पटना. बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर द्वारा रामचरितमानस को लेकर दिये गए विवादास्पद बयान में नया मोड़ आ गया है. चंद्रशेखर का आरजेडी नेता उदय नारायण चौधरी के साथ बातचीत का वीडियो वायरल हुआ है. ये बातचीत तब हुई जब आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी जमुई संसदीय क्षेत्र के सिमलतुला में आरजेडी समर्थकों के साथ बैठक कर रहे थे. भरी बैठक में उन्होंने लाउडस्पीकर पर फोन को रख कर बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर को कॉल लगाया था. दो दिन पहले जमुई से लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगे आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व स्पीकर उदय नारायण चौधरी पार्टी के कुछ नेताओं के साथ बैठे थे.
पार्टी के लोगों ने ही उनसे कहा कि शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर को फोन कर आमंत्रित करें और वहां किसानों की तरफ से दान दी गई जमीन पर स्कूल खोले जाने का आग्रह करें. इसके बाद शिक्षा मंत्री को फोन मिलाया गया था. चंद्रशेखर अपनी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के सामने वहां बैठे लोगों को ट्रेनिंग देने लगे कि कैसे रामचरित मानस के बहाने सवर्णों पर हमला बोलना है. चंद्रशेखर ने अपनी पूरी प्लानिंग भी बतायी. शिक्षा मंत्री ने बताया कि रामचरितमानस को लेकर अपनी बात कैसे रखनी है लोगों के बीच.
रामचरितमानस पर हमला करने के लिए वो पुरानी किताबें भी निकलवा रहे हैं. वो आरजेडी के नेताओं को बताने लगे कि लोगों के बीच कैसे क्या बात रखनी है. अपनी बात इस तरह से रखनी है जिससे सारे हिंदू लोग नाराज न हों. चंद्रशेखर ने आगे यह कहा कि भगवान को बचाकर चलना होगा. हार्ड लाइन लेंगे तो लोग नाराज हो जाएंगे, इसलिए भगवान राम पर हमला नहीं करना है. हमला ब्राह्मणों और सवर्णों पर करना है. वो कुछ उदाहरण भी बता रहे हैं कि जिन्हें बताकर सवर्णों के खिलाफ माहौल बनाना है.
समाजवादी पार्टी नेता स्वामीप्रसाद मौर्य और बिहार सरकार के मंत्री चंद्रशेखर ने जब तुलसीदास की चौपाइयों पर आपत्तिजनक बयान दिया था, तब इसे उनका व्यक्तिगत बयान माना गया था। लेकिन अब जिस तरह समाजवादी पार्टी के विभिन्न नेता पार्टी के कार्यालयों के बाहर स्वयं को शूद्र बताते हुए रामचरितमानस और तुलसीदास पर हमला बोल रहे हैं, उससे साफ हो गया है कि यह पार्टी की सोची-समझी रणनीति है। वह 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा के ‘राष्ट्रवाद और हिंदुत्व’ के सामने जातिवाद के मुद्दों को उछाल कर अपना वोट बैंक मजबूत करना चाहती है। नीतीश कुमार का जातिगत जनगणना का दांव भी भाजपा को घेरने की कोशिश के तौर पर ही देखा गया था। लेकिन बदले दौर में महागठबंधन की यह कोशिश कितनी कामयाब हो सकती है?
