Tuesday, April 16, 2024
Uncategorized

पाकिस्तान, अफगानिस्तान में 7 से 11 साल के लड़के हो रहे शिकार

हम आपको जो बताने जा रहे है वो जान कर शायद आपको थोड़ा अजीब लगे या शायद आपको ये झूठ लगे लेकिन ये कहानी बिलकुल सच है और पूरी हिम्मत के साथ आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए.
हर देश की अपनी अपनी परंपरा और रीति रिवाज़ होते है लेकिन पाकिस्तान/ अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसा tradition है जो शायद ही आपने कभी सुना होगा. इस रिवाज़ का नाम है बच्चा बाज़ी (Bacha Bazi in Afghanistan).
क्या है बच्चा बाज़ी ( Bacha Bazi )?
अफ़ग़ानिस्तान के कई पिछड़े इलाके अभी भी ऐसे है जहाँ ये कुरीति आज भी ज़िंदा है. इस रिवाज़ के मुताबिक बच्चा का अर्थ है लड़का और बाज़ी का मतलब है उसे उठा लेना. यहाँ के कई इलाको में जो समृद्ध या अमीर अफ़ग़ान है वो या तो लड़को को अगवा कर लेते है या उन्हें गरीब परिवारों से खरीद लिया जाता है. और फिर उन्हें एक लड़की की तरह कपडे पहनाये जाते है और यही नहीं उन्हें लड़कियों की तरह नृत्य करना भी सिखाया जाता है.

Bacha Bazi in Afghanistan
अफ़ग़ानिस्तान के कई इलाको में मर्द जम कर पार्टी करते है और इन्ही पार्टियों में उन लड़को को औरतों के कपडे पहना कर नाचने पर मजबूर किया जाता है. सिर्फ यही नहीं, पार्टी ख़त्म होने के बाद सभी पुरुष उस लड़के के साथ सोने के लिए आपस में बाज़ी लगते है जिसे कि Bacha Bazi कहते है.
अफ़ग़ान के कुछ पिछड़े इलाको में ये मान्यता है कि स्त्री सिर्फ बच्चे पैदा और उनके पालन पोषण के लिए है इसलिए वे किशोरी लड़को को अपनी हवस का शिकार बनाते है. ये प्रथा अफ़ग़ान में बहुत पहले से मुजूद है. बजाये के इस प्रथा को बाल यौन शोषण घोषित करने के वहां के लोग इस प्रथा को इसलिए जारी रखे है क्यूंकि बे इसे अपने समृद्ध होने का प्रतीक मानते है.
Bacha Bazi in Afghanistan
रूढ़िवादी समाज होने के कारण माँ बाप खुल कर इस कुरीति का विरोध नहीं कर पाते. वहां के कई डॉक्टर्स ने बताया कि जो बच्चे इलाज के लिए हॉस्पिटल आते है उनके माँ बाप उनसे इस बात को छुपाने की कोशिश करते है क्यूंकि वे नहीं चाहते कि किसी को उनके बच्चो के बारे में पता चले. इन बच्चो का करीब 20 साल की उम्र तक यौन शोषण होता है और फिर उन्हें छोड़ दिया जाता है. चूँकि, वहां का समाज रूढ़िवादी है, ज़्यादातर लड़के इस बारे में किसी से बात नहीं करते और मानसिक तौर पर कमज़ोर हो जाते है.

 

अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा देश है, जहां समलैंगिकता को गैर-इस्लामिक और अनैतिक कहकर बार-बार गुनाह बताया गया है. अफ़ग़ानिस्तान में इस बारे में बात तक नहीं होती. मीडिया इसे कवर नहीं करता. मगर इसी देश में लड़कों के साथ नाच के नाम पर रेप किया जाता है. इससे हमें मालूम पड़ता है कि जिस नैतिकता और इस्लाम का ये हवाला देते हैं वो कितना दोगला है.

अफ़ग़ानिस्तान में इस प्रथा को बच्चाबाज़ी कहते हैं. बड़ी-बड़ी पार्टियों में, जो अमीर पुरुष देते हैं, में इन बच्चों को बुलाया जाता है. बच्चों की उम्र 10 साल जितनी कम भी हो सकती है. इन बच्चों को अश्लील गानों पर नचाते हैं. ऐसे गाने जिनमें ‘ऐ लड़के, तुमने मेरे बदन में आग लगा दी है’ जैसे बोल होते हैं. नाच ख़त्म होने के बाद बच्चों को खिलौनों की तरह इन पुरुषों के हवाले कर दिया जाता है ताकि वो उनका रेप कर सकें.

हालांकि लोग जब भी तालिबान का नाम लेते हैं, हमें मानवाधिकारों का हनन ही याद आता है. लेकिन बच्चाबाज़ी की प्रथा को रोकने की कोशिश सबसे पहले तालिबान ने ही की थी. तालिबान की ये हरकत लोगों को पसंद नहीं आई थी.

