Friday, April 3, 2026
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गांधी वध दिवस-30 जनवरी,जानिए क्यों गोडसे ने गांधी को गोली मारी,5 कारण

1/गांधी ने कसम खाई थी कि देश का बंटवारा मेरी लाश पर होगा,पर मीटिंग में मुंह नही खोला,
2/हिंदुओं की हत्याओं पर चुप्पी साधे रहे,
3/हिंदुओं से कहा यदि मुसलमान मारें तो चुपचाप मार जाओ,
4/ बंटवारे में सेना नही लगने दी,नतीजन जमकर खून खराबा हुआ,
5/जो ट्रेन पाकिस्तान से आ रही थीं वो हिंदुओं,सिखों की लाशों से भरी हुई थी,

महात्मा गांधी की हत्यारे नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई थी। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी के सीने पर तीन गोलियां दागकर उनकी हत्या की थी। पर हत्या करने और हत्यारे की फांसी हो जाने तक के पूरे अंसिडेंट के बाद एक सवाल जोर पकड़ता है कि आखिर क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी,  इसके लिए गोडसे के पास कौन सी बड़ी और असली वजह थी। चलिए इसके बारे में ही विस्तार से जानते हैं… क्या आपको पता है कि गोडसे के पहले प्रेरणास्रोत गांधी ही थे इस तरह की बातें सामने आती रही हैं। पर फिर गांधी के प्रति ये समर्थन धीरे धीरे नफरत में तब्दील हो गया। नाथूराम गोडसे 1910 में 19 मई महाराष्ट्र के पुणे के पास ही स्थित बारामती में पैदा हुए जो कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए कट्टर हिन्दू समर्थक था। पहली बार गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन की वजह से जब गोडसे जेल गए तो वहीं से नाथूराम के मन में गांधी के लिए नफरत के भाव उभर आए। कई ऐसे पल भी आए जब यह नफरत और बढ़ता गया और फिर 1937 में वीर सावरकर को गोडसे ने अपना गुरु माना। देश के बंटवारे से गोडसे हिल चुका था। उसके अंतिम बयान से तो ऐसा ही लगता है। दरअसल, कहते हैं कि देश के बंटवारे से गोडसे distressed था। बंटवारे की वजह से उसके मन में गांधी के लिए नफरत और बढ़ गयी। फिर जुलाई 1947 को तो गोडसे, उसके साथियों और एक एक हिंदूवादी नेताओं ने तो इसके लिए  शोक दिवस तक मना डाला। ऐसा इस वजह से क्योंकि तमाम संगठनों के साथ ही गोडसे मानता था कि भारत के बंटवारे और तब जो साम्प्रदायिक हिंसा हुई उसमें लाखों हिन्‍दुओं के मारे जाने के जिम्मेदार महात्मा गांधी हैं। ऐसे में उन लोगों ने गांधी की हत्या की पूरी प्लानिंग की और दिल्ली के बिड़ला भवन में जब प्रार्थना सभा खत्म हुई तो महात्मा गांधी बाहर निकलने लगे और इसी दौरान उनके पैर छूने का बहाना करते हुए गोडसे झुका और  बैरेटा पिस्तौल से उनको तीन गोलियां दाग दीं। फिर चौथी गोली नारायण दत्तात्रेय आप्टे ने दागी जो गोडसे के साथी थे, जिसके बाद गांधी जी की जान चली गयी और जिन्होंने गोलियां चलाई वो वहीं खड़े रहे। तत्काल पुलिस ने गोडसे और आप्टे को धर लिया। मुकदमा चलाने के बाद साल 1949 के 15 नवंबर को अंबाला जेल में फांसी की सजा दोनों ही अपराधियों को दे दी गयी। कहते हैं कि गोडसे को बकौल, डोमिनिक लॉपियर इसके अलावा लैरी कॉलिन्स, पेरी मेसन की जासूसी कहानियां पढ़ने का शौक था। वो बहादुरी के कारनामों पर बेस्ड फिल्में देखा करता था।.

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष- 30 जनवरी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है। हर साल इस मौके पर महात्मा गांधी के साथ-साथ देश के लिए अपना बलिदान देने वाले अन्य शहीदों को भी याद किया जाता है।
1948 में जब नाथूराम गोडसे द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की गई, उन लम्हों की एकमात्र गूंज इतिहास में आज भी सुनाई देती है, जो कहती है… हे राम। यही वे आखिरी शब्द थे, जब गोली लगने के संसाद से अंतिम विदाई के पहले गांधी जी के मुख से निकले थे।

उस वक्त शाम के 5.17 बज रहे थे, जब सफेद धोती पहने गांधीजी पर तीन बार गोलियां दागी गईं। गोडसे ने बापू के साथ खड़ी महिला को हटाया और अपनी सेमी ऑटोमेटिक पिस्टल से एक बाद के एक तीन गोली मारकर उनकी हत्‍या कर दी।

 

आश्चर्य यह था कि इस बात का एहसास भी आसपास के लोगों को नहीं था। उन्हें गोली लगने का पता तब चला, जब उनकी सफेद धोती पर खून के धब्बे नजर आने लगे।

 

पहली गोली- बापू के शरीर के दो हिस्सों को जोडने वाली मघ्य रेखा से साढ़े तीन इंच दाईं तरफ व नाभि से ढाई इंच ऊपर पेट में घुसी और पीठ को चीरते हुए निकल गई। गोली लगते ही बापू का कदम बढ़ाने को उठा पैर थम गया, लेकिन वे खड़े रहे।

 

दूसरी गोली- उसी रेखा से एक इंच दाईं तरफ पसलियों के बीच होकर घुसी और पीठ को चीरते हुए निकल गई। गोली लगते ही बापू का सफेद वस्त्र रक्तरंजित हो गया। उनका चेहरा सफेद पड़ गया और वंदन के लिए जुड़े हाथ अलग हो गए। क्षण भर वे अपनी सहयोगी आभा के कंधे पर अटके रहे। उनके मुंह से शब्द निकला हे राम।

 

तीसरी गोली- सीने में दाईं तरफ मध्य रेखा से चार इंच दाईं ओर लगी और फेफड़े में जा घुसी। आभा और मनु ने गांधीजी का सिर अपने हाथ पर टिकाया। इस गोली के चलते ही बापू का शरीर ढेर होकर धरती पर गिर गया, चश्मा निकल गया और पैर से चप्पल भी।

 

कई लोग उस वक्तत यह जान ही नहीं पाए कि हुआ क्या, लेकिन जब देखा, खून से लतपत बापू जमीन पर पड़े हैं, तो आंसुओं की मानो बाढ़ आ गई।

 

आंधी आंखें खुली हुई थीं उन्हें बिरला भवन स्थित उनके खंड में ले जाया गया। आंखें आधी खुली हुई थीं। लग रहा था शरीर में अभी जान बची है। कुछ देर पहले ही बापू के पास से उठ कर गए सरदार पटेल तुरंत वापस आए। उन्होंने बापू की नाड़ी देखी। उन्हें लगा कि नाड़ी मंद गति से चल रही है। इसी बीच वहां हाजिर डॉ. द्वारकाप्रसाद भार्गव पहुंचे।

 

गोली लगने के दस मिनट बाद पहुंचे डॉ. भार्गव ने कहा, ‘बापू को छोड़ कर गए दस मिनट हो चुके हैं।’ कुछ देर बाद डॉ. जीवराज मेहता आए और उन्होंने बापू की मृत्यु की पुष्टि की। इसके बाद गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया।

 

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