Monday, February 23, 2026
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राहुल गांधी के झूठ पर झूठ,समय आ गया संसद में बगैर सबूत बोलने वाले पर कार्यवाही का

संसद में खड़े होकर राहुल गाँधी ने विदेशी-लिबरल मीडिया को दिया प्रोपेगेंडा, जानिए SIR और चुनाव आयोग पर कैसे किया गुमराह: क्या है सच

लोकसभा में मंगलवार (09 दिसंबर 2025) को चुनाव सुधारों पर बहस के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बीजेपी पर लोकतंत्र को कमजोर करने का जोरदार आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वोट चोरी सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी कृत्य है और चुनाव आयोग (EC) को बीजेपी ने अपने कब्जे में ले लिया है।

संसद में राहुल ने तीन सवाल पूछे, 1-मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चुनाव आयुक्त के चयन पैनल से क्यों हटाया गया, 2-दिसंबर 2023 के कानून से चुनाव आयुक्तों को दंड से क्यों बचाया गया और 3- चुनाव के 45 दिन बाद सीसीटीवी फुटेज क्यों नष्ट की जा रही है।

राहुल गाँधी ने एक बार फिर से EVM का रोना रोया और हरियाणा चुनाव में वोट चोरी के सबूत पेश करने का दावा (हालाँकि सारे दावे फर्जी ही निकले हैं) किया।

राहुल गाँधी के पहले सवाल का ये है सही जवाब

खैर, राहुल गाँधी के पहले सवाल को देखें- तो सवाल ये है कि सीजेआई को चुनाव आयुक्त की चयन समिति से क्यों हटाया गया। तो सबसे पहले इस मुद्दे को जान लेते हैं। राहुल ने कहा कि चयन समिति में पीएम, विपक्ष नेता और एक केंद्रीय मंत्री हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में CJI को शामिल किया गया था। लेकिन तथ्य यह है कि कॉन्ग्रेस के शासनकाल में CEC की नियुक्ति पूरी तरह सरकार के हाथ में थी।

साल 1991 के कानून में कोई चयन प्रक्रिया नहीं थी, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर अपॉइंट करता था। सुप्रीम कोर्ट ने ही अंतरिम व्यवस्था दी थी, जिसे 2023 के कानून से बदला गया। यह ‘हटाना’ कम, SC फैसले को संसदीय कानून से ओवरराइड करना ज्यादा लगता है। हालाँकि यहाँ एक बात ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार ने ही इस फैसले में नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया है, वर्ना अभी तक कभी नेता प्रतिपक्ष की पूछ तक नहीं होती थी।

चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक इम्युनिटी देने की बात

दिसंबर 2023 के कानून से चुनाव आयुक्तों को इम्यूनिटी मिली है। राहुल गाँधी ने दावा किया कि यह 2024 चुनाव से ठीक पहले किया गया, ताकि गलत कामों पर कोई कार्रवाई न हो। उनका ये दावा पूरी तरह से फर्जी है, क्योंकि साल 2023 के एक्ट की धारा 16 में साफ है कि CEC/EC को आधिकारिक कर्तव्यों में किए कार्यों के लिए सिविल या क्रिमिनल केस से छूट है। लेकिन यह पूरी तरह बिना जवाबदेही नहीं है।

साल 2023 के कानून के मुताबिक, CEC को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जा सकता है। इसके लिए संसदीय कार्यवाही तय की गई है। यहाँ राहुल गाँधी ने ‘रिवेंज’ जैसे भारी भरकम शब्द का इस्तेमाल किया, लेकिन हकीकत ये है कि चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्रता दिए बिना उनसे निष्पक्ष काम की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हालाँकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला है, तो इस पर बहस की अभी कोई जरूरत नहीं दिखती।

राहुल गाँधी के तीसरे सवाल का जवाब भी पढ़िए

चुनाव के 45 दिन बाद सीसीटीवी फुटेज नष्ट करने के नियम को लेकर राहुल गाँधी ने फिर से मुद्दा बनाने की कोशिश की। राहुल ने कहा कि हर बूथ पर लगे कैमरों का डेटा हमेशा रखा जाना चाहिए, यह निष्पक्ष जाँच को रोकता है।

इस मामले की सच्चाई ये है कि चुनाव आयोग ने मई 2025 में गाइडलाइंस जारी की थी। इसमें 45 दिनों तक फुटेज रखने को कहा गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि अगर इन 45 दिनों में कोई विवाद नहीं है, कोई याचिका न आई हो तो इस फुटेज को नष्ट कर दिया जाएगा।