इन लड़कों को ‘बच्चा बेरीश’ कहते हैं. जिसका अर्थ होता है ‘लौंडा’. ये लौंडे एक मालिक के घर में रहते हैं. और उसकी पार्टियों में लोगों का मनोरंजन करते हैं. बदले में उन्हें रहने के लिए पनाह, कपड़े और खाना मिल जाता है. इन बच्चों को बच्चाबाज़ी के कुएं में धकेलने वाली सबसे बड़ी वजह है गरीबी. जिसके पास खाने को नहीं है, उसे जिंदा रहने का बस एक ही तरीका दिखाई पड़ता है. एक बेहतर जीवन की तलाश में लड़के इस तरफ आकर्षित हो जाते हैं. इसके अलावा कई बार बच्चों को किडनैप कर बेचा भी जाता है.

तालिबान के राज में इस प्रथा का लगभग सफाया हो गया था. इसके लिए लोगों ने तालिबान से ख़ूब नफरत की. मगर जैसे ही तालिबान की जगह सिविल गवर्नमेंट वापस आई, देश के अमीरजादों ने अपना प्रिय काम फिर से करना शुरू कर दिया. ये प्रथा ख़त्म इसलिए भी नहीं हो पाती है क्योंकि ये शौक अमीरों का है. जो आदमी किसी लौंडे को अपने घर में पालने में समर्थ होता है, वो अमीर होता है. पैसों से उनकी इज़्ज़त बनती है. अगर कोई व्यक्ति एक से ज्यादा लौंडों को पाल पा रहा है, तो ये और भी बड़ी बात होती है. क्योंकि लौंडों की सभी जरूरतों को मालिक ही पूरा करता है.

ये युवा लड़के अक्सर अपने साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव के ट्रॉमा से निपटने के लिए नशे का सहारा लेते हैं. चूंकि ये अब परिवार के साथ नहीं रहते, न ही इनकी कोई इज़्ज़त रह जाती है, इसलिए इनको होने वाला दर्द शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होता है. नतीजा, ड्रग्स. अगर ये किसी तरह मालिक के चंगुल से बच भी निकलें, तो इन्हें कोई रोजगार देने को तैयार नहीं होता. या तो ये फिर से नाच के काम में वापस आ जाते हैं, या दूसरे बच्चों का सौदा करने वाले दलाल बन जाते हैं.

सबसे बुरी बात ये है कि ये पीडोफीलिया जैसे गुनाह को आम बना देता है. जब उनसे पूछो कि आप तो समलैंगिकता को गलत मानते हैं, वो कहते हैं कि ये समलैंगिकता तो है ही नहीं. समलैंगिकता में तो प्रेम होता है, दोनों पार्टनर्स की सहमति होती है. ये तो बस मज़े के लिए किया गया एक काम है. ये तो मालिक और नौकर के बीच का एक रिश्ता है.

संयुक्त राष्ट्र में विवादित क्षेत्रों के बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था देखने वाली राधिका कुमारस्वामी ने एक इंटरव्यू में ‘फ्रंटलाइन’ को बताया:

जब भी अफगानियों के सामने, यहां तक कि उनके बड़े अधिकारियों के सामने इस बात का जिक्र किया है, वो हमेशा ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं जैसे उनके ऊपर कोई बम गिरा दिया गया हो. ये विषय बात करने के लिए नहीं है. बल्कि एक व्यक्ति ने तो मुझसे कह भी दिया था, ‘ऐसे विषयों पर हम बात नहीं करते. पहले युद्ध ख़त्म करना है. फिर दूसरी चीजों के बारे में सोचेंगे.’ एक मीटिंग में जिक्र कर दिया तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. मैंने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका जिक्र किया, तो पत्रकार झेंप कर हंसने लगे जैसे ये बात करने का टॉपिक है ही नहीं.

इस प्रथा के बारे में काफी लिखा गया, डॉक्यूमेंट्री बनाई गई. लेकिन ये रुकने का नाम नहीं लेती. इतना ट्रॉमा, इतना दर्द, इतनी हिंसा, इतनी बेइज़्ज़ती, सब चुपचाप सहते हैं ये बच्चे. नेताओं और धर्मगुरुओं ने कई बार इसे ख़त्म करने की कोशिश की, लेकिन कुछ हुआ नहीं. सिर्फ इन अमीरज़ादों को रोकना ही जरूरी नहीं, उन लड़कों को रोजगार दिलाना भी जरूरी है जो अपने ट्रॉमा के बाद दलाल बन दूसरे लड़कों को इसमें खींचने की कोशिश करते हैं.

Leave a Reply