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम बताते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने यूपी-बिहार की जातिवादी राजनीति को पीछे छोड़ विभिन्न जातियों के वोट हासिल किया था। इनमें वे जातियां भी शामिल थीं, जो पारंपरिक रूप से सपा-बसपा-राजद को वोट करती आईं थी। इस बदलाव का ही परिणाम था कि जहां इन दलों को बेहद कम सीटों पर सफलता मिली, वहीं भाजपा ने रिकॉर्ड बहुमत से एक बार फिर केंद्र में सरकार बनाई। सपा-राजद को लगता है कि उनकी जातिवादी राजनीति से उनका पारंपरिक वोट बैंक उनके पास वापस आ सकता है।
यूपी-बिहार की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि यदि सपा-बसपा-राजद को लगता है कि वह तुलसीदास के बहाने जातिवादी कार्ड खेलकर अपने मतदाताओं को वापस खीच सकते हैं, तो यह दांव अब शायद ज्यादा कारगर नहीं होगा। यह कार्ड 2014 और 2019 में भी खेला गया था, लेकिन यह ज्यादा कारगर नहीं रहा।
उनका मानना है कि भाजपा के हिंदुत्व कार्ड से मुकाबला करने के लिए ज्यादा कट्टर हिंदू कार्ड कहीं ज्यादा कामयाब हो सकता है। भाजपा केंद्र सरकार में सत्ता में है। वह एक सीमा से आगे जाकर हिंदुत्व कार्ड नहीं खेल सकती। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब मुसलमानों को साथ लेने की बात करते हुए दिखाई पड़ते हैं, तो उनकी यह मजबूरी इसी संदर्भ में समझी जा सकती है, जबकि केंद्र में सत्ता में न होने के कारण समाजवादी पार्टी जैसे दल इस पर ज्यादा आक्रामक रुख अपना सकते हैं।
रामचरितमानस की नारी
महापुरुषों की बात समझने के लिए उसी स्तर का ज्ञानी होना आवश्यक है। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस लिखा तो यह भी निर्णय दिया कि इसे समझने की क्षमता किनमें है? जिनमें क्षमता पायी गयी, उनका नाम लेकर बताया कि इस शुभ चरित्र को वही जानेंगे जो मुनि हैं, ज्ञानी हैं।
यह शुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम की जा पर होई।।
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥
अब आते है एक चौपाई पर जिस पर मै अपने मानस जानकारों से सन्तुष्ट नही हुआ। वह चौपाई है–
ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।
मैं कोई मानस मर्मज्ञ तो हूँ नहीं जो इसकी कोई अलौकिक व्याख्या कर सकूँ। फिर भी मैं सोचता था कि ‘बंदउं संत असज्जन चरना’ लिखकर मानस की शुरुआत करने वाला व्यक्ति कैसे समस्त ‘शूद्र’ तथा ‘स्त्री’ को पिटाई का पात्र मानता है। मैंने इस पर समय निकाल कर कई किताबों का अध्ययन किया और व्याख्यान सुने। अचानक मुझे स्व.आचार्य विष्णु कांत शास्त्री जी का एक व्याख्यान मिला। कुछ साल पहले उन्होंने किसी रचना पर विचार व्यक्त करते हुये सारगर्भित व्याख्यान दिया था । तमाम उदाहरण देते हुये स्थापना की थी कि श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना अपने आदर्श पात्र से करवाता है। अनुकरणीय आदर्श ,कथन अपने श्रेष्ठ पात्र के मुँह से कहलवाता है।
सुन्दर कांड की पूरी चौपाई कुछ इस तरह की है…..
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं।
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी।
भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी.. और, सही रास्ता दिखाया ….. किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है…! क्योंकि…. ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री…….. ये सब शिक्षा तथा सही परख के अधिकारी हैं ॥
अर्थात…. ढोल (एक साज), गंवार(मूर्ख), शूद्र (कर्मचारी), पशु (चाहे जंगली हो या पालतू) और नारी (स्त्री/पत्नी), इन सब को साधना अथवा सिखाना आदि…..
दरअसल….. ताड़ना एक अवधी शब्द है……. जिसका अर्थ …. पहचानना .. परखना या रेकी करना होता है…..!
तुलसीदास जी… के कहने का मंतव्य यह है कि….. अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानते ….तो, उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी …..अतः उससे स्वभाव को जानना आवश्यक है ।
इसी तरह गंवार का अर्थ …..किसी का मजाक उड़ाना नहीं …..बल्कि, उनसे है जो अज्ञानी हैं… और प्रकृति या व्यवहार को जाने बिना उसके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता …..।
इसी तरह पशु और नारी के परिप्रेक्ष में भी वही अर्थ है कि….. जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पहचानते ….. उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह और सुखपूर्वक नहीं हो सकता…।
इसका सीधा सा भावार्थ यह है कि….. ढोल, गंवार, शूद्र, पशु …. और नारी…. के व्यवहार को ठीक से समझना चाहिए …. और उनके किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए….!
