Monday, February 2, 2026
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कहानी धुरंधर मोहित शर्मा की,भारतीय मां की कोख से जन्मा भारत का लाल

धुरंधर फिल्म में रणवीर सिंह जो इतने खतरनाक फौजी लग रहे हैं, जिन्हें देखकर कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या सच में भारत में कभी ऐसा कोई शेर था भी?

जी हाँ, इस फिल्म में रणवीर सिंह के किरदार से भी हजारों गुना ज्यादा प्रचंड योद्धा, शातिर दिमाग वाला और हजारों गुना ज्यादा खतरनाक था मेजर मोहित शर्मा।
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश का एक साधारण लड़का, जिसका जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। साधारण सा नाम था मोहित शर्मा। 1995 में 12वीं पास की। घरवाले सोच रहे थे कि मोहित इंजीनियर बनेगा, कॉलेज में एडमिशन भी करवा दिया। लेकिन मोहित के रक्त में कुछ और था – वर्दी का जुनून, भगवान परशुराम का शौर्य, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मंगल पांडे वाला जोश।

मोहित शर्मा ने चुपके से NDA का फॉर्म भरा, परीक्षा दी। परीक्षा का रिजल्ट आने से पहले ही घरवालों के कहने पर इंजीनियरिंग कॉलेज जॉइन कर लिया, ताकि घरवाले शक न करें कि मोहित फौज में जा रहा है। फिर जब रिजल्ट आया, तो वह माँ-बाप को मिला। माँ-बाप ने रिजल्ट छिपा दिया और कहा कि इंजीनियरिंग करो, मोहित, फौज में क्या रखा है?

लेकिन मोहित शर्मा को एक अजीब बेचैनी सता रही थी, जैसे ईश्वर उनसे कह रहे हों – मैंने तुझे फौज में जाने के लिए धरती पर भेजा है, तू इंजीनियरिंग में क्यों उलझ रहा है? फिर मोहित शर्मा ने सीधा UPSC के दफ्तर फोन लगाया और कहा – मेरा रिजल्ट बताओ। मोहित शर्मा को बताया गया कि आप पास हैं, रिजल्ट आपके घर पहुँच गया होगा क्या? अब सिर्फ इंटरव्यू बाकी है।

बस फिर क्या था! मोहित शर्मा बिना घर पर किसी को बताए इंजीनियरिंग कॉलेज से सीधा भोपाल पहुँच गए इंटरव्यू देने। इंटरव्यू दिया, उसमें भी पास हो गए। अब दिल्ली में मेडिकल था। घर आकर सब बता दिया कि मैं इंटरव्यू में पास हो गया हूँ।
पहले तो माँ-बाप नाराज हुए, फिर बेटे की आँखों में उस पागलपन को देखकर मान गए। हालांकि यहाँ एक बहुत बड़ी रुकावट थी – मोहित शर्मा का वजन 6 किलो कम था और समय मात्र 4 हफ्तों का। मोहित शर्मा को 4 हफ्तों में 6 किलो वजन बढ़ाना था।
मोहित शर्मा की माँ ने कमाल कर दिखाया। अपने गहने बेच दिए और रोज दूध, केले, काजू, बादाम, प्रोटीन से भरा खाना खिलाया। मोहित जिम में 4 हफ्तों तक पसीना बहाते रहे। और कुछ ही हफ्तों में मोहित का वजन बढ़ गया, जिससे मेडिकल पास हो गया।

भारतीय सेना को मोहित शर्मा जैसा किलर शेर मिला, जो आने वाले सालों में दुश्मनों की रातों की नींद हराम करने वाला था।
2004 में कश्मीर का बुलावा आ गया। उस वक्त कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन का आतंक चरम पर था। सारे बड़े हमले दो नाम संभालते थे – अबू तोरारा और अबू सबजार।

सेना को उनके ठिकानों की खबर थी, लेकिन एक झटके में मारना बेवकूफी होती। ये दोनों पूरे नेटवर्क की धड़कन थे। फैसला हुआ कि कोई फौजी अंडरकवर बनकर जाए, दोस्त बनकर जाए, पहले सारी जानकारी निकाले, फिर वार करे।
ये खतरनाक से भी खतरनाक काम था – यों कहें तो मौत के मुँह में जाकर मौत देना था। इस मौत के मुँह में जाने वाले काम के लिए मेजर मोहित शर्मा ने कहा – इसे मैं संभालूँगा।

मोहित ने उर्दू सीखी, कश्मीरी भाषा सीखी, दाढ़ी-बाल बढ़ाए और अपनी चाल-ढाल, बोलने का तरीका इतना परफेक्ट कर लिया कि मोहित के चलने से भी लगता था जैसे कोई लोकल कश्मीरी मुसलमान हो। फिर अपना नाम मोहित शर्मा से बदलकर रखा – “इफ्तिकार भट्ट”।

मोहित शर्मा ने एक कहानी गढ़ी कि भारतीय फौज ने उसके भाइयों को मार दिया है और वह अब भारतीय फौज से बदला लेना चाहता है।
एक आर्मी चेकपोस्ट पर हमले का परफेक्ट प्लान बनाकर दिखाया – लोकेशन, सैनिकों की संख्या, हथियार, सब सटीक।

दोनों आतंकी दंग रह गए और उन्हें विश्वास हो गया। यहीं से असली खेल शुरू हुआ।
मोहित शर्मा, जो अब इफ्तिकार भट्ट थे, उन आतंकवादियों के साथ उनके घर में 2 हफ्ते तक रहे, उनके घर में सोए, उनकी रसोई में खाना खाया, हँसी-मजाक किया, उनके हथियारों के अड्डे, सारे गुप्त ठिकाने पता कर लिए।
और अब एक दिन आया जब पाकिस्तान से तीन और आतंकवादी आने वाले थे। श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर बर्फीली पहाड़ी पर लकड़ी का घर। मोहित किचन में चाय बना रहे थे, तभी अबू तोरारा और अबू सबजार ने आखिरी टेस्ट लिया। सबजार ने मोहित शर्मा पर AK-47 तान दी। तोरारा गरजा – आखिरी बार पूछ रहा हूँ इफ्तिकार, बता दे तू कौन है रे?

मोहित ने शालीनता से सिर नीचे किया – भाईजान, मैंने तो आपको सब बता दिया। अगर आपको फिर भी शक है तो आप गोली मार दो।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। सबजार ने बंदूक नीचे रख दी और चाय पीने आगे बढ़ा। जैसे ही उनकी पीठ इफ्तिकार भट्ट यानी मोहित शर्मा की तरफ हुई, मोहित ने अपनी शॉल हटाई, पिस्तौल निकाली, लोड की। जैसे ही पिस्तौल की क्लिक की आवाज हुई और दोनों आतंकी मोहित की तरफ मुड़े, तब तक बिजली की गति से मोहित ने दो गोलियाँ दोनों आतंकियों के सीने में उतार दीं। गोलियाँ छाती को चीरती हुई निकल गईं।

 

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