Monday, March 4, 2024
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गांधी जी खुद तो अंग्रेजी दवाई खाते थे,कस्तूरबा गांधी बीमार पड़ी तो बोले स्वदेशी अपनाओ,मर जाने दिया,खुद का ऑपरेशन भी करवाया

मोहनदास करमचंद गाँधी और उनके बेटे देवदास के बीच 21 फरवरी, 1944 को जोरदार झगड़ा हुआ था। देवदास अपनी बीमार पड़ी माँ कस्तूरबा गाँधी के लिए पेनिसिलिन का इंजेक्शन कोलकाता से लेकर पहुँचे थे और कस्तूरबा गाँधी निमोनिया की वजह से अपनी आखिरी साँसें गिन रहीं थी। मोहनदास गाँधी की जिद भारी पड़ी। उन्होंने पेनिसिलिन नहीं लेने दी और अगले दिन कस्तूरबा गाँधी की मौत हो गई। ऐसा इसलिए, क्योंकि गाँधी अंग्रेजी दवाओं के बेहद विरोधी थे, हद दर्जे तक जिद्दी भी।

उन्होंने कस्तूरबा के लिए भजन का इंतजाम किया, प्रार्थना करवाई और ‘मौत’ का इंतजार किया। उन्होंने इस बात की सफाई भी दी कि एक अंग्रेजी दवा उनकी जिद पर भारी कैसे पड़ सकती है। इस खास मुद्दे पर अंग्रेज लेखक एलेक्स वॉन तंजेलमन ने अपनी किताब ‘Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire’ के आठवें अध्याय ‘A New Theater’ में काफी गहराई से लिखा है। उस पृष्ठ को आप खुद पढ़ सकते हैं।

तुम ईश्वर पर भरोसा क्यों नहीं करते?

MK गाँधी ने कस्तूरबा को दवाई लेने से साफ मना कर दिया, जबकि कस्तूरबा मौत के बेहद थीं। वहीं, देवदास उन्हें हर हाल में पेनिसिलिन देना चाहते थे, क्योंकि वो उनके इलाज के लिए पेनिसिलिन कलकत्ता (अब कोलकाता) से लेकर पहुँचे थे। लेकिन, गाँधी के तीखे विरोध की वजह से वो कुछ कर नहीं सके। उन्होंने अपने पिता से जब बहस की, तो गाँधी ने कहा, “तुम ईश्वर पर भरोसा क्यों नहीं करते?”

इस किताब के मुताबिक, एमके गाँधी ने दवाई देने की जगह भजन गाने वालों को कस्तूरबा के कमरे में बुला लिया। उसके अगले ही दिन 22 फरवरी, 1944 को कस्तूरबा गाँधी की मृत्यु हो गई। गाँधी ने अपनी खास सहायिका, डॉक्टर और उनके ‘ब्रम्हचर्य के प्रयोग‘ में साथी रहीं सुशीला नैय्यर से बातचीत में कहा, “भगवान मेरी कितनी परीक्षा लेंगे? मैं अगर तुम्हें कस्तूरबा को पेनिसिलिन देने की आज्ञा दे देता, तो भी वो नहीं बचती। लेकिन ये मेरी आस्था की धज्जियाँ उड़ाने जैसा होता। वो मेरी गोद में मरी, इससे बेहतर कुछ हो सकता था? मैंने उन उपायों (अंग्रेजी दवा) को दूर रखकर अच्छा ही किया। “

इस घटनाक्रम का जिक्र सिबी के जोसेफ की पुस्तक ‘Kasturba Gandhi – An Embodiment of Empowerment‘ में भी किया गया है। इस पुस्तक के 22वें अध्याय ‘The Road to Martyrdom’ में सुशीला नैय्यर ने खुद इस बात का जिक्र किया है। अपने नोट्स में उन्होंने लिखा है कि गाँधी ने उन्हें बुलाया और सभी दवाइयों को बंद करने के लिए कहा। उन्होंने अपने बच्चों तक को गंभीर बीमारियों में भी अंग्रेजी दवा देने पर रोक लगाई थी।

गाँधी जी चाहते थे कि कस्तूरबा को खाना देने की जगह सिर्फ पानी और शहद दिया जाए। इस पुस्तक में गाँधी और उनके बेटे देवदास के बीच दवा देने के मुद्दे पर बहस की विस्तार से जानकारी दी गई है।

कस्तूरबा और बच्चों को अंग्रेजी दवाइयाँ लेने नहीं दी, लेकिन ये नियम खुद पर नहीं लगाया!

आधुनिक दवाओं के प्रति कठोरता दर्शाने वाले गाँधी अपने लिए व अपने अन्य करीबियों के लिए ये कठोरता नहीं बरत सके। कस्तूरबा को पेनिसिलिन देने तक से मना कर देने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी खुद की जिंदगी पर खतरा महसूस हुआ, तो न सिर्फ उन्होंने कई मेडिकल टेस्ट कराए, बल्कि सर्जरी का भी सहारा लिया। साल 2019 में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने गाँधी की 150वें जयंती के अवसर पर गाँधी और उनके स्वास्थ्य पर किताब प्रकाशित की थी। इसके अध्याय ‘गाँधी के स्वास्थ्य के साथ प्रयोग’ जिसके नेशनल गाँधी म्यूजियम के अन्नाललाई ने लिखा है, इसमें 12 जनवरी 1924 को गाँधी के अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बारे में विस्तार से लिखा है।

