2004-2005 में सरकार बनाने की कवायद और सत्ता हासिल करने की चाहत में सोनिया मनमोहन सरकार ने साथी दलों को खुली छूट दे दी थी,एक फायदे की एयरलाइंस उस दिन से सिर्फ घाटा दे रही है।CAG रिपोर्ट MD का पत्र सबको किनारे कर दिया था सोनिया मनमोहन सरकार ने।
दुनिया की बेहतरीन एयरलाइंस में गिनी जाने वाली एयर इंडिया को बेचने की कोशिश सरकार तो दो दशक से कर रही थी, लेकिन आखिरकार उसे खरीदा टाटा समूह ने। वही टाटा समूह जिससे सरकार ने एयर इंडिया को खरीदा था। इन दो दशकों में कई एयरलाइंस आईं, कई बंद भी हुईं, लेकिन एयर इंडिया के प्रति टाटा समूह का प्रेम जब-तब सामने आता रहा। समूह के पूर्व चेयरमैन जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा ने ही एयर इंडिया की स्थापना की थी। तब इसका नाम टाटा एयरलाइंस था।
एयर इंडिया के राष्ट्रीयकरण के बाद भी सरकार ने अनेक वर्षों तक जेआरडी को एयरलाइन का चेयरमैन बना कर रखा था। कहा जाता है कि उन दिनों टाटा समूह के अधिकारी आपस में चर्चा करते थे कि जेआरडी को हमेशा टाटा समूह से ज्यादा एयर इंडिया की फिक्र लगी रहती है। हालांकि वे अच्छी तरह जानते थे कि जेआरडी के लिए एयर इंडिया चेयरमैन का पद बस नौकरी नहीं, बल्कि एयरलाइन के प्रति उनका प्रेम था।
इसलिए जब टाटा समूह ने एयर इंडिया को दोबारा खरीदने के लिए 18,000 करोड़ रुपये की बोली लगाई तो किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ। जेआरडी ने 1932 में दो लाख रुपये से टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की थी। 15 अक्टूबर 1932 को जेआरडी ने कराची से मुंबई के लिए पहली उड़ान भरी थी। तब वे वहां से डाक लेकर आए थे। जेआरडी कमर्शियल पायलट का लाइसेंस पाने वाले पहले भारतीय थे।
टाटा एयरलाइंस 1946 में पब्लिक कंपनी बनी। तभी उसका नाम बदलकर एयर इंडिया रखा गया। एयर इंडिया इंटरनेशनल की पहली उड़ान 8 जून 1948 को थी। महाराजा मस्कट के साथ यह उड़ान यूरोप पहुंची थी। जल्दी ही एयर इंडिया इंटरनेशनल अपनी सेवाओं की बदौलत दुनिया की सर्वश्रेष्ठ एयरलाइंस में गिनी जाने लगी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1953 में एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया। तब जेआरडी ने उसका कड़ा विरोध किया था। दरअसल सरकार ने उस समय 11 एयरलाइंस का राष्ट्रीयकरण किया। एयर इंडिया को छोड़कर बाकी सब घाटे में थे। उन सबको एयर इंडिया में मिला दिया गया। जेआरडी उसके बाद 25 वर्षों तक चेयरमैन पद पर रहे।
1990 के दशक में जब एविएशन सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोला गया तो रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा समूह ने 1994 में सिंगापुर एयरलाइंस के साथ साझीदारी में इस क्षेत्र में उतरने की कोशिश की। लेकिन उस प्रस्ताव को सरकार ने खारिज कर दिया। तब किसी विदेशी एयरलाइन को घरेलू एयरलाइन में हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति नहीं थी।
वर्ष 2000 में भी टाटा और सिंगापुर एयरलाइंस ने एयर इंडिया को खरीदने की नाकाम कोशिश की। इस बीच टाटा समूह में एविएशन क्षेत्र में उतरने की कोशिश जारी रखी। 2012 में जब विदेशी निवेश की अनुमति दी गई तो उसने 5 नवंबर 2013 को सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर टाटा एसआईए एयरलाइंस लिमिटेड नाम से साझा कंपनी का गठन किया। उसने विस्तारा नाम से एयरलाइंस शुरू की। इसमें टाटा संस की 51 फ़ीसदी और सिंगापुर एयरलाइंस की 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी है। विस्तारा ने 9 जनवरी 2015 को पहली उड़ान भरी। विस्तारा की उड़ान शुरू होने से एक साल पहले टाटा समूह ने मलेशिया की एयर एशिया के साथ मिलकर एयर एशिया इंडिया की स्थापना की। इसने जून 2014 में पहली उड़ान भरी।
एयर एशिया इंडिया में टाटा समूह की 51 फीसदी और एयर एशिया की 49 फीसदी हिस्सेदारी थी। पिछले साल दिसंबर में टाटा संस ने एयर एशिया से 32.67 फीसदी इक्विटी खरीदकर अपनी हिस्सेदारी 83.67 फीसदी कर ली। मलेशियाई साझीदार ने कहा था कि जापान और भारत में उसके बिजनेस को काफी नुकसान हो रहा है।
