मुख्यमंत्री जाने-अनजाने बड़े संकट में फंस गए हैं। अपने नाम पर खदान लीज लेने यथा ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में झारखंड हाईकोर्ट व चुनाव आयोग हेमंत सोरेन पर अगले 15 दिनों में कड़ी कार्रवाई कर सकता है। राज्यपाल रमेश बैस ने चुनाव आयोग को हेमंत सोरेन के नाम पर खदान लीज लिए जाने की जानकारी दी है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा माइनिंग लीज लेने की शिकायत राज्यपाल रमेश बैस से की थी।
इसके बाद राज्यपाल ने राज्य के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को बुलाकर इस मामले में तमाम ब्योरा तलब किया। इधर भारत निर्वाचन आयोग को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले की तथ्यात्मक जानकारी मिलने के बाद चुनाव आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को चिट्ठी भेज कर डिटेल रिपोर्ट मांगी है। अगले 15 दिनों में हेमंत सोरेन के खदान लीज से संबंधित दस्तावेज आयोग ने उपलब्ध कराने को कहा है।
अद्यतन जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग इस संगीन मामले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9 ए के तहत ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले की गहनता से पड़ताल कर रहा है। साथ ही तमाम बिंदुओं पर जांच की जा रही है। खदान लीज लेने के मामले में कानूनी तथ्यों को भी जांचा जा रहा है। बहराहल, एक नए विवाद में घिरने से हेमंत सोरेन की मुख्यमंत्री की कुर्सी खतरे में आ गई है।
क्या कहते हैं कानून के जानकार
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा अपने नाम पर माइनिंग लीज लेने के मामले में देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा कि प्रथमदृष्टया यह मामला ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का लग रहा है। इस तरह के मामलों में किसी को पद से हटाने के लिए तीन कंडीशन होते हैं। पहला कंडीशन यह कि एक ही व्यक्ति विशेष के पास कोई दाे पद होना चाहिए।
दूसरा कंडीशन यह है कि इसके तहत जिम्मेवार व्यक्ति एक महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए किसी से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ हासिल करता है। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का तीसरा कंडीशन यह है कि सरकारी पद पर रहने वाला अगर अन्य माध्यमों से कमाई कर रहा है। सुभाष कश्यप ने कहा कि फिलहाल हेमंत सोरेन का मामला झारखंड उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। चुनाव आयोग भी इस पूरे मामले में रिपोर्ट तलब कर चुका है। ऐसे में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामला में इन संवैधानिक संस्थाओं को ही फैसला करना है।
चुनाव आयोग अयोग्य घोषित नहीं कर सकता
झारखंड हाइकोर्ट से जुड़े कानूनी मामलों के जानकार वरिष्ठ वकील अरविंद लाल ने बताया कि ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामला बेहद अहम है। हेमंत सोरेन के खदान लीज मामले में उन पर लग रहे गंभीर आरोपों पर उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति अगर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट करता है, तो वह सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। चूंकि इस मामले के दस्तावेज उन्होंने नहीं देखे हैं, मामला अदालत में है, ऐसे में वे स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह सकते।
अरविंद लाल ने कहा कि जहां तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहते हेमंत सोरेन द्वारा अपने नाम से माइनिंग लीज लेने का मामला है, तो यह देखना होगा कि इस खदान लीज से किसको सीधा लाभ हो रहा है। खदान से लाभ लिया गया है भी या नहीं। डिटेल्स देखने के बाद ही वे कुछ कह सकते हैं। कानून के जानकार अरविंद लाल ने कहा कि ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में चुनाव आयोग किसी सदस्य को सीधे अयोग्य घोषित नहीं कर सकता।
संवैधानिक नियम यह है कि राज्यपाल इस मामले को जांच के लिए चुनाव आयोग को भेजते हैं। जिस पर चुनाव आयोग अपनी जांच करता है। इसके बाद जांच रिपोर्ट मंतव्य के लिए सुप्रीम कोर्ट को भेजा जाता है। सुप्रीम कोर्ट का मंतव्य मिलने के बाद चुनाव आयोग राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपता है। जिस पर किसी व्यक्ति विशेष को पद से हटाने की कार्रवाई होती है।





