Monday, March 4, 2024
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चुनाव ने बता दिया,असली पनौती कौन,पनौती नही मनहूस भी

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस पार्टी एक बुरी हार की तरफ आगे बढ़ रही है। चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं ने बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्हें ‘पनौती’ तक बताया गया। यहाँ तक कि जब भारत ODI वर्ल्ड कप का फाइनल हारा तो इसका ठीकरा भी पीएम मोदी पर फोड़ा गया, क्योंकि वो दर्शक दीर्घा में मौजूद थे। अब सोशल मीडिया पर लोग राहुल गाँधी को उनका ही किया लौटा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहा है – ‘राहुल गाँधी पनौती है।’ दिल्ली भाजपा महिला मोर्चा की स्टेट जनरल सेक्रेटरी वैशाली पोद्दार ने एक तस्वीर शेयर की, जिसमें राहुल गाँधी एक हुडी पहने हुए हैं और उस पर लिखा हुआ है – ‘पNAUTI’. बता दें कि ये एडिटेड तस्वीर है, लेकिन लोग इस पर खूब मजे ले रहे हैं।

1980 के बाद कांग्रेस के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब हिंदी बेल्ट के किसी भी राज्य में उसकी खुद की सरकार नहीं होगी. कांग्रेस की हार की सबसे ज्यादा चर्चा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर हो रही है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार रही है. 1980 के बाद कांग्रेस के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब हिंदी बेल्ट के किसी भी राज्य में उसकी खुद की सरकार नहीं होगी. कांग्रेस की हार पर बड़े नेताओं ने चुप्पी साध ली है.

कांग्रेस की हार की सबसे ज्यादा चर्चा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर हो रही है. पार्टी की इंटर्नल रिपोर्ट में इन राज्यों में जीत का दावा किया गया था. खुद राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में 135 सीट लाने का दावा किया था. वहीं कई सर्वे में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की मजबूत स्थिति बताई जा रही थी.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक तय परंपरा के हिसाब से पार्टी हार की समीक्षा करेगी और लोकसभा चुनाव के लिए खुद को तैयार करेगी. हालांकि, समीक्षा की बात कांग्रेस की नई नहीं है. राहुल गांधी पिछले 9 साल में 12 बार हार के बाद समीक्षा की बात कह चुके हैं.
सियासी जानकारों का कहना है कि इस बार भी हार के लिए क्षेत्रीय नेताओं से ज्यादा जिम्मेदार कांग्रेस हाईकमान ही है. आखिर क्यों, आइए विस्तार से जानते हैं…

1. कैंपेन को लेकर कन्फ्यूज रही कांग्रेस
कांग्रेस हाईकमान खासकर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की जोड़ी हिंदी बेल्ट के राज्यों में चुनाव से पहले गुटबाजी पर कंट्रोल नहीं कर पाई. छत्तीसगढ़ में चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी ने टीएस सिंहदेव के कद को और ज्यादा बढ़ा दिया, जिससे भूपेश बघेल गुट बैकफुट पर आ गया.
चुनाव से कुछ दिन पहले पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं करने का फैसला किया, जिसके बाद पार्टी को पूरी कैंपेनिंग स्ट्रैटजी बदलनी पड़ी. छत्तीसगढ़ में चुनाव से पहले कांग्रेस ‘भूपेश है तो भरोसा है’ का कैंपेन चला रही थी, जिसको खूब लोग सराह भी रहे थे.

लेकिन पार्टी हाईकमान के फैसले के बाद इस नारे को बदल दिया गया. पार्टी ‘कांग्रेस है तो भरोसा है’ के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी. कम समय होने की वजह से यह नारा लोगों को प्रभावित नहीं कर पाया.
राजस्थान में भी कांग्रेस आंतरिक तौर पर गुटबाजी खत्म नहीं कर पाई. अशोक गहलोत चुनाव प्रचार नहीं करने गए. इनमें दानिश अबरार की सवाई माधोपुर और चेतन डूडी की डिंडवाना सीट प्रमुख है.

राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की कोई भी संयुक्त रैली कांग्रेस अलग से नहीं करवा पाई.
2. टिकट बांटने में देरी ने गलत संदेश दिया
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी चुनाव से 3 महीने पहले टिकट की घोषणा कर दी, लेकिन कांग्रेस हाईकमान यह करने में नाकाम रहा. कांग्रेस की ओर से संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने यह दावा किया था कि पार्टी सितंबर तक सभी सीटों पर टिकट की घोषणा कर देगी, लेकिन यह दावा भी शिगूफा निकला.

कांग्रेस में नामांकन के आखिरी दिनों तक टिकट बंटवारे को लेकर खूब माथापच्ची हुई. कई बड़े नेताओं के टिकट कटने की बात कही गई, लेकिन आखिर में पार्टी ने बहुत कम टिकट काटे.

