महज़ कुछ ही दिनों पहले मैंने कहा था कि.. चमचों के राज कुमार विदेश दौरे पर हैं और वह अपने साथ कुछ नया प्रोडक्ट साथ में लाने वाले हैं. इसके लिए भाजपा और सरकार को तैयार रहना चाहिए….
विदेशी वामपंथी डीप स्टेट और भारत में रह रहे उसके कालनिमी एजेंटों द्वारा, कैसे एक खुशहाल गणतांत्रिक देश को आग में झोंका जा सके..!! उसका ताजातरीन उदाहरण भारत के केन्द्र शासित राज्य लद्दाख है. डीप स्टेट द्वारा कैसे एक इंसान की इमेज को देश-दुनिया में स्थापित करके, उसका उपयोग किसी देश के खिलाफ किया जा सकता है… उसका बड़ा उदाहरण बांग्लादेश का मोहम्मद यूनुस और भारत का सोनम वांगचुक है.
मोहम्मद यूनुस का इतिहास तो आप लोगों को पता है, परंतु सोनम वांगचुक का पता नहीं होगा..! आप लोगों को थ्री इडियट्स फिल्म तो #याद होगा, उस फिल्म में आमिर खान ने जो भूमिका निभाई है.. वह असलियत में सोनम वांगचुक ही है.. और इसी बात से आप लोगों को पता चल गया होगा कि.! कैसे सोनम वांगचुक को विदेशी डीप स्टेट द्वारा स्थापित किये जा रहे थे, ताकि उसका उपयोग भारत में अशांति फैलाया जा सके.
खबर है कि, सोनम वांगचुक की 9 बैंक अकाउंट में से 8 अकाउंट फर्जी निकले हैं..! CBI ने इस तथाकथित कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित एक संस्था के द्वारा FCRA उल्लंघन की जांच शुरू की, अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है. वांगचुक द्वारा स्थापित संस्था के द्वारा FCRA कानून के उल्लंघनों की, CBI द्वारा जाँच शुरू करना इस बात पर प्रकाश डालता है कि, समाज में रह रहे उच्च-प्रोफ़ाइल कार्यकर्ता और शिक्षाविद् भी कानून से ऊपर नहीं हैं.. FCRA नियम विदेशी धन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए हैं, और किसी भी उल्लंघन के, गंभीर राष्ट्रीय परिणाम हो सकते हैं. दुनिया भर के ये सभी तथाकथित कार्यकर्ता डीप स्टेट के पैसे वाले पिट्ठू हैं. उन्हें उन गतिविधियों के लिए पैसे मिलते हैं जिनकी वे योजना बनाते हैं और ये पिट्ठू टूल किट का पालन करते हैं.
विदेशी और देसी डीप स्टेट द्वारा, लद्दाख में कैसे आग लगाई गई, चलिए उस पर थोड़ा चर्चा कर लेते हैं.. यह जो तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता, सोनम वांगचुक है, वह कई सालों से ही अंदरखाने भारतीय सरकार के खिलाफ काम कर रहा था.. जो देश की सेना और देश की विकास पे बाधा डाल रहा था. उस पे केन्द्र सरकार पिछले 2 सालों से बारीकियों से नजर रख रही थी एवं उसके हर गतिविधियों पर भी एजेंसियों का नज़र था.
भारत का केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने एवं राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर विदेशी टुलकिट गैंग के तथाकथित स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ता… सोनम वांगचुक ने 35 दिनों के धरने का एलान किया था.! भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर 2025 को लेह, लद्दाख में भड़की हिंसा को लेकर एक बयान जारी किया जिसमें सोनम वांगचुक को उत्पात भीड़ को उकसाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया.. सरकार के अनुसार, वांगचुक ने 10 सितंबर 2025 को लद्दाख को छठी अनुसूची में दर्जा और राज्य का दर्जा देने के #मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दी थी.
