राहुल गाँधी आजकल मैनुफैक्चरिंग पर बहुत अधिक बल दे रहे हैं। जर्मनी में जा कर बोल रहे हैं। मुरादाबाद, बरेली से ले कर सीवान तक में मेड इन स्कोडा, मेड इन लहसुन जा कर बोल चुके हैं।
आज मैं एक पॉडकास्ट एवम् फैक्ट्री विजिट हेतु एक मोबाइल फोन मैनुफैक्चरिंग प्लांट के कर्ता-धर्ता से मिला। मेरा यह प्रश्न था कि चीन इतना आगे कैसे निकला कि हमारे फोन का 70-80% हमें चीन-ताइवान से ही लेना पड़ रहा है?
उत्तर सुन कर मैं दंग रह गया। कॉन्ग्रेस की गुजराल सरकार ने 1997 में WTO में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसे ITA (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी अग्रीमेंट) कहा गया जो बाद में ITA-1 कहा जाने लगा। इस बहुपक्षीय समझौते में कॉन्ग्रेस ने जो किया उसने वस्तुतः भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैनुफैक्चरिंग की बैंड बजा दी।
इसमें तय हुआ कि भारत पर फिनिश्ड प्रोडक्ट्स को तो शून्य कर पर इम्पोर्ट कर सकता है, पर उसी प्रोडक्ट को बनाने के लिए जो पुर्जे लगते हैं, उस पर बहुत ड्यूटी लगती थी। इसे ‘इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर’ कहा जाता है।
इस समझौते ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन पर एक अनकहा प्रतिबंध लगा दिया। अब यहाँ वही कंपनियाँ कुछ बना सकती थीं जिनके पास इतने पैसे हों और वो लाभ के मार्जिन में ड्यूटी कॉस्ट जोड़ कर उनके साथ कम्पीट करे जो जीरो ड्यूटी पर प्रोडक्ट इम्पोर्ट करते थे।
इस अग्रीमेंट का दूसरा भाग, ITA-2 2015 में पुनः नए प्रोडक्ट्स को जोड़ने के प्रावधान के साथ आया तब जा कर भारत ने उसे निरस्त किया। तब तक के दो दशकों में चीन ने चीप उत्पाद बनाने से आरंभ कर, आज दुनिया के बेस्ट उत्पाद बनाने में महारत पा ली है। भारत उसे ही इम्पोर्ट करता रहा, उसके ग्रोथ का इंजन बनता रहा।
इस पापी @INCIndia और @RahulGandhi को बताना चाहिए कि चीन की गोद में बैठ कर किए गए निर्णयों ने जो इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर इकोसिस्टम को बनने से पहले ही तबाह कर दिया, उसका उत्तरदायी कौन है?
आगे से राहुल गाँधी जब बकलोली करे, तो टीवी डिबेट में पूछा जाना चाहिए कि चीन के लिए परपसफुली अपने देश के उद्योगों को किसने बर्बाद किया?
आज ट्रम्प और WTO पुनः भारत को वैसे ही समझौते की ओर ले जाना चाहते हैं जहाँ भारतीय उत्पाद बनाना-बेचना महँगा हो जाए, विदेशी इम्पोर्ट सस्ता। यहीं @narendramodi द टफ नेगोशिएटर की भूमिका में दिखते हैं जो सोरोस के चेलों को पचता नहीं।