किताब में लिखा है, “गाँधी पुणे के सैसून अस्पताल के आपात विभाग में भर्ती हुए थे। साल 1922 से वो सेडिसन केस में 6 साल की सजा काट रहे थे। दो साल बाद ही उनके अपेंडिक्स में दिक्कत हुई, जिसका ऑपरेशन 12 जनवरी, 1924 में किया गया। वहाँ बिजली नहीं थी। तूफान चल रहा था। लैंप की रोशनी में ये ऑपरेशन पूरा किया गया। गाँधी का ऑपरेशन ब्रिटिश कर्नल मैडोक ने किया था। ऑपरेशन के बाद सर्जन, नर्स और पूरी मेडिकल टीम को गाँधी और कस्तूरबा ने धन्यवाद कहा था और उनके साथ तस्वीर भी खिंचाई थी। साल 1931 में जब वो लंदन गए, तो उन्होंने कर्नल मैडोक से भी मुलाकात की थी।”

गाँधी के ऑपरेशन का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन मौजूद है, इसे आप यहाँ भी चेक कर सकते हैं। ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट में लिखा गया है कि गाँधी चाहते थे कि उनकी सर्जरी डॉ दलाल और डॉ जीवराज करें, लेकिन वो उस समय मुंबई में थे। ऐसे में अंग्रेज चिकित्सक डॉ कर्नल मैडोक ने जब कहा कि उन्हें तुरंत ऑपरेशन कराना जरूरी है, तो फिर पुणे के सैसून अस्पताल में उनकी इस सर्जरी को अंजाम दिया गया। अब इस अस्पताल को मेमोरियल में बदल दिया गया है।

मनु के ऑपरेशन के समय ऑपरेशन थिएटर में ही मौजूद रहे गाँधी

डीडी न्यूज के वरिष्ठ सलाहकार संपादक प्रखर श्रीवास्तव ने पत्रकार राहुल देव के गाँधी की अंग्रेजी दवाओं की जिद के दावे पर जवाब दिया है। उन्होंने लिखा, “ये बात सही है कि गाँधी जी अंग्रेजी दवाओं और इलाज के विरोधी थे, लेकिन जब बात उनकी पोती मनुबेन की जीवन रक्षा की आई तो उन्होंने अंग्रेजी शल्य-चिकित्सा की तरफ रुख कर लिया था। मनुबेन को जब अपेंडिक्स की समस्या हुई तो गाँधी जी ने उनका ऑपरेशन पटना के अस्पताल में करवाया था। 15 मई, 1947 को हुए इस पूरे ऑपरेशन के दौरान गाँधी जी ऑपरेशन थिएटर में मौजूद रहे और अपनी आँखों से पूरी शल्यक्रिया देखी।”

राहुल देव ने लिखा था, “अंग्रेज़ी दवाओं का विरोध-प्राकृतिक चिकित्सा-आयुर्वेद और राम नाम पर गाँधी की आस्था इतनी प्रबल थी कि उन्होंने बार-बार अपनी-बा और बेटे की ज़िंदगी को दाँव पर लगाया।”

गाँधी ने खुद अपनी डायरी में 15 मई, 1947 को इस बात का ब्यौरा दर्ज किया है, “मनु को पेट में भयंकर दर्द हो रहा है। उसे उल्टियाँ हो रही हैं और बुखार बढ़ता जा रहा है। मैंने डॉक्टरों को उसकी जाँच के लिए बुलाया। उसे अपेंडिक्स की समस्या निकली। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया जा रहा है, रात में उसका ऑपरेशन किया जाएगा। मैंने सर्जिकल मास्क पहना और पूरे ऑपरेशन की प्रक्रिया को देखा। उसे रात में 10.30 बजे ऑपरेशन रूम में ले जाया गया और 11.10 तक उसका ऑपरेशन हुआ। डॉ कर्नल भार्गव ने उसका ऑपरेशन किया था। मैं 11.30 बजे सोने चला गया।”

आईसीएमआर की किताब के मुताबिक, गाँधी ने अपने नोट्स में लिखा था कि उन्होंने मिट्टी से दर्द को कम करने की कोशिश की थी। उन्होंने अगले दिन मनु के पिता और अपने पुत्र जयसुखलाल गाँधी को बुलाया और कहा, “दिल्ली में ही मुझे इसके अपेंडिक्स होने का शक था। पर मुझे उम्मीद थी कि मैं मिट्टी के पैक से उसे ठीक कर ले जाऊँगी, लेकिन वो कारगर साबित नहीं हुआ। इसकी मैंने कल डॉक्टरों को बुलाया था। उन्होंने ऑपरेशन की सलाह दी और मैंने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी।”

बता दें कि मनु गाँधी की पोती थी और उनके कथित ‘ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ में शामिल की जाती थी। इसमें गाँधी नग्नावस्था में लड़कियों के साथ सोते थे और नग्न लड़कियाँ ही उन्हें स्नान कराती थीं। वो गाँधी के साथ ही दिखती थी, साथ में गाँधी की एक और पोती आभा होती थी, जो उन्हें चलने-फिरने में भी मदद करती थीं।

‘इंडिया टुडे’ ने साल 2013 में मनुबेन की डायरियाँ हासिल की थी। इसमें खुलासा हुआ था कि गाँधी उनके जीवन को हर तरह से अपने कंट्रोल में रखते थे, यहाँ तक कि भोजन, शिक्षा, सोना, आराम करने का समय और क्या कपड़े वो पहनेंगी, इस पर भी गाँधी की ही मनमानी चलती थी। मनुबेन को उनके साथ उसी बेड पर सोना पड़ता था, जिसपर मोहनदास करमचंद गाँधी सोते थे। वैसे, मनु के ऑपरेशन के समय ऑपरेशन थिएटर में बैठे गाँधी की तस्वीरें पब्लिक डोमेन में मौजूद हैं। आप इन्हें यहाँ और यहाँ भी देख सकते हैं।

 

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