कांग्रेस कभी एक दल हुआ करता था कभी ऐसा भी हुआ करता था कि एक समूह सामूहिक निर्णय लेता था गांधी परिवार का व्यक्ति उसकी घोषणा करता था,वर्तमान परिपेक्ष्य में इसकी दो धूरियाँ हैं,राहुल और प्रियंका और दोनों के आसपास कम्युनिस्ट मानसिकता के लोगो का जमावड़ा है जिनका सिर्फ एक कार्य होता है विरोधियों को गालियाँ देना,
खैर इससे अलग यदि देखें तो पश्चिम चुनाव में राहुल गांधी ने भाजपा को रोकने ममता बनर्जी का रास्ता बिल्कुल खाली छोड़ दिया था नतीजा ममता ने बम्पर जीत हासिल की लेकिन कांग्रेस शून्य हो गयी और अब कांग्रेस की कब्र खोदने की तैयारी में हैं।
मेघालय में कांग्रेस के 17 में से 12 विधायकों के तृणमूल में शामिल होने संबंधी खबरों के बीच, तृणमूल ने कांग्रेस को‘अयोग्य और अक्षम’ करार देते हुए गुरुवार को कहा कि कांग्रेसी नेताओं के पार्टी छोड़ने के लिए ममता की पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। तृणमूल ने अपने मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ में प्रकाशित एक लेख में कहा कि वह भाजपा को टक्कर देने के लिए अन्य राज्यों में भी पैठ बढाएगी। कांग्रेस में गंभीर समस्याएं हैं। उसका कोई नेता जब तृणमूल में शामिल होता है, तो वह हमारी आलोचना करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की तुलना में उसकी बंगाल इकाई के प्रमुख अधीर रंजन चौधरी को इससे अधिक समस्या है। संपादकीय में कहा गया कि कांग्रेस भाजपा को टक्कर देने में नाकाम रही है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) की विस्तारवादी नीति से विपक्षी एकता को झटका लग सकता है। टीएमसी ने जिस तरह कांग्रेस के नेताओं को अपनी पार्टी में जगह दी है, इससे दोनों पार्टियों के रिश्तों में कड़वाहट आई है। इसके साथ भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की कोशिशों को भी झटका लगा है।
संसद के शीतकालीन सत्र से पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली में जिस तरह कांग्रेस नेताओं को पार्टी में शामिल किया है, इससे साफ है कि तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाने के लिए बेताब है। इस सिलसिले में ममता जल्द महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और शरद पवार से भी मिल सकती हैं।
ममता की इस नीति से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है। क्योंकि, सबसे ज्यादा कांग्रेस नेता टीएमसी में शामिल हुए हैं। इसकी एक वजह यह है कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है। पार्टी नेतृत्व संकट के गुजर रही है। अंदरूनी कलह चरम पर है और कई वरिष्ठ नेता बागी तेवर अपनाए हुए हैं।
मेघालय में पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा के साथ 10 विधायकों के पार्टी छोड़ने की अटकलें काफी दिनों से थी। पार्टी नेतृत्व ने संगमा को दिल्ली तलब कर उनकी नाराजगी को दूर करने की भी कोशिश की। पर, संगमा और उनके समर्थकों ने कांग्रेस नेतृत्व के बजाए तृणमूल कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा जताया।
सधी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही तृणमूल
तृणमूल कांग्रेस बेहद सोच समझ के और सधी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है। यूपी में तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल कर सकती है। पर, गोवा और मणिपुर में पार्टी कांग्रेस को खुली चुनौती दे रही है। तृणमूल के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि 2024 तक हम दस राज्यों में अपना विस्तार करना चाहते हैं।
विपक्षी पार्टी का स्थान हासिल करना लक्ष्य
ममता बनर्जी जिस तरह कांग्रेस नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर रही हैं, उससे साफ है कि उनका पहला लक्ष्य मुख्य विपक्षी पार्टी का स्थान हासिल करना है। हालांकि, तृणमूल के लिए यह आसान नहीं है। इसके लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव तक होने वाले विधानसभा चुनावों में हिस्सा लेना होगा।
तृणमूल के कदम से विपक्ष को हो सकता है नुकसान
तृणमूल कांग्रेस के इस कदम से विपक्ष को नुकसान हो सकता है। क्योंकि, तृणमूल एक क्षेत्रीय दल है। ऐसे में एक क्षेत्रीय दल के बैनर तले दूसरे क्षेत्रीय दलों के इकट्ठा होने पर संदेह है। वहीं, कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है, लिहाजा किसी क्षेत्रीय दल को उसके बैनर तले इकठ्ठा होने में कोई ऐतराज नहीं होगा।
संसद सत्र में भी दिखाई देगा असर
तृणमूल की इस विस्तारवादी नीति का असर संसद सत्र में भी दिखाई देगा। कृषि कानूनों के मुद्दों पर पूरा विपक्ष एकजुट होकर सरकार को घेर रहा था, पर अब विपक्ष बिखर सकता है। इसलिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी की इस नीति को भाजपा के दबाव में लिया फैसला करार दे रहे हैं।





