Wednesday, April 29, 2026
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फोर्ड कम्पनी बन्द: जर्मनी, रशिया सहित 6 यूरोपीय देशों के बाद भारत मे भी

फोर्ड मोटर कंपनी ने कथित तौर पर भारत में अपनी दोनों विनिर्माण सुविधाओं को बंद करने का निर्णय लिया है। कंपनी ने इस निणर्य के पीछे मुनाफा न होने को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, अभी तक इसके बारे में फोर्ड मोटर की तरफ से कोई आधिकारिक ऐलान नहीं करा है। ऐसा बताया जा रहा है कि इसकी औपचारिक घोषणा जल्द ही कर दी जाएगी।

कारों को आयात के माध्यम से बेचना जारी रखेगा

रिपोर्ट में कहा गया है कि फोर्ड ने अपने साणंद और मराईमलाई स्थित प्लांट्स में परिचालन बंद करने का फैसला किया है। क्योंकि भारत में उसे कुछ खास लाभ के संकेत नहीं दिख रहे हैं। वहीं सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में दावा करा गया है कि कंपनी देश में अपनी कुछ कारों को आयात के माध्यम से बेचना जारी रखेगा।
जनरल मोटर्स और हार्ले डेविडसन जैसी कंपनियों के बाद अब फोर्ड तीसरी अमरीकी कंपनी होगी जो भारत से आपना कारोबार समेटने की तैयारी कर रही है।

क्या कहते हैं बिक्री के आंकड़े

यदि Ford के वाहनों की बिक्री रिपोर्ट पर गौर करें तो ये काफी निराशाजनक आंकड़े हैं। बीते अगस्त माह में कंपनी ने देश भर में कुल 1,508 यूनिट्स वाहनों की ब्रिकी करी है। ये बीते साल अगस्त महीने में 4,731 यूनिट्स थें। इस दौरान कंपनी की बिक्री में पूरे 68.1 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है। इसके साथ पैसेंजर कार सेग्मेंट में कंपनी का मार्केट शेयर बीते साल के अगस्त माह के 2 प्रतिशत के मुकाबले घटकर 0.6 प्रतिशत रह गया है।
भारत में फोर्ड
1990 के दशक में आते हैं. भारत में नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक नीतियों में उदारीकरण लागू किया. दुनिया की कंपनियां भारत में अपना बाज़ार देख रही थी. हुंडई, रेनो, जैसे कई कार कंपनियां भारत का रुख कर रही थी. और इसी क्रम में 1996 में फोर्ड कंपनी भारत पहुंची. तमिलनाडु में चेन्नई के पास पहला मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट शुरू किया. भारत में प्लांट खोलने से एक साल पहले ही फोर्ड ने महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के साथ साझेदारी कर ली थी. कहते हैं कि तब महिंद्रा ने फोर्ड पर महाराष्ट्र में प्लांट लगाने के लिए ज़ोर दिया था. बैकिंग थी महाराष्ट्र सरकार की. लेकिन बाजी तमिलनाडु ने मारी. उस वक्त की तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कह दिया था कि किसी भी कीमत पर फोर्ड उनके राज्य में आनी चाहिए. फोर्ड ने भी तमिलनाडु को जाना बेहतर समझा. वजह ये भी थी कि उस वक्त देश के एक तिहाई ऑटोपार्ट्स तमिलनाडु में ही बनते थे. तो कंपनी को सहूलियत दिखी. इस तरह से भारत में फोर्ड की यात्रा शुरू हुई.

हिट या फ्लॉप?
महिंद्रा के साथ मिलकर फोर्ड ने पहली कार लॉन्च की एस्कॉर्ट. ये कार ज्यादा चली नहीं. इसके बाद 1999 में फोर्ड ने Ikon लॉन्च की. और फिर 12 और ब्रांड्स लॉन्च किए. कई मॉडल्स पॉपुलर भी हुए. फोर्ड फिगो, ईकॉस्पोर्ट्स ये गाड़ियां अब भी सड़कों पर आराम से दिख जाती हैं. कुछ गाड़ियों को छोड़कर फोर्ड का ज्यादातर मामला फ्लॉप ही रहा. 25 साल में फोर्ड भारत के बाज़ार में अपनी जगह नहीं बना पाया. हम पिछले वित्त वर्ष के कुछ आंकड़े देते हैं. फोर्ड ने साल भर में सिर्फ 48 हज़ार गाड़ियां बेची. यानी देश में जितनी गाड़ियां बिकी उसका 1.84 फीसदी. इस वित्त वर्ष के शुरुआती 5 महीनों में भी फोर्ड ने सिर्फ 15 हजार 818 गाड़ियां बेची हैं. जबकि दो साल पहले भारत आई किया कंपनी ने करीब 74 हज़ार यूनिट बेच दी हैं. खपत नहीं हुई तो फोर्ड का घाटा भी बढ़ता गया. 10 साल का घाटा है करीब 14 हजार करोड़ रुपये. बीच में एक बार 2011 के आसपास फोर्ड ने दोबारा खुद को खड़ा करने की कोशिश की थी. गुजरात के साणंद में अपना नया प्लांट शुरू किया. लाखों डॉलर इंवेस्ट किए. लगा कि शायद यहां से फोर्ड की किस्मत बदल सकती है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फोर्ड अपने घाटे में और उलझती गई.

