Wednesday, May 6, 2026
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उत्तरप्रदेश में नही बंटा तो सिर्फ मुस्लिम वोटर,34 मुसलमान विधायक जिताये

चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक का एक नया चेहरा सामने आया है। वह बिरादारी, जो एकजुट होकर सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ खड़ी थी। असदउद्दीन ओवैसी समेत कौम के दूसरे चेहरों की ओर उसने निहारा भी नहीं। यही वह बड़ी वजह है, जिसने मोदी लहर में खिले कमल के फूल को इस बार कई सीटों पर मुरझा भी दिया।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक ने ही साइकिल की रफ्तार बढ़ाई है और उसे मजबूत विपक्ष के रूप में खड़ा करने में इस समुदाय का बड़ा योगदान है। 2017 के चुनाव में 24 मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जिनमें 17 सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। इस बार मुस्लिम वोट बैंक ने अपनी भागीदार बढ़ाई है और कुल 34 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जिनमें 31 सपा के खाते में हैं। साफ है कि सपा के खेमे में इस बिरादरी के 14 विधायकों का इजाफा हुआ है।

मुस्लिम बहुल सीटों के समीकरणों को गौर से देखें तो यह तथ्य और साफ हो जाता है। मुहम्मदाबाद सीट पर 2017 में कमल खिला था, जहां भाजपा की अलका राय ने बड़ी जीत दर्ज की थी। अलका राय को 122156 वोट मिले थे, जो 53.25 प्रतिशत थे। बसपा से चुनाव लड़े माफिया मुख्तार अंसारी के बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी दूसरे स्थान पर थे, जिन्हें 89429 वोट मिले थे। यानी 39.25 प्रतिशत वोट। इस बार भी अलका राय मैदान में थीं। सपा ने यहां सिबगतुल्लाह अंसारी के बेटे सुहैब उर्फ मन्नू अंसारी को प्रत्याशी बनाया। नतीजा रहा कि सुहैब 111443 वोट यानी 45.26 प्रतिशत मतों के साथ विजेता हो गए। अलका राय को 92624 वोट मिले। पर, मुस्लिम मतदाताओं की लामबंदी के नतीजे में अलका राय को 37.64 प्रतिशत वोट ही मिल सके।

कुछ ऐसी ही दिलचस्प कहानी लखनऊ पश्चिम सीट की भी है, जहां कमल खिलता था। पिछले चुनाव में 93022 वोट (42.88 प्रतिशत) पाकर सुरेश कुमार श्रीवास्तव ने जीत दर्ज की थी। इस बार सपा ने इस सीट पर हाथी से उतरे अरमान खान को साइकिल पर बिठाया और अरमान 124497 (48.19 प्रतिशत) वोट हासिल कर सबको पीछे छोड़ने में कामयाब रहे।
भाजपा प्रत्याशी अंजनी कुमार श्रीवास्तव को पार्टी का परंपरागत वोट मिला, लेकिन 116313 (45.03 प्रतिशत) वोट समीकरण बदलने को नाकाफी था। बसपा ने भी इस सीट से मुस्लिम उम्मीदवार कायम रजा खान को उतारा था, लेकिन उनके खाते 10061 (3.89 प्रतिशत) वोट ही आया। साफ है कि एकमुश्त मुस्लिम वोट ने यहां भाजपा का खेल बिगाड़ दिया।

कुछ ऐसा ही हाल कांठ सीट का भी रहा। जहां 2017 में राजेश कुमार सिंह चुन्नू ने 76307 (30.29 प्रतिशत) मतों के साथ कमल खिलाया था। इस सीट पर सपा के अनीसुर्रहमान को 73959 (29.36 प्रतिशत) वोट व बसपा के मु.नासिर को 43820 (17.40 प्रतिशत) मत मिले थे। इस सीट पर एआइएमआइएम (आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन) के फिजाउल्ला चौधरी ने भी दावेदारी की थी और 22908 (9.09 प्रतिशत) वोट हासिल किये थे।
तीन मुस्लिम उम्मीदवारों में बंटे वोट ने तब भाजपा की राह आसान कर दी थी, लेकिन इस बार सपा के कमाल अख्तर ने 134692 (49.19 प्रतिशत) वोटों के साथ बाजी मार दी। बसपा व कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को इस बार यहां कुल मिलाकर 14 प्रतिशत वोट भी नहीं मिला। भाजपा की ओर से फिर ताल ठोंक रहे राजेश ङ्क्षसह इस बार पिछले चुनाव की अपेक्षा 91514 (33.42 प्रतिशत) वोट पाने के बाद भी हार गये। मतलब साफ है कि एक बिरादरी के वोट ने कमल नहीं खिलने दिया। ऐसा ही थाना भवन, पटियाली, भोजीपुरा, बेहट समेत कई अन्य सीटों पर भी हुआ।

विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या

वर्ष : संख्या

2017 – 23

2012 – 68

2007 – 56

2002 – 44

1996 – 39

1993 – 31

1991 – 23

1989 – 41

1985 – 50

1980 – 49

1977 – 48

1974 – 40

1969 – 34

1967 – 24

1962 – 29

1957 – 37

1951 – 44

यह भी खास : 2017 के चुनाव में पांच मुस्लिम प्रत्याशी बसपा व दो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। इस बार इन दोनों ही दल के एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीत का मुंह नहीं देख सके। सपा के अलावा उससे गठबंधन करने वाली रालोद के दो प्रत्याशी जीते। वहीं मऊ की सदर सीट पर पिछली बार बसपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले माफिया मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास ने इस बार पिता की सीट पर सुभासपा का प्रत्याशी बनकर जीत हासिल की।

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