पहले ये समय 1 साल तक का था, लेकिन इस 1 साल में रिकॉर्डिंग के साथ कोई गलत हरकत न हो, इसके लिए चुनाव आयोग ने ये अवधि 45 दिन कर दी है। चुनाव आयोग ने प्राइवेसी का भी हवाला दिया है, क्योंकि वोटरों की तस्वीरें लीक हो सकती हैं।
ऐसे में देखें तो राहुल का ‘डिस्ट्रॉय’ शब्द नाटकीयता भरा है, जबकि 45 दिनों का प्रोसेस एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है। ये ठीक वैसे ही है, जैसे ईमेल या फोन गैलरी डिलीट करते हैं।

राहुल ने हरियाणा 2024 विधानसभा चुनाव में वोट चोरी के आरोप दोहराए। उन्होंने कहा कि 25 लाख फर्जी वोट डाले गए, जिसमें ब्राजीलियन मॉडल की फोटो 22 वोटर आईडी पर इस्तेमाल हुई- नाम सीमा, स्वीटी, सरस्वती आदि। ये आरोप ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में ही गलत पाई जा चुकी है। और इसे लेकर चुनाव आयोग के पास कोई आधिकारिक शिकायत भी दर्ज नहीं कराई गई, सिवाय पॉलिटिकल माइलेज लेने के लिए की गई प्रेस कॉन्ग्रेस के।

ईवीएम की तरफ घूमी राहुल गाँधी की सुई

अब राहुल गाँधी ने एक बार फिर से ईवीएम को निशाने पर लेने की कोशिश की है। ऐसे में ये जानना दिलचस्प होगा कि ईवीएम का कॉन्सेप्ट कब आया और कब लागू हुआ। पहली बार 1961 और 1971 में न सिर्फ SIR की जरूरत कॉन्ग्रेस के शासनकाल में बताई गई थी, बल्कि ईवीएम भी पहली बार कॉन्ग्रेस ही लेकर आई। वो भी कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान।

वैसे, अभी तक राहुल का फोकस वोटर लिस्ट पर था और अब उस फोकस को बिना अंजाम तक पहुँचाने वो फिर से ईवीएम की तरफ मुड़ते नजर आए। राहुल गाँधी का ये मेकशिफ्ट बताता है कि वो अपने किसी भी दावे को लेकर खुद ही पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं।

अपनी पसंद के CEC से लेकर तमाम बड़े पदों पर कॉन्ग्रेस बैठाती रही है ‘अपने’ लोग

कॉन्ग्रेस का अपने लोगों को ‘उपकृत’ करने का इतिहास जवाहरलाल नेहरू के समय से ही रहा है। आजाद भारत की पहली सरकार में ही जब देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन रिटायर हुए तो उन्हें सूडान में अधिकारी बना दिया गया। वीएस रमादेवी के रिटायर होने के बाद कॉन्ग्रेस ने उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बना दिया। अभी तक के सबसे ‘कड़क’ CEC माने गए TN शेषन के साथ तो कॉन्ग्रेस ने ऐसी प्रक्रिया शुरू कर दी, जो उसके इस मुद्दे की जान निकाल देता है।

शेषन जब रिटायर हुए, तो उन्हें बाकायदा कॉन्ग्रेस ने अपना कैंडिडेट बनाया और लोकसभा में चुनाव मैदान में ही उतार दिया। वहीं, शेषन के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बने मनोहर सिंह गिल (MS Gill) के मामले में तो कॉन्ग्रेस और आगे निकल गई। वो आईएएस अफसर से खेल सचिव बने, फिर उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया और ईवीएम को पूरे देश में लागू किया गया। वो रिटायर हुए, तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा और यूपीए-2 में मंत्री भी बना दिया।

खास बात ये है कि यूपीए के दौरान खानदानी कॉन्ग्रेसी नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया और यूपीए ने सत्ता में वापसी भी की। खास बात ये है कि चावला को पद से हटाना पड़ा था, क्योंकि वो कॉन्ग्रेस को चुनाव आयोग से जुड़ी जानकारियाँ ‘पास’ करते थे। चावला को हटाने के लिए उस समय उनके साथी चुनाव आयुक्तों ने ही कमर कसी थी।

एक खास बात पर ध्यान दिया जाए तो चावला को 1984 के दंगों की जाँच करने वाली एक कमीशन ने ‘किसी भी’ सार्वजनिक पद पर बैठने के लिए अयोग्य बताया था, हालाँकि कोर्ट ने उस समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया था। और बाद में यही चावला कॉन्ग्रेस के लिए चुनाव आयुक्त रहते हुए काम करते पकड़े गए।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का लोकसभा में दिया गया भाषण सिर्फ मीडिया में सुर्खियाँ पाने की कोशिश ही लगती है। फिर, वो बीते काफी समय से लगातार भारत के लोकतंत्र को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर प्रोपेगेंडा करते रहे हैं। ऐसे में लोकसभा में दिया गया उनका भाषण भी महज प्रोपेगेंडा ही साबित होकर रह गया, जो विदेशी मीडिया में शायद थोड़ी चर्चा पा जाए।

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