जाते ? इस्लाम तो वहीं से आया, पैगम्बर मुहम्मद तो अरब से ही थे.
अगर हम रसूल अल्लाह के सच्चे शैदाई हैं तो हम उनकी कितनी सुन्नतों पर अमल करते हैं? उन्होंने जिन बुराइयों से मना किया क्या हम उनसे दूर रह पाते हैं ? उन्होंने तालीम पर जोर दिया, क्या हम अपने बच्चों को उस शिद्दत से पढ़ाते हैं ? उन्होंने झूठ, फरेब, मक्कारी, हराम, सूद, दहेज से दूर रहने को कहा था. क्या हम रह पाते हैं ? क्या हम आज भी बेटी और बेटे में फर्क नहीं करते ? हम आखिर उनकी कौन सी बात मान रहे हैं ? क्या मुसलमान सिर्फ जुलूस निकालने के लिए बना है?
क्या मौलानाओं के बच्चे चलाते हैं पत्थर?
कुछ कथित मौलाना सियासी रोटियां चमकाने के लिए मुसलमान को ईंधन बना रहे हैं और फिर इन चिंगारियों से मजे ले रहे हैं. ऐसे मौलाना मुसलमानों को बिरयानी से पत्थरबाजी पर ले आए, लेकिन क्या किसी ने इनके बच्चों को कभी पत्थर चलाते देखा है ? जैसे कश्मीर में नेता सिर्फ तमाशा देखते थे और आम मुसलमान को पत्थर पकड़ा दिया जाता था. सवाल ये है कि तौकीर रजा जैसे मौलानाओं ने मुसलमानों को कभी किताब क्यों नहीं पकड़ाई? उन्होंने मुसलमानों के लिए कोई इंस्टीट्यूट खोला ? उनके किसी संस्थान से निकलकर मुसलमान बच्चे आईएएस या आईपीएस बने ? देश में कुल 5664 आईएस अफसरों में सिर्फ 180 मुसलमान हैं, जबकि 151 आईपीएस मुसलमान हैं. इसमें तौकीर रज़ा या उनके जैसे कथित मौलानाओं का क्या योगदान है ?
तौकीर ने कितने इंस्टीट्यूट बनाए?
सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में है करीब 19 फीसदी, लेकिन उनके लिए कितने इंस्टीट्यूट बनाए? देश के शहरी इलाकों में हायर एजुकेशन के लिए जाने वाले मुस्लिम बच्चे सिर्फ 19 फीसदी हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़ा सिर्फ 13 फीसदी पर सिमट कर रह गया है. आंकड़े कहते हैं कि भारत में 12वीं तक आते आते 92% मुस्लिम छात्र छात्राएं पढ़ाई छोड़ देते हैं. देश के प्राइमरी में एडमिशन लेने वाले 100 मुस्लिम बच्चों में से सिर्फ 8 बच्चे ही 12वीं क्लास तक पहुंच पाते हैं. शिक्षा के इस गिरते स्तर के पीछे बड़ी वजह आर्थिक कमजोरी है, तो कहीं कही भेदभाव भी बड़ी वजह है.
देश में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया और जामिया हमदर्द को गिनाने के अलावा और क्या है? सर सय्यद अहमद खान ही थे, जिन्होंने एक ख्वाब देखा, और तमाम विरोध के बावजूद उसे पूरा किया, बाकी मुसलानों के नाम पर जो भी संस्थान चल रहे हैं वो सिर्फ मोटी फीस वसूल रहे हैं. सवाल ये है कि मुसलमान ये बात कब समझेंगे ? हमें अपने अल्लाह, अपने पैगम्बर अपने मजहब से प्यार है ये बताने के लिए हमें जुलूस निकालने की जरूरत क्या है ? मैं भी मुहम्मद का शैदाई हूं, लेकिन इसके लिए दुनिया को सिर पर उठाने की क्या जरूरत है ? अगर आपको पैगंबर मुहम्मद से सच्ची मुहब्बत है तो खुदा के लिए इस फसाद से बाहर निकल जाइए, वरना ये कथित मौलाना आपको आग में झोंकते रहेंगे और तालियां पीटकर मजे लेते रहेंगे.