केन्द्र सरकार के अधिकारियों ने बताया है कि, केंद्र इन मुद्दों पे एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति, एक उ-समिति और कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से और शीर्ष निकाय लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ सक्रिय बातचीत कर रहा है. सरकार ने कहा कि इस व्यवस्था से पहले ही अभूतपूर्व परिणाम सामने आए हैं, जिनमें लद्दाख में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 45% से बढ़ाकर 84% करना, परिषदों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण और भोटी व पुर्गी को आधिकारिक भाषा घोषित करना शामिल है. 1,800 पदों पर भर्ती भी शुरू हो चुकी है. हालांकि बयान में आरोप लगाया गया है कि “कुछ राजनीति से प्रेरित व्यक्ति” इस प्रगति से नाखुश हैं और बातचीत को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं. अगली उच्च स्तरीय समिति की बैठक 6 अक्टूबर को होगी, जबकि लद्दाखी नेताओं के साथ अतिरिक्त बैठकें 25 और 26 सितंबर को निर्धारित हैं. सरकार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक द्वारा उठाई गई माँगें पहले से ही एचपीसी में चर्चा का हिस्सा थीं. सरकार ने कहा कि कई नेताओं द्वारा अनशन समाप्त करने की अपील के बावजूद भी वांगचुक ने अपना अनशन जारी रखा और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में GEN-Z विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया.
24 सितंबर 2025 को लगभग 11:30 बजे, वांगचुक के भाषणों से कथित रूप से उकसाई गई एक भीड़ ने अनशन स्थल छोड़ दिया और लेह में एक राजनीतिक दल के कार्यालय और मुख्य कार्यकारी पार्षद CEC के कार्यालय पर हमला कर दिया। बयान में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों ने इन कार्यालयों में आग लगा दी, एक पुलिस वाहन को आग लगा दी, सुरक्षाकर्मियों पर हमला किया, जिसमें 30 से ज्यादा पुलिस एवं CRPF कर्मी घायल हो गए..! भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति को भी नष्ट करना और सुरक्षा बलों पर हमला करना जारी रखा. पुलिस ने आत्मरक्षा के लिए ऑपरेशन शुरू की, जिसमें कई लोग हताहत हुए. सरकार द्वारा शाम 4 बजे तक स्थिति पर नियंत्रण पा लिया गया.. हिंसा के बीच, वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रयास किए बिना” एम्बुलेंस से अपने गाँव चला गया.. यह फुंगशुक वांगडू उर्फ रैंचो ने ही लद्दाख और उत्तराखंड में, हमारे #सेना के लिए जो स्ट्रक्चर बनाए जा रहे थे, #पर्यावरण के नाम पर उन सभी प्रोजेक्टों को लटकाने के लिए बहुत प्रयास किया था..! इसके पाकिस्तान दौरा भी CBI के जांच में है..
आगे की कहानी और चौंकाने वाली है,
सोनम वांगचुक और विदेशी…
अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे अंधेरे अध्याय पर – 32 साल पहले जब इस साजिश की मास्टरकी 🔑 एक अमेरिकी लड़की का रहस्यमय आगमन हुआ,नाम था रेबेका नॉर्मन।
1993 में जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब यह 22-23 साल की अमेरिकी लड़की अचानक से लद्दाख पहुंची। कौन सा युवा अमेरिकी अपने देश की सुख-सुविधाएं छोड़कर भारत के सबसे दुर्गम इलाके में आना चाहेगा? यह कोई साधारण बात नहीं थी।
रेबेका नॉर्मनने School for International Training (SIT) से 1991-1993 के बीच अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी।
यह SIT कोई साधारण कॉलेज नहीं है। वर्मोंट के ब्रैटलबोरो में स्थित यह संस्थान 1964 में Peace Corps की ट्रेनिंग साइट के रूप में स्थापित हुआ था। अर्थात शांति सेना, किन्तु Peace Corps का एजेंडा सिर्फ “शांति और मानवीय सेवा” तक सीमित नहीं है। इसकी गुप्त राजनीतिक दखलंदाजी के कई आयाम हैं।
दुनिया के देशों में आर्थिक और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना अमेरिकी श्रेष्ठता की भावना फैलाना विकासशील देशों के संसाधनों को चूसना, सरकारें गिराने और बनाने में भूमिका निभाना, अर्थात दुनियाभर में अमेरिका के छुपे हुए राजनीतिक और कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करना है।
इसका सीधा संपर्क अमेरिकी विदेश विभाग से है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आखिर SIT को फंडिंग कौन देता है !?
