Thursday, February 26, 2026
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राजनैतिक चूतिया कार्यकर्ताओं और उनसे बड़े चूतिया नेताओं का देश भारत,

जिस डील को लेकर ड्रामा हो रहा है,अभी साइन ही नहीं हुई,और मंद बुद्धि की बकवास चालू,

कॉन्ग्रेस, अब ‘PM Compromised’ का दे रही फर्जी नारा: जानें कैसे India-US डील पर झूठ फैला रहे राहुल गाँधी

सत्ता की भूख में डूबी भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की राजनीति ने उसकी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रति दुश्मनी और राष्ट्रहित के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। नई दिल्ली की सत्ता में वापसी की बेचैनी के चलते पार्टी लगातार तथ्यों से दूर होती गई और जनता को अपने भ्रामक नैरेटिव के समर्थन में खड़ा करने के लिए अजीबोगरीब दावे और असत्य आरोपों का सहारा लेती रही, जबकि उसके राजनीतिक इतिहास में कई बार बड़ी विफलताएँ दर्ज हैं।

इसी क्रम में अब कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया है। इस बार मुद्दा भारत-अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते से जुड़ा है। यह हमला उस समय किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ को अवैध करार दिया है। कॉन्ग्रेस इस फैसले के बाद व्यापार समझौते को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर सवाल उठाने की कोशिश कर रही है।

राहुल गाँधी की चुनौती दी- PM मोदी रद्द करें भारत-US ट्रेड डील, जो है ही नहीं

राहुल गाँधी ने मंगलवार (24 फरवरी 2026) को भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को ‘भारतीय किसानों के दिल में धंसा तीर’ बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझौता कर चुके नेता के रूप में चित्रित करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया और कहा, ‘उन्हें फँसाया गया और समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया।’

राहुल गाँधी ने इस समझौते की मंजूरी के पीछे केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति गौतम अडानी की भूमिका होने का भी आरोप लगाया। भोपाल में आयोजित किसान महाचौपाल रैली में उन्होंने कहा, “अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया। इसके बाद उन देशों ने तुरंत अपने व्यापार समझौते समाप्त कर दिए। लेकिन नरेंद्र मोदी ने एक शब्द तक नहीं कहा। मैं इसी मंच से उन्हें खुली चुनौती देता हूँ कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता रद्द करें। अगर हिम्मत है तो करके दिखाएँ।”

उन्होंने आगे आरोप लगाया, “मैं भाजपा कार्यकर्ताओं से कह रहा हूँ कि वह कुछ नहीं करेंगे, क्योंकि उन पर अमेरिका और ट्रंप का दबाव है। वह इसलिए भी कार्रवाई नहीं करेंगे क्योंकि एपस्टीन फाइल्स का खतरा मंडरा रहा है और अडानी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। भारत के साथ विश्वासघात हुआ है, यही सच्चाई है।”

राहुल गाँधी  जो रायबरेली से सांसद हैं, उन्होंने दावा किया कि डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वयं ट्वीट कर बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे बातचीत कर आश्वासन दिया था कि चार महीने से लंबित पड़े इस समझौते पर वह हस्ताक्षर करेंगे।

उन्होंने आरोप लगाया, “प्रधानमंत्री लोकसभा से भाग गए और अगले दिन झूठा बहाना बनाया कि कॉन्ग्रेस की महिला सांसद उन पर हमला करने की योजना बना रही थीं। सच्चाई यह है कि वे संसद में खड़े नहीं हो पाए और उन्होंने ट्रंप को फोन किया।”

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने आगे कहा कि लोक सभा में इस मुद्दे पर जवाब देने से बचने के बाद प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल से भी कोई परामर्श नहीं किया। उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी का नाम लेते हुए कहा कि ट्रंप से बातचीत से पहले कैबिनेट को विश्वास में नहीं लिया गया था।

राहुल गाँधी ने आगे आरोप लगाया, “अमेरिका में एपस्टीन फाइल्स की लाखों दस्तावेजें अटकी हुई हैं। करीब 30 लाख दस्तावेज, जिनमें वीडियो, ईमेल और संदेश शामिल हैं, अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। हरदीप सिंह पुरी का नाम जारी कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की गई कि समझौते का पालन करो, नहीं तो और खुलासे किए जाएँगे।” उन्होंने इसे इस व्यापार समझौते के पीछे कथित पहला कारण बताया।