क्यों पिछड़ी कंपनी?
अब बात आती है कि भारत में फोर्ड जम क्यों नहीं पाई. हिंदू बिजनेस लाइन अखबार में एन माधवन का इस पर अच्छा विश्लेषण मिलता है. वो लिखते हैं फोर्ड कंपनी भारत का बाज़ार ठीक से समझ नहीं पाई. अमेरिका के कार बाज़ार हमारे यहां का बाज़ार बहुत अलग है. अमेरिका में कार खरीदने वाले ये देखते हैं कि साइज़ कौनसी है या इंजन कौनसा है, कितनी ताकत है इंजन में. अपना मामला अलग है. हमारे लिए पैसा मायने रखता है. कीमत कितनी है, एवरेज कितना देती है. पुरानी होने के बाद बेचेंगे तो कित्ता पैसा उठेगा. कार खरीदने के हमारे ये पैमाने होते हैं.

फोर्ड को बहुत देर से ये बातें समझ में आई. बाजार को समझने में गंभीरता नहीं दिखाई थी. पहली कार एस्कॉर्ट से ही फोर्ड की इमेज खराब होती गई. एस्कॉर्ट दुनिया के ज्यादातर देशों में बाज़ार से बाहर हो चुकी थी. ज्यादा साख नहीं थी. गाड़ी दमदार साबित नहीं हुई, तो फोर्ड की खराब पब्लिसिटी हुई. फोर्ड ने बाज़ार को समझकर अपनी रणनीति बदलने की कोशिश की. फोर्ड फिएस्टा, फोर्ड फिगो जैसे छोटी गाड़ियां लॉन्च की. ये पसंद भी की गई है. फोर्ड इकॉस्पोर्ट्स का भी अच्छा मार्केट बन गया. लेकिन फोर्ड कभी भी सुज़ुकी और हुंडई को मात देने की हालत में नहीं रही. किसी रेंज में फोर्ड की गाड़ी बेस्ट सेलर नहीं रही.

बिज़नेस मॉडल असफल
पत्रकार कुशान मित्रा ने भी ट्विटर पर लिखा है कि फोर्ड क्यों फेल हुआ. उनके मुताबिक फोर्ड ने भारत की कुछ बेहतरीन कारें बनाई हैं. लेकिन खुद की वजह से ही वो फेल हो गए. एसयूवी सेगमेंट की कार ईकॉस्पोर्ट्स खराब मार्केटिंग और कीमत की वजह दूसरी कंपनियों को मात नहीं दे पाई. फोर्ड फिगो का पेट्रोल इंजन बेहतरीन है, लेकिन इस सेगमेंट में टाटा, हुंडई, या सुजुकी से ज्यादा नहीं बेच पाए. यानी अच्छी कारें बनाने के बावजूद फॉर्ड के बिजनेस मॉडल का फेल्योर रहा.

फोर्ड के फेल्योर को हम हुंडई के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. 1996 में ही हुंडई ने भी भारत में अपना प्लांट शुरू किया था. फोर्ड और हुंडई की यात्रा साथ साथ शुरू हुई. तब हुंडई का फोर्ड जितना नाम भी नहीं था. हुंडई के लिए चुनौती ज्यादा थी. लेकिन 25 साल बाद आज हुंडई भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है. पिछले वित्त वर्ष में हुंडई की लगभग 4 लाख 71 हज़ार गाड़ियां बिकी थी. भारत के कार बाजार में हुंडई की हिस्सेदारी 18 फीसदी से ज्यादा है.

कैसे हुआ ये. हुंडई ने भारत के बाज़ार की अच्छी रिसर्च की. ग्राहकों के मन को समझा. हुंडई की पहली कार थी सेंट्रो. हैचबैक कार. बिल्कुल नीचे से शुरू किया. सेंट्रो अपने सेगमेंट में हिट रही. यहां से हुंडई की इमेज भी अच्छी बनती गई. बाज़ार बनता गया और इसीलिए आज हुंडई का बाज़ार बढ़ रहा है और फोर्ड का सिमट गया है.

किसी कंपनी का बंद होना, मतलब हज़ारों लोगों का रोज़गार जाना. फोर्ड के जाने से करीब 4 हज़ार लोगों का रोज़गार सीधे तौर पर जाएगा. और करीब 40 हज़ार और लोग, जो अप्रत्यक्ष रूप से फोर्ड के साथ रोज़गार पा रहे थे. उनका भी नुकसान होगा. हालांकि फोर्ड ने कहा है कि कर्मचारियों से बात करके उनके नुकसान की भरपाई करेंगे. हालांकि ये नौकरी तो जाएंगी है. और अर्थव्यवस्था के मुश्किल दौर में ये पीड़ादायक है.

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