जर्मन अख़बार FAZ के दावे ने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है। डोनाल्ड ट्रंप ने बीते कुछ हफ़्तों में कम से कम चार बार प्रधानमंत्री मोदी से संपर्क साधा, लेकिन हर बार उन्हें निराशा हाथ लगी। यह वाकया ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका ने भारत पर 50% तक टैरिफ़ बढ़ाकर सीधा दबाव बनाने की कोशिश की, और भारत ने इसके जवाब में रूस से तेल खरीदने के अपने निर्णय पर कोई समझौता करने से इनकार कर दिया।
भारत का यह रुख संकेत देता है कि उसकी विदेश नीति अब किसी भी एक ध्रुवीय दबाव से प्रभावित नहीं होती। G7 समिट के बाद मोदी का ट्रंप को दिए गए साफ़ संदेश कि “भारत कोई मध्यस्थ स्वीकार नहीं करता, न पहले कभी की, न आगे करेगा”, स्पष्ट करता है कि भारत अपनी संप्रभुता पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगा।
आगे की राह दो दिशाओं में बंटती दिख रही है:
1. यदि ट्रंप अपने टैरिफ़ फैसले पर अड़े रहते हैं तो भारत, QUAD से दूरी बनाकर BRICS जैसे वैकल्पिक गठबंधनों में और गहराई से जुड़ सकता है।
2. यदि अमेरिका घरेलू दबाव के चलते पीछे हटता है तो दोनों देशों के बीच सहयोग की गुंजाइश बनी रह सकती है।
लेकिन ट्रम्प ये समझ लें कि आज की दुनिया समझ चुकी है कि भारत अब ‘आयात-निर्भर गुलाम अर्थव्यवस्था’ नहीं है। कांग्रेस के 60-65 साल के शासन ने जरूर भारत को दूसरों पर निर्भर बनाया, ताकि बैठे-बैठे आयात में भी कमीशन खाया जा सके। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। राजस्थान, यूपी, एमपी, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश… हर राज्य में चिंता है कि निर्यात पर भारी असर पड़ेगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या भारत अमेरिका के आगे हाथ जोड़ दे? बिलकुल नहीं।
अब वक्त आ गया है कि भारत अपनी ताक़त से नए बाजार बनाए, आत्मनिर्भर बने और दुनिया को स्पष्टता से बता दे कि भारत किसी के रहमो-करम पर चलने वाला देश नहीं। यह घटनाक्रम बताता है कि वैश्विक राजनीति अब बदल रही है। भारत ‘सहज साझेदार’ नहीं बल्कि ‘रणनीतिक बराबरी’ पर आधारित संबंध चाहता है।






