सत्यमेव जयते (Satyamev Jayate)। भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य। संभवतः आप जानते होंगे कि यह मंत्र ‘मुण्डकोपनिषद्’ से लिया गया है। कहते हैं कि माण्डूक्य ऋषि ने इसकी रचना मदकू द्वीप (Madku Dweep) पर की थी। यह द्वीप आज के छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस द्वीप पर सबसे बड़ा जमावड़ा हर साल फरवरी में लगता है? यह जमावड़ा सप्ताह भर चलने वाले मसीही मेला को लेकर लगता है? मसीही मेला 113 साल से लग रहा है?
संभव है कि जिस तरह से हिंदुओं का ईसाई धर्मांतरण हो रहा है, जिस तरीके से ईसाई मिशनरी देश के गली-गली में पसर रहे हैं, वैसे में एक द्वीप पर मसीही मेला लगना आपके लिए आश्चर्यजनक न हो। लेकिन मदकू द्वीप की भौगोलिक स्थिति से परिचित होने पर यह न केवल आपको अचंभित करेगा, बल्कि ईसाई मिशनरियों के उस खतरनाक इरादे से भी परिचित करवाएगा जिसके तहत वे जल, जंगल, जमीन… हर जगह कब्जा कर रहे हैं। इसी रणनीति के तहत वे आबादी बहुल मैदान से लेकर निर्जन द्वीप तक फैल रहे हैं।
शिवनाथ नदी से घिरा मदकू द्वीप
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख शहर बिलासपुर से मदकू द्वीप करीब 40 किलोमीटर है। इस द्वीप पर पहुँचने के लिए आपको शिवनाथ नदी को पार करना पड़ता है। नदी पार करने का एकमात्र साधन नाव है। नदी तक पहुँचने से पहले आप बैतलपुर, सरगाँव जैसे ग्रामीण इलाको से गुजरते हैं। सड़क से गुजरते हुए घरों पर दिखने वाले क्रॉस के निशान और सड़क से सटे कब्रिस्तान इन इलाकों में ईसाई मिशनरियों की पहुँच की आपको पूर्व सूचना दे देते हैं। नदी पर एक एनी कट (पानी का प्रवाह रोकने के लिए निर्मित छोटा बाँध) बना हुआ है। नदी में जब पानी कम होता है तो एनी कट के रास्ते भी लोग पैदल या छोटे वाहनों से द्वीप तक चले जाते हैं। लेकिन सितंबर 2022 में जब हम मदकू द्वीप पहुँचे तो शिवनाथ नदी पूरे वेग में बह रही थी। एनी कट डूबा हुआ था।
नाम मदकू द्वीप क्यों?
इस जगह का नाम मदकू द्वीप होने के पीछे दो मुख्य तर्क दिए जाते हैं। इतिहासकार डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार यह जगह माण्डुक्य ऋषि की तपोस्थली थी। मदकू को माण्डुक्य का ही अपभ्रंश माना जाता है। दूसरा तर्क यह है कि शिवनाथ नदी की जलधारा के कारण यह जगह तैरते हुए मेढक जैसी दिखती है। मण्डूक का अर्थ मेढक भी होता है जो कालांतर में मदकू में परिवर्तित हो गया।
मदकू द्वीप का हरिहर क्षेत्र
नाव से जब आप करीब 50 एकड़ में फैले मदकू द्वीप पहुँचेंगे तो चारों तरफ घना जंगल दिखेगा। इसी घने जंगल के बीच स्थित है श्री हरिहर क्षेत्र। हरिहर क्षेत्र में कई मंदिर हैं। इनमें से एक प्राचीन गणेश मंदिर की पुनः प्रतिष्ठा 2021 में ही हुई है। इस मंदिर में भगवान गणेश की जो अष्टभुजी प्रतिमा है, वह 10-11वीं सदी की बताई जाती है। इसी मंदिर से सटा एक आवास है। इसमें हरिहर क्षेत्र के पुजारी वीरेंद्र शुक्ल अपने परिवार के साथ रहते हैं। शुक्ल ने ऑपइंडिया को बताया कि वे मूल रूप से मुंगेली जिले के ही लोरमी विकास खंड के तुरबारी पठारी गाँव के रहने वाले हैं। वे 1985 में अपने पिता के साथ इस द्वीप पर आए थे। मंदिर समिति ने पूजा-पाठ के लिए उनके पिता को यहाँ नियुक्त किया था। 1990 में वीरेंद्र शुक्ल के पिता का देहांत हो गया और उसके बाद से मंदिरों में पूजा-अर्चना का दायित्व उनके पास है।