और तुलसीदास जी के इस चौपाई को लोग अपने जीवन में भी उतारते हैं……. परन्तु…. रामचरित मानस को नहीं समझ पाते हैं….
जैसे कि… यह सर्व विदित कि …..जब गाय, भैंस, बकरी आदि पशुओं का दूध दूहा जाता है.. तो, दूध दूहते समय यदि उसे किसी प्रकार का कष्ट हो रहा है ….अथवा वह शारीरिक रूप से दूध देने की स्थिति में नहीं है …तो वह लात भी मार देते है…. जिसका कभी लोग बुरा नहीं मानते हैं….!
इस वक्तव्य की रोशनी में मैंने कुछ अन्य प्रसंग व अन्य चौपाइयां नये सिरे से पढ़ा जिनका संबंध कुछ इसी प्रकार के शब्दों से मेल खाता है..
गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस की कुछ पंक्तियों पर पिछले कुछ समय से विवाद जारी है। रामचरितमानस पर विवाद की शुरुआत बिहार के शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर (Pro. Chandrasekhar) के बयान से हुई थी। धीरे-धीरे ये आग उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य तो बिहार के शिक्षा मंत्री से भी आगे निकल गए। इस पूरे बवाल पर के केंद्र में एक शब्द है, ‘शूद्र’। इस पर पटना के महावीर मंदिर ने मोर्चा खोल दिया है। महावीर मंदिर न्यास की तरफ से विवाद को हवा देने वाले को ‘सच का आईना’ दिखाया है।
रामचरितमानस पर उठाए गए सवालों पर महावीर मंदिर पूरी तैयारी के साथ उतरी। महावीर मंदिर न्यास ने उस रामचरितमानस को सामने लाया, जो पहली बार छपा था। आचार्य किशोर कुणाल (Acharya Kishore Kunal) ने तथ्य के तौर पर 212 साल पुराने मानस के प्रथम संस्करण को रखा। किशोर कुणाल ने बताया कि रामचरितमानस में ‘शूद्र’ नहीं बल्कि क्षुद्र लिखा है। उन्होंने विवाद खड़ा करने वाले बिहार के शिक्षा मंत्री और स्पा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को ‘सच का सामना’ करवाया।
क्या कहा था बिहार के शिक्षा मंत्री ने?
नालंदा खुला विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर (Chandrasekhar) ने बच्चों को बैकवर्ड और फॉरवर्ड पर जमकर पाठ पढ़ाया था। उन्होंने कहा था, कि आपको मालूम है कि मनुस्मृति को ज्ञान के प्रतीक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने क्यों जलाया? गूगल पर आप देखेंगे तो पाएंगे कि मनुस्मृति में वंचितों और वंचितों के साथ-साथ नारियों को शिक्षा से अलग रखने की बात कही गई है। शिक्षा का अधिकार (Right to Education), संपत्ति का अधिकार (Right to property) न नारियों को था, न वंचितों को और न शूद्रों को। उसके बाद 15वीं-16वीं सदी में रामचरितमानस लिखी गई जिसमें तुलसीदास जी ने लिखा है कि पूजिये न पूजिये विप्र शील गुण हीना, शुद्र ना गुण गन ज्ञान प्रवीना…अगर ये विचारधारा चलेगा तो भारत को ताकतवर बनाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा।
बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर (Chandrasekhar) ने कहा था कि, ‘तुलसीदास की मनुस्मृति, रामचरित मानस और माधव सदाशिवराव गोलवलकर की बंच ऑफ थॉट्स जैसी किताबों ने देश में 85 प्रतिशत आबादी को पिछड़े रखने की दिशा में काम किया है। हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस को मनुस्मृति की तरह जलाया जाना चाहिए। क्योंकि, यह समाज में ‘जाति विभाजन’ को बढ़ावा देता है। मंत्री के इसी बयान के बाद से देश की सियासत में उबाल आ गया है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी खोला मोर्चा
बिहार के शिक्षा मंत्री के बाद सपा नेता और पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी रामचरितमानस के खिलाफ हल्ला बोल दिया। उन्हें भी चौपाई में ‘शूद्र’ शब्द पर आलोचना है। मामला जब पूरी तरह राजनीतिक हो गया। बीजेपी हमलावर हुई तो अखिलेश ने भी अपने नेता का सपोर्ट किया और खुद को ‘शूद्र’ भी बताया। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति भी अब गरमा चुकी है। साथ ही, इस मुद्दे पर देशभर में विमर्श शुरू हो गया।
शूद्र नहीं, ‘क्षुद्र’ और समुद्र की बात
इस पूरे विवाद पर पटना के महावीर मंदिर ने मोर्चा खोल रखा है। महावीर मंदिर न्यास ने बिहार के शिक्षा मंत्री और स्वामी प्रसाद मौर्य को सच का आईना दिखाया। रामचरितमानस पर उठाए गए सवालों पर महावीर मंदिर ने उस रामचरितमानस को सामने लाया, जो पहली बार छपा था। आपको बता दें,कि जिस रामचरितमानस का किशोर कुणाल ने उद्धरण दिया है वह 212 साल पुराने मानस के प्रथम संस्करण से लिया गया है। जिसमें ‘ढोल, गंवार, ‘क्षुद्र’, पशु, नारी’ लिखा है। इसमें ‘शूद्र’ का उल्लेख नहीं है। आचार्य किशोर कुणाल के अनुसार संदर्भ के मुताबिक यहां ‘नारी’ का अर्थ ‘समुद्र’ से है।
1810 में प्रकाशित मानस ही ‘मानक’
धार्मिक न्यास परिषद के पूर्व अध्यक्ष और महावीर मंदिर न्यास के आचार्य किशोर कुणाल (Acharya Kishore Kunal) ने बताया कि, ‘भोजपुर निवासी पंडित सदल मिश्र (Pandit Sadal Mishra) ने कोलकाता के फोर्ट विलियम कॉलेज से वर्ष 1810 में रामचरितमानस को पहली बार प्रकाशित कराया था। इसे ही रामचरितमानस का प्रथम प्रकाशित संस्करण माना जाता है। यही सर्वाधिक प्रमाणिक भी है। इसके बाद मानस की प्रति 65 साल बाद यानी 1875 में प्रकाशित हुई। सदल मिश्र के मानस की ही डिजिटल प्रति में पशु मारी और ‘पशु नारी’ को लेकर असमंजस है। मगर, मूल प्रति में ऐसा कोई संशय नहीं है। जहां तक संदर्भ का सवाल है तो समुद्र ने यह बातें श्रीराम से कही है। कहने का स्पष्ट आशय है कि भयभीत समुद्र भगवान को ‘ताड़नहार’ मानता है। समुद्र विनम्रतापूर्वक तर्क दे रहा है ढोल, गंवार, क्षुद्र, पशु और नारी (समुद्र खुद) यह सब ताड़ना के अधिकारी हैं। क्षुद्र का अभिप्राय भी यहां जाति से नहीं, बल्कि व्यवहार से है।
अब सार सुनिए:
जय श्री राम।।
सारा भरम दूर कर देगा ये पोस्ट गर्व कर देगा हिन्दु होने पर, शायद जातिवाद भी कम हो जाए पढ़कर पीढ़ियों से आरक्षण किसके पास…?