राहुल गाँधी ने आगे उद्योगपति अनिल अंबानी का भी उल्लेख किया, जिनका नाम उन विवादित फाइलों में सामने आया था। उन्होंने कहा, “अनिल अंबानी मेरे मित्र नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को उनके साथ अपने संबंध स्पष्ट करने चाहिए। ऐसे और भी कई नाम हैं जो अभी सामने आने बाकी हैं।”

इसके बाद उन्होंने गौतम अडानी का जिक्र करते हुए उन्हें दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण बताया। राहुल गाँधी ने आरोप लगाया, “अडानी ने देश पर कब्जा कर लिया है, एयरपोर्ट से लेकर सीमेंट तक हर जगह उनका नाम है। यह कोई छोटी कंपनी नहीं है, बल्कि यह नरेंद्र मोदी और भाजपा की वित्तीय संरचना है। अडानी पर अमेरिका में आपराधिक आरोप लगे हैं। वह अमेरिका या यूरोप नहीं जा सकते और जेल जाने के डर में हैं। इस मामले का असली निशाना अडानी नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी हैं। यही दो कारण हैं कि मोदी संसद से भागे और ट्रंप से कहा कि वह सभी शर्तें मानने को तैयार हैं और समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।”

भारत-अमेरिका समझौता और कॉन्ग्रेस के लगाए आरोपों की सच्चाई

वास्तविकता राहुल गाँधी के बयानों से बिल्कुल अलग है। भारत और अमेरिका के बीच अभी तक कोई अंतिम व्यापार समझौता लागू नहीं हुआ है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने केवल एक रूपरेखा (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) को मंजूरी दी है और फिलहाल विस्तृत बातचीत जारी हैं, जैसा कि सामान्यतः FTA के मामलों में होता है।

 

 

ऐसी बातचीत कई महीनों से लेकर कई सालों तक चल सकती हैं, जब तक दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य शर्तें तय न हो जाएँ। दरअसल, अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भारत का एक प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन जाने वाला था, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह दौरा स्थगित कर दिया गया।

केंद्र सरकार ने द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक धैर्य और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। इससे भारत को अन्य देशों की तरह जल्दबाजी में समझौता करने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास शर्तों पर पुनर्विचार करने और बेहतर सौदेबाजी की अधिक गुंजाइश है।

इसी प्रकार यह भी स्पष्ट है कि नई दिल्ली ने मोदी सरकार के तहत स्वतंत्र और संप्रभु विदेश नीति को बनाए रखा है। व्हाइट हाउस द्वारा 50% टैरिफ लगाए जाने, रूसी तेल के आयात को रोकने की धमकियों और भारत-पाकिस्तान युद्धविराम वार्ता को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के दावों के बावजूद भारत अपने रुख से नहीं हिला।

दूसरी ओर, विपक्ष और उससे जुड़े समूहों ने हर बड़े समझौते के बाद किसानों को भड़काने की कोशिश की है, ताकि असंतोष पैदा हो और प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुँचे। हालाँकि सरकार लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि सभी समझौते किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित समझौता भारत के कृषि हितों, विशेषकर खेती और डेयरी क्षेत्र की पूरी तरह रक्षा करता है। उनके अनुसार, “किसी भी बाजार खंड को इस तरह नहीं खोला गया है जिससे भारतीय किसानों को नुकसान हो।”

पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट कहा था, “हमारे लिए किसानों का हित सर्वोपरि है। भारत कभी भी किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगा। व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़े तो भी मैं तैयार हूँ।”

जहाँ तक संसद से अनुपस्थित रहने का सवाल है, प्रधानमंत्री विपक्ष का सामना करने से नहीं भागे थे। लोक सभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें संभावित अप्रिय स्थिति से बचने के लिए आने से मना किया था। बिरला ने कहा, “मुझे विश्वसनीय जानकारी मिली थी कि कॉन्ग्रेस के कुछ सदस्य प्रधानमंत्री की सीट तक पहुँचकर अप्रत्याशित घटना को अंजाम दे सकते थे।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी कोई घटना होती, तो इससे राष्ट्र की गरिमा को गंभीर क्षति पहुँचती। इसी कारण प्रधानमंत्री से संसद न आने का अनुरोध किया गया था।

