राजनीति में ‘महत्वाकांक्षा’ और ‘विचारधारा’ के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है।
पिछले 12 सालों में पीएम नरेंद्र मोदीजी ने कई ऐसे चेहरों को बेनकाब किया है, जो वैचारिक मुखौटा पहनकर सत्ता के गलियारों में ऊँची छलांग लगाना चाहते थे। लेकिन जैसे ही उन्हें ‘साइडलाइन’ किया गया, उनका असली रूप जनता के सामने आ गया।
इतिहास के कुछ दिलचस्प पन्ने:👇
🛑 शिल्पी तिवारी:
एक दशक पहले पीएम से शॉल मांगी, शॉल मिला भी, लेकिन उन्होंने उसे राज्यसभा की ‘जादुई कालीन’ समझ लिया। उम्मीदें पूरी नहीं हुईं तो आज सार्वजनिक विमर्श से गायब हैं।
🛑 मधु किश्वर:
2013 तक घोर वामपंथी और अलगाववादियों की करीबी। मौसम बदला तो ‘मोदीनामा’ लिख दी। सपना था राज्यसभा का, लेकिन जब स्मृति ईरानी मंत्री बनीं, तो इनका मानसिक संतुलन ही डगमगा गया।
🛑 सुब्रमण्यम स्वामी:
जीवन भर हर बड़े नेता से ‘वित्त मंत्री’ पद की भीख मांगते रहे। राम जेठमलानी ने इन्हें
“vicious viper” और “dangerous megalomaniac” जैसे शब्दों से नवाजा था। आज इनकी हालत सबके सामने है।
सत्ता की ‘मलाई’ न मिलने पर बाग़ी हुए कुछ और नाम: 🚩
📍 यशवंत सिन्हा: वाजपेयी सरकार में रसूख था, मोदी युग में पद नहीं मिला तो ममता बनर्जी की शरण ले ली।
📍 शत्रुघ्न सिन्हा: भाजपा ने स्टार बनाया, पर खुद को किंगमेकर समझने की भूल में ‘बयानवीर’ बन गए।
📍 सत्यपाल मलिक: चार राज्यों की गवर्नरी का सुख भोगा, कार्यकाल नहीं बढ़ा तो अचानक ‘क्रांतिकारी’ बन गए।
📍 वरुण गांधी: सरनेम के दम पर बड़ी भूमिका चाहिए थी, अनुशासन टूटा और टिकट कटा तो अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
📍 अरुण शौरी: 2014 में पद की चाहत पूरी नहीं हुई तो सबसे कड़े आलोचक बन बैठे।
सच तो यही है कि मोदी जी की ‘पारखी नजर’ ने इन लोगों के चाल और चरित्र को बहुत पहले पहचान लिया था।
इनका ‘बौराना’ ही इस बात का प्रमाण है कि मोदी का ‘इलाज’ एकदम सटीक था।
वैसे एक सवाल… आजकल डॉ. हर्षवर्धन जी कहाँ हैं? किसी को कुछ अंदाजा हो तो कमेंट में जरूर बताएं! 🤔👇
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