अब 68 साल बाद एयर इंडिया एक बार फिर टाटा समूह के नियंत्रण में आने वाली है। यह 153 साल पुराने उस औद्योगिक घराने के लिए भी खुशी का मौका है जिसे भारत का सबसे भरोसेमंद नाम माना जाता है। लेकिन अब यह देखना है कि विस्तारा, एयर एशिया इंडिया और एयर इंडिया तीन एयरलाइंस के साथ इस समूह की आगे की रणनीति क्या होती है।
एयर इंडिया की बर्बादी की कहानी
2005 मनमोहन सोनिया सरकार
सीएजी की रिपोर्ट आने से पहले ही यूपीए सरकार के लिए मुश्किल वक्त शुरू होता दिखाई दे रहा है। एयर इंडिया के पूर्व सीएमडी सुनील अरोड़ा ने पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल पर आरोप लगाया है। अरोड़ा ने आरोप लगाया है कि प्रफुल्ल पटेल ने प्रबंधन पर गलत फैसले लेने का दवाब बनाया था। आरोप है कि जरूरत से ज्यादा विमान खरीदने को मजबूर किया गया। पूर्व सीएमडी ने सीवीसी को चिट्ठी लिखकर इस बात की जानकारी दी है। पूर्व सीएमडी ने शिकायत करते हुए मामले की जांच सीवीसी से करने की मांग की है।
अरोड़ा ने 2005 में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी के चतुर्वेदी को यह चिट्ठी लिखी थी। एक तरह से देखें तो अरोड़ा ने उस वक्त व्हिसल ब्लोअर का रूप अख्तियार किया था। अरोड़ा ने उस वक्त के नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल और उनके ओएसडी के एन चौबे के ऊपर गंभीर आरोप लगाए हैं। मुख्य आरोप है कि इंडियन एयरलाइंस को फायदा पहुंचाने वाले रूट पर जाने से रोका गया। खासकर कि इस पूरी प्रक्रिया में प्राइवेट एयरलाइंस को फायदा पहुंचाया गया।
इसके अलावा अरोड़ा ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रफुल्ल के कार्यकाल में जरूरत से ज्यादा ही जेट खरीदे गए। और साथ ही कुछ जेट मेकिंग कंपनीज को फायदा पहुंचाया गया। यह सब बोर्ड मीटिंग के बहाने किया गया। एआई की बोर्ड मीटिंग से पहले ही फैसला कर लिया जाता था और फोन पर मौखिक रूप से प्रबंधन को आदेश दे दिया जाता था। 2005 की इस चिट्ठी को लेकर दो संसद सदस्यों ने सीवीसी से जांच की मांग की है। साफ तौर पर पूर्व सीएमडी ने तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री पर बेहद गंभीर आरोप लगाया है। भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे मुद्दों पर पहले से निशाने पर रही यूपीए सरकार को यह चोट भी गहरा जख्म देगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रफुल्ल पटेल की भूमिका
सीएजी की रिपोर्ट को देखें तो एयर इंडिया की इस हालत के लिए पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल भी काफी हद तक जिम्मेदार नजर आते हैं. सीएजी की रिपोर्ट में पटेल की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं. प्रफुल्ल पटेल 2004 में नागरिक उड्डयन मंत्री बने. उनके मंत्री बनते ही कर्ज लेकर 111 नए विमान खरीदे गए. प्रबंधन ने घाटे में चल रहे रूटों को लेकर कोई कदम नहीं उठाए. पटेल के कार्यकाल में प्रीमियम रूटों का आवंटन फिर से हुआ. हैरानी वाली बात है कि इसके बाद एयर इंडिया को उन रूटों पर भी नुकसान होने लगा जहां कभी उसे हमेशा फायदा होता था. सीएजी की रिपोर्ट में 2006 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के विलय पर भी सवाल उठाया गया है. रिपोर्ट कहती है कि विलय एक गलत फैसला था.

पटेल के ही कार्यकाल में एक मार्च 2009 को एयर इंडिया के जर्मनी के फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर अपना इंटरनेशल हब बनाया. यह हब क्यों बनाया गया, यह एयर इंडिया के तत्कालीन सीईओ अरविंद जाधव और प्रफुल्ल पटेल के अलावा किसी की समझ नहीं आया. बहरहाल हब बनाने में अथाह पैसा फूंकने के बाद 30 अक्टूबर 2010 को फ्रैंकफर्ट हब बंद कर दिया गया. इस बीच एयर इंडिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना बदनाम हो गया कि कई विदेशी एयरलाइन कंपनियों ने एयर इंडिया से साझा करार भी तोड़ दिया.