अडानी की बार-बार की बयानबाजी

इंडियन नैशनल कॉन्ग्रेस (INC) ने चुनावी मैदान में साफ़्रन पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी को हारने में असफल रहने के बाद अडानी और अंबानी पर तंज कसने की रणनीति अपनाई है।

राहुल गाँधी  ने एक बार फिर पुराने आरोप दोहराते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी, गौतम अडानी के साथ मिलीभगत में हैं और अमेरिका में उन्हें बचाने के लिए राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचाया गया।

इससे पहले वे यहाँ तक कह चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प को अडानी के मुद्दे पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहिए। हालाँकि इन कथित सांठगांठ के आरोपों को स्वयं उद्योगपति ने खारिज किया है और इनके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य भी सामने नहीं आया है।

वहीं, कॉन्ग्रेस पर दोहरे मापदंड और स्पष्ट पाखंड के आरोप भी लगते रहे हैं, क्योंकि जिन राज्यों में उसकी या विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहाँ अडानी समूह के साथ व्यावसायिक गतिविधियाँ जारी हैं, जबकि सार्वजनिक मंचों से बिना प्रमाण आरोप लगाए जाते हैं।

2023 में ‘आप की अदालत’ कार्यक्रम में पत्रकार राजत शर्मा से बातचीत में गौतम अडानी ने कहा था, “आप प्रधानमंत्री मोदी से कभी व्यक्तिगत लाभ नहीं ले सकते। आप राष्ट्रीय हित की नीतियों पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन जब नीति बनती है तो वह सबके लिए होती है, सिर्फ अडानी समूह के लिए नहीं।”

उन्होंने यह भी बताया, “हम हर राज्य में अधिकतम निवेश करना चाहते हैं। अडानी समूह 22 राज्यों में काम कर रहा है और ये सभी भाजपा-शासित नहीं हैं। हम वामपंथी सरकार वाले केरल में भी काम कर रहे हैं, ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में नवीन पटनायक के ओडिशा में जगनमोहन रेड्डी के आंध्र प्रदेश में और के चंद्रशेखर राव के तेलंगाना में भी।” इस तरह उन्होंने यह संकेत दिया कि विभिन्न दलों द्वारा शासित राज्यों में भी उनके साथ कारोबार हो रहा है।

गौरतलब है कि अडानी और मुकेश अंबानी की संपत्ति में तेज वृद्धि संयुक्त प्रगतशील गठबंधन (UPA) सरकार के कार्यकाल के दौरान भी हुई थी, जबकि अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि केवल मोदी सरकार ने कथित क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा दिया। 2011 में अडानी समूह के प्रमुख की संपत्ति बढ़कर 33211 करोड़ रुपए हो गई थी, जिससे वे देश के बड़े  संपत्ति सृजनकर्ताओं में शामिल हुए।

इसके अलावा न तो अडानी समूह और न ही रिलायंस समूह उन कंपनियों की सूची में शामिल थे जिन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे थे। इससे भाजपा के साथ उनके कथित वित्तीय संबंधों के आरोपों को और कमजोर माना गया। बावजूद इसके, कॉन्ग्रेस द्वारा इन मुद्दों पर लगातार हमले जारी रखे गए, यहाँ तक कि देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ दावों को खारिज किए जाने के बाद भी।

हरदीप पुरी का प्रोपेगैंडा में शामिल होना

हरदीप सिंह पुरी का नाम एपस्टीन फाइल्स में सामने आने के बाद INC ने इसे मोदी सरकार को घेरने के लिए एक गोटचा मोमेंट की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की। हालाँकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित ईमेल्स पेशेवर प्रकृति के थे और उनका दिवंगत बदनाम फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन से जुड़े किसी भी आपराधिक या संदिग्ध आचरण से कोई संबंध नहीं था।

इस बात की ओर अमित मालवीय ने भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता की एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि जिन संवादों का हवाला दिया जा रहा है, वे आधिकारिक और पेशेवर प्रकृति के थे, न कि किसी अवैध या अनैतिक गतिविधि से जुड़े।

