Monday, April 22, 2024
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पूरे जिस्म पर काटने के निशान,सिगरेट से जलाने के निशान,,जंग हार गई निर्भया, पुलिस की घोर लापरवाही से कोर्ट में,

सोमवार को चीफ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष तीन लोगों के खिलाफ आरोपों को साबित करने में विफल रहा। अभियुक्त की पहचान अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित नहीं की गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे में चूक की ओर इशारा भी किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अदालतों को कानून के अनुसार योग्यता के आधार पर मामलों का सख्ती से फैसला करना चाहिए। अदालतों को किसी भी तरह के बाहरी नैतिक दबाव या अन्यथा प्रभावित नहीं होना चाहिए।”

किस चूक को सुप्रीम कोर्ट ने बनाया फैसले का आधार

तीनों आरोपियों को जब पकड़ा गया तो उनके डीएनए सैंपल लिए गए। अगले 11 दिनों तक वो सैंपल पुलिस थाने के मालखाने में ही पड़े रहे। कहा जा रहा है कि इसी घोर लापरवाही को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले का आधार बनाया।

इसके अलावा बचाव पक्ष की दलील थी गवाहों ने भी आरोपियों की पहचान नहीं की थी। कुल 49 गवाहों में 10 का क्रॉस एक्जामिनेशन नहीं कराया गया था।

क्या थी पूरी घटना

यह घटना दिल्ली में चलती बस में 23 साल एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और पांच लोगों द्वारा हत्या करने से कुछ महीने पहले हुई थी। फरवरी 2012 में, हरियाणा के रेवाड़ी जिले के एक खेत में युवती का क्षत-विक्षत और जला हुआ शव मिला था। युवती का कुछ दिनों पहले अपहरण किया गया था। जब युवती की लाश पर गंभीर घाव के निशान भी पाए गए थे। जांच के दौरान पता चला कि महिला की आंखों में तेजाब डाला गया था और उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डाली गई थी।

मौत की सजा सुनाए जान के बाद तीनों आरोपियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनकी सजा कम की जाए। सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने मौत की सजा कम करने का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि अपराध न केवल पीड़ित के खिलाफ, बल्कि समाज के खिलाफ भी किया गया था।

दोषियों के बचाव पक्ष ने उनकी उम्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि और पिछले आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उनकी सजा को कम किया जाना चाहिए। उधर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लड़की के माता-पिता ने कहा कि वे फैसले से टूट गए हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि वे अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।

 

 

देश की सबसे बड़ी अदालत ने पुलिस की घोर लापरवाही को अपने फैसले का आधार बनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अदालतें सबूतों पर चलकर फैसले लेती है भावनाओं में बहकर नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों को अपनी बात कहने का पूरा मौका नहीं मिला।

… हम जंग हार गए

 

पीड़िता की मां ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर फूट-फूटकर रोते हुए कहा, “11 साल बाद भी यह फैसला आया है।हम हार गए… हम जंग हार गए… मैं उम्मीद के साथ जी रही थी… मेरे जीने की इच्छा खत्म हो गई है’ मुझे लगता था कि मेरी बेटी को इंसाफ मिलेगा।”

रोते बिलखते पीड़िता के पिता ने कहा, “अपराधियों के साथ जो होना था, वह हमारे साथ हुआ। 11 साल से हम दर-दर भटक रहे हैं। निचली कोर्ट ने भी अपना फैसला सुनाया। हमें राहत मिली। हाईकोर्ट से भी हमें आश्वासन मिला लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हमें निराश किया। अपराधियों के साथ जो होना था, वह हमारे साथ हुआ।”

आखिरी सांस तक जिस्म को काटते रहे हैवान….और फिर

 

हैवानियत की हद को पार करने वाला मामला साल 2012 का है, जब छावला की रहने वाली 19 साल की लड़की गुड़गांव से काम खत्म कर बस से घर वापस लौट रही थी। बस से उतरने के बाद पैदल रास्ते को तय कर रही लकड़ी का पीछे से आ रही लाल रंग की कार में बैठे तीन युवक अपहरण कर लेते हैं।

आरोपियों ने लड़की को हरियाणा ले जाने का फैसला किया। तब तक कार के अंदर उसके साथ हैवानियत शुरू हो चुकी थी। हरियाणा पहुंचकर आरोपियों ने ठेके से शराब खरीदी और फिर कार को एक सुनसान जगह पर ले जाकर शराब पीते हुए मासूम के साथ दरिंदगी करने लगे। लड़की के जिस्म पर कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां हैवानों की दरिंदगी का सबूत न हो। आरोपियों ने लड़की के शरीर पर जगह-जगह दातों से काटा था।

उनकी हैवानियत और भूख यही शांत नहीं हुई, उन्होंने गाड़ी से लोहे का पाना और जैक निकालकर उसके सिर पर वार किया। दरिंदों ने उसे जला कर बदशक्ल करने के लिए गाड़ी के साइलेंसर से दूसरे औजारों को गर्म कर उसके जिस्म को जगह-जगह दाग दिया। यहां तक कि उसके प्राइवेट पार्ट को भी जलाया गया। इसके बाद आरोपियों ने बीयर की बोतल फोड़ी और उससे लड़की के पूरी जिस्म को तब तक काटते रहे जब तक युवती की मौत नहीं हो गई।

मौत के बाद भी हैवानियत

मौसम की मौत के बाद उसके प्राइवेट पार्ट में भी टूटी बोतल घुसा दी थी। उन दरिदों ने लड़की की आंखें फोड़कर उनमें कार की बैटरी का तेजाब भर दिया। जब काफी देर तक लड़की घर नहीं पहुंची तो शुरू हुई उसकी तलाश और पुलिस की लापरवाही। बेटे के घर नहीं पहुंचने पर उसके पिता पुलिस के पास पहुंचे दिल्ली पुलिस ने उन्हें जो जवाब दिया वो शर्मसार करने वाला था। बेटी को ढूढ़ने के लिए मदद मांगने पहुंचे पिता को पुलिस ने जवाब दिया कि संदिग्ध बदमाशों को ढूंढ़ने के लिए उनके पास गाड़ी उपलब्ध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की। कोर्ट परिसर के बाहर पीड़िता के माता-पिता के साथ मौजूद महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना ने कहा, “मैं पूरी तरह से स्तब्ध हूं। सुबह, हमें पूरी उम्मीद थी कि शीर्ष अदालत मौत की सजा को बरकरार रखेगी और हमें यह भी लगता था कि वे मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल सकते हैं।”

 

 

 

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