मध्य प्रदेश में तो टिकट बंटवारे को लेकर दिग्विजय और कमलनाथ आमने-सामने हो गए. राजस्थान में आखिरी चरण के टिकट बंटवारे के वक्त कांग्रेस चुनाव समिति की बैठक से राहुल गांधी गायब हो गए.
टिकट बंटवारे की खबरों ने कांग्रेस का खूब छीछालेदर किया, जिसे हाईकमान समझ नहीं पाई.
3. चुनावी राज्यों में कांग्रेस का मॉनिटरिंग सिस्टम कमजोर रहा
कांग्रेस ने चुनाव में मॉनिटरिंग के लिए वरिष्ठ प्रयवेक्षक नियुक्त किए थे, लेकिन पूरे चुनाव के परिदृश्य से वे सभी गायब रहे. राजस्थान में अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश में कमलनाथ ही सर्वे-सर्वा थे. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं ने हाईकमान से फ्रीहैंड ले लिया था.
दोनों राज्यों में हाईकमान ने जो प्रभारी नियुक्त किए थे, वो गहलोत और कमलनाथ से काफी कमजोर थे. राजस्थान में सुखजिंदर रंधावा को पार्टी ने प्रभारी बनाया था. रंधावा अशोक गहलोत से काफी जूनियर हैं.
मध्य प्रदेश की कमान भी पार्टी ने सुरजेवाला के हाथों में दी थी, जो कमलनाथ से काफी जूनियर हैं.
कांग्रेस हाईकमान मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन चाहती थी, लेकिन कमलनाथ की वजह से यह नहीं हो पाया. हाईकमान कमलनाथ पर दबाव बनाने में पूरी तरह नाकाम हो गई.

जानिए 5 कारण राहुल की मनमानी के

इन विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के कई कारण हो सकते हैं, परंतु देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अपनी हार के बड़े कारणों पर जरूर सोच-विचार करेगी. यदि ऊपरी तौर पर देखा जाए तो कांग्रेस की हार के 5 बड़े कारण ये हो सकते हैं-
1. कांग्रेस का लचर संगठन – जमीनी स्तर पर कांग्रेस का संगठन काफी कमजोर नजर आता है. एक समय था जब कांग्रेस सेवा दल, महिला कांग्रेस, सर्वोदय, यूथ कांग्रेस जैसे संगठन पार्टी के लिए खूब काम करते थे. उनका संपर्क सीधा लोगों से था और सरकार की नीतियों और योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचना सरल हो जाता था. परंतु पिछले काफी समय से ये सभी संगठन सुस्त नजर आते हैं. राज्य में सरकार होने के बावजूद वोटरों तक बात न पहुंचा पाना यही बताता है.

2. नेतृत्व में विश्वास की कमी – सबसे बड़े कारणों में एक कारण यह भी है कि कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर दिखने लगा है. हालांकि भारत जोड़ा यात्रा से राहुल गांधी को एक मास लीडर (जन-नेता) के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की गई. वह यात्रा जहां-जहां से गुजरी, वहां-वहां लोग जुड़ते भी दिखे, मगर जब तक भीड़ वोटों में तब्दील न हो, तब तक किसी भी नेता का जन-नेता बन पाना मुश्किल है. कांग्रेस के भीतरी संगठनों में ही अपने नेतृत्व के प्रति विश्वास की कमी नजर आती है, जिसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा को मिला है.

3. गुटबाजी – इस बार मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के अंदर ही बड़ी गुटबाजी देखने को मिली. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के गुटों में तकरार पहले दिन से ही उजागर थी. पूरे पांच सालों तक कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसे गड़बड़ी को ठीक करने में जुटा रहा. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद कई छोटे नेताओं ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया. तब से वह खाली जगह भरी नहीं गई है.
4. कमजोर कम्युनिकेशन – सवा है कि कांग्रेस के संगठन कमजोर क्यों हैं? दिखता है कि नेतृत्व की बात संगठन तक साफ-साफ नहीं पहुंच पा रही है. इस बार प्रियंका गांधी ने काफी प्रचार किया और कई तरह के वादे किए. परंतु वे वादे लोगों को समझ नहीं आए. इसे दूसरी तरह से कहा जाए तो कह सकते हैं कि प्रियंका अपनी बात लोगों को समझा नहीं पाईं. कमोबेश यही स्थिति राहुल गांधी की भी रही है. उन्होंने प्रचार किया, मगर लोगों से सीधे कनेक्ट नहीं कर पाए. इसके उलट भाजपा में नरेंद्र मोदी समेत सभी नेताओं की बातें लोगों समझ में आईं. चुनाव के नतीजे इस बात की गवाही देते हैं.

5. उलटे पड़ते बयान – कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करने की विफल कोशिश की. हर बार भाषायी सीमा लांघी गई और भाजपा ने इसे अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित बयान दिया था. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, “मोदी जी, झूठों के सरदार बन गए हैं.” प्रधानमंत्री मोदी को लेकर इस तरह की बयानबाजी होने से हर बार भाजपा को ही लाभ पहुंचा है.
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