हरदीप सिंह पुरी ने NDTV को दिए एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा, “तीन मिलियन ईमेल्स में से सिर्फ तीन-चार संदर्भ हैं। मैं एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में एपस्टीन से कुछ मौकों पर मिला और केवल एक ईमेल का आदान-प्रदान हुआ। हमारी बातचीत का उसके अपराधों से कोई लेना-देना नहीं था। हमने ‘मेक इन इंडिया’ पर चर्चा की थी।”

उन्होंने आगे कहा, “मुझे एपस्टीन की गतिविधियों में कोई रुचि नहीं थी। उनके लिए मैं सही व्यक्ति नहीं था।”

पुरी ने यह भी जोड़ा, “मैं इस मुद्दे पर रक्षात्मक नहीं होना चाहता। मैं अपने जीवन में बहुत से लोगों से मिलता हूँ। जिन राजनीतिक स्तर के लोगों से मैं मिलता हूँ, उनमें से कई किसी न किसी मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं। कल ही कोई मुझसे ऐसे व्यक्ति के बारे में बात कर रहा था जो अंग तस्करी के मामले में दोषी था।” उनका कहना था कि केवल संक्षिप्त पेशेवर संपर्क के आधार पर उन्हें जेफरी एपस्टीन के कृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराना निरर्थक है।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दोहराया कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत पद से इस्तीफा देने के बाद उन्हें कुछ महीनों पश्चात अंतर्राष्ट्रीय शांति संस्थान (IPI) से जुड़ने का निमंत्रण मिला।

उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं IPI का स्थायी हिस्सा नहीं था। मैं IPI के तहत स्थापित ‘इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन मल्टीलेटरलिज्म’ (ICM) का महासचिव था। IPI में मेरे वरिष्ठ टेरजे रोड-लार्सन थे, जो जेफ्री एपस्टीन को जानते थे। IPI या ICM के प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में ही मैं उनसे तीन या अधिकतम चार बार मिला।”

‘चौकीदार चोर है’ से ‘पीएम समझौतावादी हैं’: कॉन्ग्रेस की एक और बड़ी गलती जारी है

INC और पूरे विपक्ष ने 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले राफेल लड़ाकू विमानों से जुड़े कथित घोटाले का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के नाम का भी हवाला दिया, ताकि भाजपा के चुनावी अभियान को रोक सकें।

हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अवसर में बदलते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने देश के चौकीदारों का अपमान किया है। इसके जवाब में उन्होंने ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू किया, जिसने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया और विपक्षी नैरेटिव को कमजोर कर दिया।

चुनाव परिणामों में NDA ने 353 से अधिक सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया। बीजेपी ने अकेले 300 से अधिक सीटें जीतीं, जबकि कॉन्ग्रेस 55 से भी कम सीटों पर सिमट गई।

राहुल गाँधी स्वयं अपने पारंपरिक गढ़ अमेठी से चुनाव हार गए और संसद में बने रहने के लिए उन्हें वायनाड से चुनाव लड़ना पड़ा। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट के नाम का राजनीतिक रूप से उपयोग करने पर उन्हें कोर्ट में माफी भी माँगनी पड़ी।

इसी प्रकार ‘प्रधानमंत्री समझौता कर चुके हैं’ वाली टिप्पणी को लेकर भी एक समान राजनीतिक रणनीति देखने को मिल रही है। भारत मंडपम में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट के दौरान इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने ‘गंदी और शर्मनाक राजनीति’ करार दिया। इसके बाद राहुल गाँधी ने एक वीडियो जारी कर कहा, “मैं और कॉन्ग्रेस के शेरदिल योद्धा देश की रक्षा करते रहेंगे, एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।”

उन्होंने वर्तमान में प्रसारित हो रहे गंभीर आरोपों को दोहराया, जो 2019 के नारे की तरह ही पुराने राजनीतिक फॉर्मूले की पुनरावृत्ति माने जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, नकारात्मक और व्यक्तिगत हमलों की राजनीति को आमतौर पर व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलता, जिससे विपक्ष की नाराजगी और कटुता बढ़ती है।

प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी या उपहास पहले भी इन दलों के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस अपने पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों पर कायम दिखाई देती है, भले ही इससे उसके चुनावी भविष्य या देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।

 

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