गहना बनाने का आरक्षण — सुनार
हथियार बनाने का आरक्षण — लोहार
पत्तल बनाने का आरक्षण — बारी
सूप बनाने का आरक्षण — धरिकार
नाव चलाने का आरक्षण — मल्लाह
बर्तन बनाने का आरक्षण — ठठेरा
कपड़े सिलने का आरक्षण — दर्जी
फर्नीचर बनाने का आरक्षण — बढ़ई
बाल काटने का आरक्षण — नाई
ईंट बनाने का आरक्षण — प्रजापति
मूर्ति बनाने का आरक्षण — शिल्पकार
घर बनाने का आरक्षण — राजमिस्त्री
तेल पेरने का आरक्षण — तेली
पान बेचने का आरक्षण — बरई
दूध बेचने का आरक्षण — ग्वाला
मांस बेचने का आरक्षण — खटिक
जूता बनाने का आरक्षण — चर्मकार
माला बनाने का आरक्षण — माली
मिठाई बनाने का आरक्षण — हलवाई
टेक्सटाइल का आरक्षण — दर्जी
चूड़ी का आरक्षण — मनिहार
रियल सेक्टर का आरक्षण — कुम्हार
क्या हजार साल से किसी सुनार ने लोहार को दामाद बनाकर उसको अपने आरक्षित व्यवसाय में घुसने दिया ?
तो फिर आखिर आरक्षण का असली आनन्द कौन लिया ?
जब हजारों साल इन्ही पेशे से रोजगार लिया किसी को घुसने नही दिया, तो आज इस पेशे के कारण खुद को पिछड़ा क्यों कहते हो ?
विचार करें ?
इन सारे सम्मानित व्यवसाइयों को आज संविधान ने पिछड़ा और अछूत बना दिया है।
सनातन धर्म में जब सरकारी नौकरी नहीं होती थी, तब सबको रोजगार दिया गया, फिर अन्याय कहाँ ?
क्षत्रियों का आरक्षण क्या था — जवानी में बलिदान होकर उनकी औरतों का विधवा होना, बच्चों का अनाथ होना। जो कोई भी नही करना चाहेगा, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया।
जाति मंदिरों में नहीं पूछी जाती है, लेकिन संविधान में पूछी जाती है, सरकारी नौकरी में पूछी जाती हैं, राशन, स्कालरशिप और हर संस्थानो में पूछी जाती है।
पहले के जमाने मे कमाने खाने के लिए सरकारी नौकरी तो होती नही थी।
ब्राह्मणों ने अपने लिए भिक्षा माँगना और अध्यापन रखा
यह सब व्यवसाय जिससे भारत पूरी दुनिया में सोने की चिड़िया था। भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाले पिछड़े कैसे ?
ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के हिस्से में बलिदान दिया और स्वयं ब्राह्मणों ने कई बार क्षत्रियों के साथ मिलकर बलिदान और त्याग किया।
फिर भी अपने हिस्से में भिक्षाटन रखा, तो फिर उन्होंने जाति व्यवस्था में अन्याय कैसे किया???
अंग्रेजों ने मुगलों ने, मुगलों की पार्टी कांग्रेस ने, कम्युनिस्टों ने सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ के लिए हिंदुओं को जातियों में बाटा और जनजातियों में ज्यादा से ज्यादा नफरत के बीज बोए, हिंदुओं के बीच ज्यादा से ज्यादा लड़ाई करवाएं, ताकि हिंदू आपस में जितना हिंदू काफिर लड़ाई करेगा, हिंदू काफिर उतना कमजोर होगा और भारत उतना आसानी से इस्लामिक देश बनेगा,*
*यह सब एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है भारत को गजवा ए हिंद के तहत इस्लामिक देश बनाने का बहुत बड़ा षड्यंत्र है जो भारत ने पिछले हजार साल से चल रहा है वही गजवा ए हिंद जो मुगलों के धर्म ग्रंथों में लिखा हुआ है जो भी व्यक्ति गजवा ए हिंद के तहत भारत को इस्लामिक देश बनाने में सहयोग करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी जन्नत मिलेगा 72 हूरे कुंवारी सुंदरियां मिलेगी और यह मुग़ल बहरूपिया विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में घुसकर इसी काम में लगे हैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से, मंदबुद्धि जयचंद को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है जल्द ही मुग़ल जयचंद का भी इलाज करेंगे जैसे ही भारत इस्लामिक देश बनेगा जयचंद प्रजाति का भी का भी पूरा इलाज हो जाएगा