प्रबंधन और कर्मचारी भी जिम्मेदार
फिलहाल भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल सीएजी की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों से इनकार करते हैं. इसमें शक नहीं है कि पटेल के कार्यकाल में भारत में एयरलाइन उद्योग आगे बढ़ा. निजी कंपनियों ने नए नए विमान खरीदे. निजी कंपनियों में आपसी होड़ बढ़ी. इंडिगो जैसी एयरलाइन एक साथ 180 एयरबस विमानों का ऑर्डर देने की स्थिति में आ गई. जब निजी एयरलाइन्स ठीक काम कर पा रही हैं तो फिर एयर इंडिया बीमार क्यों है?
इसके लिए एयर इंडिया प्रबंधन और काफी हद तक एयर इंडिया के कर्मचारी भी जिम्मेदार हैं. एयर इंडिया की फ्लाइट्स अक्सर लेट लतीफी का शिकार होती हैं. सरकारी नौकरी को जागीर समझने वाली मानसिकता से साथ काम करने वाले एयर इंडिया के कई कर्मचारी ग्राहकों के साथ रुखे ढंग से पेश आते हैं. एयरपोर्ट पर तैनात एयर इंडिया का ग्राउंड स्टाफ के कई कर्मचारी पेशेवर ढंग से काम करने के बजाय यात्रियों के साथ अड़ियल रुख से पेश आने के लिए कुख्यात हैं. पायलट जब तब हड़ताल पर चले जाते हैं.

निजी एयरलाइन कंपनियों के विमान एक दिन में कम से कम 14 घंटे हवा में रहते हैं. एयर इंडिया के जहाज सिर्फ 10 घंटे उड़ान भरते हैं. लेट लतीफी की वजह से भी यात्री एयर इंडिया से जाने से बचते हैं. यह कुछ ऐसे कारण जिनके चलते 1946 से उड़ान भरने के बावजूद एयर इंडिया प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकी.
क्या से क्या हो गया
एयर ट्रैफिक के लिहाज से भारत एक अहम जगह है. मध्य पूर्व एशिया, पश्चिमी एशिया और यूरोप से पूर्वी एशिया व ऑस्ट्रेलिया को जोड़ने वाला हवाई रास्ता भारत से होकर गुजरता है. जानकार कहते हैं कि एयर इंडिया को अगर ठीक ढंग से चलाया गया तो एयरलाइन सरकार की नवरत्न कंपनियों में शुमार होती. जिस तरह लुफ्थांसा, एमिरेट्स, डेल्टा एयर लाइंस, यूनाइटेड एयरलाइंस और सिंगापुर एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय रुट्स पर दबदबा बनाए हुए हैं. ऐसी ही स्थिति एयर इंडिया की भी हो सकती थी. लेकिन ऊपर गिनाए गए तमाम कारणों और अहम पदों पर बैठे कुछ लोगों ने एयर इंडिया को क्या से क्या बना दिया. आलोचक एयर इंडिया की वित्तीय गड़बड़ियों को भारत का सबसे बड़ा घोटाला बताते हैं. वैसे 1947 से अब तक हिसाब लगाया जाए तो यह दावा कमजोर नहीं पड़ेगा.
एक वक्त था जब यूरोप के कई देशों की सरकारी एयरलाइन कंपनियां घाटे में थीं. लुफ्थांसा और ब्रिटिश एयरवेज जैसी कंपनियों को निजिकरण का सामना करना पड़ा और अब इनकी हालत लाभकारी है. इन कंपनियों को बेहतरीन सेफ्टी रिकॉर्ड का भी फायदा हुआ. वैसे अगर कोई करना चाहे तो क्या नहीं हो सकता.
इसकी मिसाल 2007 तक हादसों के लिए बदनाम गुरुडा इंडोनेशिया ने दी. 1950 से अब तक 12 खतरनाक हादसों के लिए बदनाम गुरुडा इंडोनेशिया के टॉप मैनेजमेंट से लेकर नीचे तक बड़े बदलाव हुए. एयरलाइन इतनी बदनाम हो गई कि यूरोपीय संघ ने इंडोनेशिया की सभी एयरलाइन कंपनियों को अपने यहां आने की अनुमति ही नहीं दी. लेकिन अब गुरुडा मुनाफा कमाने के करीब है और लोग उस पर भरोसा भी करने लगे हैं