फोर्ड फाउंडेशन , जॉर्ज सोरस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन। ये वही संस्थाएं हैं जो दुनियाभर में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।
तारीफ़ करनी होगी “रेबेका” के 32 साल के धैर्य,रणनीति और अपनी मातृभूमि अमेरिका के लिये समर्पण की, जो 1993 में लद्दाख आई और आज तक वहीं है – पूरे 32 साल से।
शुरुआत में जवान और खूबसूरत रेबेका, युवा वांगचुक की 1988 में स्थापित एनजीओ SECMOL में अंग्रेजी शिक्षिका बनकर आई। 3 साल रिलेशनशिप में रहने के बाद 1996 में सोनम वांगचुक ने उससे शादी कर ली। और यहीं से दिखता है असली खेल।
शादी के बाद वांगचुक की अंतरराष्ट्रीय पहुंच में जो आश्चर्यजनक तेजी आई, वह कोई संयोग नहीं था, इसमें स्पष्ट तौर पर रेबेका के माध्यम से भारत में अपने असेट को निर्मित करने में अमेरिका की भूमिका थी, वो भी रणनीतिक रूप से उपयुक्त एक ऐसे सीमावर्ती स्थान पर जहां तीन देशों की सीमाएं मिलती हों।
फिर भारत में स्थित अमेरिकी प्रत्यक्ष और परोक्ष इको सिस्टम उसकी छवि गढ़ने में लग गये।
आउंगा उस नट्टू मुछंदर ✂️ पर भी आउंगा जो आजकल कलावा बाँध कर और तिलक लगा कर प्रधानमंत्री मोदीजी को जन्मदिन की बधाई दे रहा है, जिसकी बीवी को कभी भारत में डर लगता था।
उन्हें 2002 में अमेरिका आधारित गैर-लाभकारी संगठन अशोका की फेलोशिप मिली। अशोका फेलोशिप दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक उद्यमियों के नेटवर्क से जुड़ी एक प्रतिष्ठित fellowship है और यह संस्था 70 से अधिक देशों में काम करती है।
भारत में 1981 से यह active है और अब तक 307 Ashoka Fellows भारत में भी हैं।
2004 तक वांगचुक कांग्रेसी इको सिस्टम के खाँचे में फिट हो चुके थे और रिमोट कंट्रोल से कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के माध्यम से उन्हें संरक्षण भी मिल गया और जल्द ही 2005 में राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा गवर्निंग काउंसिल में नियुक्ति भी हो गयी।
2016 में रोलेक्स अवार्ड मिलता है जिसके तहत उन्हें 2,00,000 स्विस फ्रांक अर्थात भारतीय मुद्रा में आज के एक्सचेंज रेट के अनुसार लगभग 2 करोड़ 25 लाख रुपये।
यह पुरस्कार स्विट्जरलैंड की मशहूर घड़ी निर्माता कंपनी रोलेक्स (Rolex SA) द्वारा दिया जाता है, कहने को तो मानव कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के लिए दिया जाता है लेकिन मुख्यतः Rolex ब्रांड की वैश्विक छवि मजबूत करना होता है, लेकिन कहना न होगा कि इसके जैसी तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर भी अमेरिकी दबाव की छाया है जिनके CSR फंड का प्रयोग भी वो दुनियाभर के देशों में अपना मकसद पूरा करता है।
2018 में वांगचुक को रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला।
यह पुरस्कार फिलीपींस के तीसरे राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे (1953-1957) के नाम पर दिया जाता है जो शीतयुद्ध काल में स्वयं सीआईए के असेट थे।
1957 में “रेमन मैगसेसे फाउंडेशन” की स्थापना सीआईए समर्थित रॉकफेलर ब्रदर्स फंड जो अमेरिका की एक प्रमुख गैर-लाभकारी संस्था है, द्वारा की गयी जिसके शुरुआती ट्रस्टी भी अमेरिकन ही थे।
इस पुरस्कार का मक़सद अमेरिका समर्थित लोकतांत्रिक और सामाजिक मॉडल को एशियाई देशों में स्थापित करना है।
सोचिये अमेरिका कितनी दूर से मार करता है, और कैसे इन देशों की नामचीन हस्तियों को अपने प्रभाव में लेता है।
भारत में यह पुरस्कार तो बहुतों को मिला है पर उन्हें ही मिला जिनकी छवि अपने अपने दौर में anti establishment (व्यवस्थाविरोधी अथवा सरकार विरोधी) थी।
टी एन शेषन से केजरीवाल से रविस कुमार तक सभी को इसी छवि के कारण पुरस्कार मिले।






