एक फैसला?
पिथौरागढ़ की 7 वर्षीय कशिश के केस में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन तथ्यों के आधार पर अख्तर अली को छोड़ा है; हाईकोर्ट का फैसला उन तथ्यों को पूरी तरह से काटता है। 2019 का हाईकोर्ट का फैसला पढ़ने के बाद मैं उसके कुछ तथ्य आपसे साझा कर रहा हूं।
अख्तर अली बिहार के चंपारण से है। यह एक मोटा और भद्दा सा दिखने वाला व्यक्ति है जो उस समय ट्रक ड्राइवर था और खूब शराब पीता था। हाईकोर्ट के फैसले में लिखा हुआ है कि इस अख्तर अली के 05 बच्चे हैं।
कशिश की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का वर्णन भी हाईकोर्ट के फैसले में विस्तृत रूप से किया गया है। PM रिपोर्ट बताती है कि उसकी दोनों टांगों को लगभग चीर डाला गया था। चेहरे पर लाल और नीले धब्बे थे। छाती पर अत्यधिक खरोचें थी। अन्य भी वीभत्स घावों के वर्णन किया गया है लेकिन मेरी उनके बारे में लिखने की हिम्मत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता कि अख्तर अली की घटना स्थल पर मौजूदगी के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं जबकि हाईकोर्ट का फैसला कहता है कि कम से कम 6 गवाहों ने उसे घटना से पहले और घटना के बाद वहां आसपास देखा था जहां से कशिश गायब हुई थी। उसे शराब पीते हुए और टॉफी, चॉकलेट, सिगरेट और बीड़ी खरीदते हुए देखा गया था। उसके पास फर्जी आईडी से लिए गए दो सिम कार्ड थे जोकि घटना स्थल के आसपास ट्रेस हुए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी तथ्यों को संदेहास्पद करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि गवाहों ने अख्तर को घटना से पहले भी देखा और बाद में भी देखा। यदि उसने अपराध किया होता तो वो वहां क्यों रुकता? हाईकोर्ट का फैसला कहता है कि अख्तर उस रात डंपर में सोया, अगले दिन डंपर मालिक से जरूरी खर्चे के लिए 3000 रुपए लिए फिर प्रेम पाल वर्मा के साथ बैंक गया जिसकी CCTV रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध करवाई गई और बैंक मैनेजर ने भी गवाही दी कि अख्तर अपने दोस्त के साथ बैंक आया था। फिर 21 की शाम को वह गायब हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट इन तथ्यों को भी संदेह की दृष्टि से देखता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि ऐसा प्रतीत होता है कि लुधियाना से अख्तर की गिरफ्तारी की कहानी झूठी है क्योंकि इस दौरान पंजाब पुलिस का कोई भी अधिकारी उपस्थित नहीं था जो कि वहां होना चाहिए था। हाईकोर्ट कहता है कि अख्तर 21 नवंबर की शाम को दिल्ली गया। वहां से उसने प्रेम पाल को लगभग 4 या 5 बार फोन किया। फिर उस सिम को फेंक दिया। फिर उसी फोन पर दूसरा सिम लगाया जिसकी लोकेशन कुछ समय बाद लुधियाना पाई गई। पुलिस की टीम वहां गई और उसे दबोच लिया। उसके पास से फोन और दिल्ली से लुधियाना का ट्रेन का टिकिट भी पाया गया जिसे कोर्ट में पेश भी किया गया। कॉल डिटेल्स भी कोर्ट को सौंपी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यहां भी कोई ध्यान नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि सैंपल लेने वाले और DNA टेस्ट करने वालों की एक्सपर्टीज संदिग्ध है और सैंपल्स में मिलावट की आशंका है। जबकि हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार DNA सैंपल डॉक्टर संजीव खर्कवाल ने लिए जो कि एक माने जाने बालरोग विशेषज्ञ हैं और DNA जांच डॉक्टर मनोज अग्रवाल द्वारा की गई जोकि FSL देहरादून में साइंटिफिक ऑफिसर के पद पर तैनात हैं जो एक सरकारी लैब है। ऐसे में यहां एक्सपर्टीज ना होने का तो सवाल ही नहीं बनता है लेकिन महान सुप्रीम कोर्ट यहां भी सवालिया चिन्ह लगा देता है।
मुझे समझ नहीं आता है कि हाईकोर्ट के फैसले में जो इतने महत्वपूर्ण और अकाट्य तथ्य उपस्थित हैं उन्हें सुप्रीम कोर्ट किस प्रकार से एकदम सिरे से खारिज कर सकता है? आप सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़िए और फिर हाईकोर्ट के फैसले को पढ़िए। आपको साफ दिख जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के जज पूरा मन बनाकर बैठे हुए थे कि किसी भी तरह से पीड़िता के पक्ष की दलीलों को बस संदेहास्पद घोषित करना है। अख्तर की वकील ने जो कहा, जैसा कहा सुप्रीम कोर्ट सबकुछ मानता गया।
मामले में कशिश के पक्ष में 40 गवाहों ने अपनी गवाहियां दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सभी को संदेहास्पद मान लिया। मियां लॉर्ड की नजरों में ये 40 गवाह झूठे, ट्रायल कोर्ट झूठा, हाईकोर्ट झूठा, बस एकमात्र मनीषा भंडारी ही सच्ची निकली। उसकी प्रत्येक दलील को स्वीकार कर लिया गया और इस दरिंदे को आजाद कर दिया गया। भगवान ही भला करे भारत की इस न्याय व्यवस्था का।
मुझे लगता है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इतनी लापरवाही से फैसला दिया है कि अभी तक तो उत्तराखंड सरकार को इस फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटिशन लगा देनी चाहिए थी। पता नहीं सरकार इस मामले में क्यों सोई पड़ी है? खैर सरकार भी सोच रही होगी कि ज्यादा हो हल्ला तो हो नहीं रहा है। दो चार दिन का तमाशा होगा थोड़ा बहुत फिर सब भूल जाएंगे। क्या ही फर्क पड़ता है?
(कृपया एंग्री रिएक्ट ना करें)






