ईरान-गाजा पर बिलखने वालों को पाकिस्तान की हरकत पर सूँघा साँप: स्वरा से लेकर आरफा अफगनिस्तान पर खामोश, तरुण की हत्या पर भी नहीं फूटा था एक बोल

हमेशा सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किस घटना पर आवाज उठी बल्कि यह भी होता है कि कब-कब खामोशी चुनी गई और यह खामोशी कहीं मूक समर्थन तो नहीं थी। आज के दौर का सबसे बड़ा पाखंड ये ‘चुनी हुई चुप्पियाँ’ ही हैं। आज खामोशी की बात इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पहले ईरान में अस्पताल में हमले पर छाती पीट रहा लेफ्ट-लिबरल गिरोह अफगानिस्तान में अस्पताल पर हमले पर खामोश है। वो हमला पाकिस्तान ने किया है, शायद खामोशी की वजह भी यही है। गाजा में भी यह गिरोह छाती बिलखता नजर आता है।
यह चुप्पी केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। कुछ दिनों पहले दिल्ली में होली पर हिंदू युवक तरुण की हत्या कर दी गई थी, तब इस गिरोह ने सुविधाजनक चुप्पी को चुना। क्यों? क्योंकि हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने की थी। अब जब लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, कई लोग उग्र बयानबाजी कर रहे हैं तो यह गिरोह एक्टिव हो गया है। यह गिरोह अब उस बयानबाजी की आड़ में हिंदुओं पर ही सवाल उठाने लगा है।
अगर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ घटना हो तो यह गिरोह तुरंत एक्टिव हो जाता है। बयान आने लगते हैं, हैशटेग चलने लगते हैं और उसे ट्रेंडिंग टॉपिक बना दिया जाता है लेकिन जब हिंदुओं के खिलाफ हिंसा होती है तो वही चेहरे या तो चुप रहते हैं या फिर मुद्दे को किनारे कर देते हैं। असल में सवाल ये नहीं है कि किसके लिए आवाज उठी बल्कि सवाल ये है कि इस गिरोह की आवाज हर किसी के लिए बराबर क्यों नहीं उठती?
यह गिरोह कई चेहरे, कई रूपों में नजर आता है। खुद को पत्रकार बताने वाली आरफा खानम शेरवानी हों, RJ सायमा हों या स्वरा भास्कर और राजदीप सरदेसाई जैसे लोग हैं। इनका विलाप, इनकी चुप्पी एक तरफा है और यह ‘राजनीतिक लाभ’ और ‘एजेंडे’ से तय होते हैं।
इनके लिए इंसाफ का मतलब सबके लिए एक जैसा नहीं है। ये न्याय को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखते हैं। जब भी इस्लामी कट्टरपंथ का कोई मामला आता है, तो ये एकदम चुप हो जाते हैं लेकिन जैसे ही इन्हें ‘हिंदू विरोध’ का मौका मिलता है, ये तुरंत शोर मचाना शुरू कर देते हैं।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष: एजेंडे के कारण चुप्पी
इन कथित पत्रकारों और एक्टिविस्टों की एक बड़ी खासियत यह है कि जब संघर्ष ‘मुस्लिम बनाम मुस्लिम’ होता है तो इनका ‘मानवाधिकार’ सो जाता है। पिछले काफी समय से पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर युद्ध जैसे हालात हैं, तालिबान और पाकिस्तानी फौज के बीच झड़पें हो रही हैं, मासूम मारे जा रहे हैं। लेकिन आरफा, सायमा, स्वरा या राजदीप ने इस पर कोई बड़ा कैंपेन नहीं चलाया।
इसका कारण साफ है- यहाँ कोई ‘हिंदू’ एंगल नहीं है, यहाँ ‘मोदी विरोध’ की गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही इस्लामिक मुल्क हैं, इसलिए वे समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लेने से उन्हें पब्लिसिटी मिलेगी या उनके एजेंडे को ‘प्रॉफिट’ होगा। जहाँ कट्टरपंथ को ‘विक्टिम कार्ड’ बनाकर पेश नहीं किया जा सकता, वहाँ ये लोग चुप्पी साधे रहते हैं।
ईरान के लिए ‘दिल’ और इजरायल के लिए ‘पत्थर’
पिछले कुछ समय से मिडिल ईस्ट (ईरान, अमेरिका और इजरायल) के बीच जंग जैसे हालात बने हुए हैं। इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का सोशल मीडिया पेज देखें तो ऐसा लगता है जैसे ये पूरी तरह ईरान के साथ खड़े हैं और इजरायल-अमेरिका को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। राजदीप सरदेसाई और आरफा खानम जैसे लोगों के लिए ईरान एक ‘बेचारा’ देश बन गया है।
राजदीप सरदेसाई अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस जंग को पूरी तरह ‘गलत’ और ‘अन्याय’ बताते हैं। उन्होंने तो यहाँ तक पूछ लिया कि ‘क्या इजरायल और अमेरिका मिलकर यह गलत लड़ाई नहीं लड़ रहे?’
लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जब ईरान परमाणु बम बनाने की कोशिश करता है या हमास जैसे उग्रवादी संगठनों को बढ़ावा देता है, तब राजदीप को कुछ भी ‘गलत’ नजर नहीं आता। उनकी चिंता और उनके ट्वीट केवल तब जागते हैं, जब उन्हें मिडिल ईस्ट के बहाने भारत सरकार पर निशाना साधने का मौका मिलता है।
आरफा खानम तो खुलेआम ईरान को ‘पूरी मुस्लिम दुनिया का सबसे बड़ा नेता’ बताने में जुट गई हैं। उन्होंने लिखा कि ‘यह समय ईरान का है और आज उसे जो सपोर्ट मिल रहा है, उसने उसे निर्विवाद लीडर बना दिया है।’ हैरानी की बात यह है कि आरफा ईरान की गुंडागर्दी और वहाँ की महिलाओं पर हो रहे जुल्मों को तो छिपा जाती हैं, लेकिन जैसे ही इजरायल कोई कदम उठाता है, वह उसे ‘बच्चों का कातिल’ बताने लगती हैं।
वहीं, एक वीडियो में जब उत्तम नगर के एक दुकानदार से तरुण मामले पर सवाल हुआ, तो उसने इसे ‘स्मॉल केस’ बताया। आरफा ने तरुण की मौत पर दुख जताने के बजाय हिंदुओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
सबसे बड़ी विडंबना तो देखिए, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान आपस में लड़ते हैं, तब ये सारे पत्रकार एकदम चुप हो जाते हैं। वजह साफ है, वहाँ दोनों तरफ मुस्लिम मुल्क हैं, इसलिए इसलिए वहाँ ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने या ‘हिंदू-मुस्लिम’ विवाद पैदा करने का कोई मौका नहीं मिलता। ये समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लें जिससे उन्हें फायदा या पब्लिसिटी मिले। जहाँ राजनीति करने का मौका नहीं मिलता, वहाँ इनका दर्द भी गायब हो जाता है।
तरुण की हत्या पर सन्नाटा, लेकिन ईद पर ‘होली’ के नाम पर बवाल
दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुण की सरेआम और बहुत बेरहमी से हत्या कर दी गई। कैमरे की फुटेज में साफ दिख रहा था कि उसे कितनी क्रूरता से मारा गया, लेकिन खुद को ‘इंसानियत का रखवाला’ कहने वाले इन पत्रकारों ने तरुण के लिए एक ट्वीट तक नहीं किया। हैरानी की बात तो यह है कि जब प्रशासन ने कानून के तहत हत्यारों के घरों पर बुलडोजर चलाया, तब इन लोगों को अचानक ‘कानून और दर्द’ की याद आने लगी और वे उसके खिलाफ बोलने लगे।
आरजे सायमा ने तो तरुण की मौत पर दुख जताना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बजाय उन्होंने सोशल मीडिया से वो वीडियो ढूँढ निकाले जिनमें कुछ लोग गुस्से में ‘ईद’ को लेकर बयानबाजी कर रहे थे। उन्होंने फौरन दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय को टैग करना शुरू कर दिया और लिखा कि ‘ईद पर कुछ भी गलत हुआ तो यह सिस्टम की हार होगी।’ सायमा का पूरा ध्यान इस बात पर था कि ‘रिजवान’ नाम का लड़का कहाँ गायब है, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि तरुण के हत्यारों को सजा मिले या नहीं। उन्होंने तो उन पोस्ट्स को भी सपोर्ट किया जो हत्यारों का बचाव कर रहे थे।
वहीं आरफा खानम ने तरुण की मौत के बाद लोगों के गुस्से वाले एक वीडियो को शेयर करते हुए ताना मारा कि ‘मुबारक हो! भारत के हिंदू अब पूरी तरह कट्टरपंथी बन चुके हैं।’ आरफा को उस वीडियो में बोल रहे बच्चे के भविष्य की तो बहुत चिंता हुई, लेकिन उन्हें उस तरुण की कोई फिक्र नहीं थी जिसका भविष्य कट्टरपंथियों ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया। ऐसा लगता है कि इनके लिए ‘आजाद ख्याल’ होने का मतलब सिर्फ हिंदू समाज को बुरा-भला कहना और दूसरी तरफ की कट्टरपंथियों की गलतियों पर पर्दा डालना ही रह गया है।
स्वरा भास्कर: चुनिंदा सहानुभूति की ‘क्वीन’
एक्ट्रेस से समाज सेवा (एक्टिविस्ट) की ओर मुड़ीं स्वरा भास्कर का सोशल मीडिया पेज किसी ‘एजेंडा मशीन’ की तरह काम करता है। दिल्ली के उत्तम नगर मामले में उन्होंने तरुण की मौत को नाम मात्र के लिए ‘दुखद’ तो कहा, लेकिन तुरंत सारा दोष हिंदुओं पर मढ़ दिया और उन पर ‘नफरत फैलाने’ का आरोप लगा दिया। उन्होंने पुराने मामलों का नाम लेकर डराना शुरू कर दिया कि अब दंगे हो सकते हैं, जबकि उन्हें उस हिंदू लड़के (तरुण) की हत्या करने वालों के खिलाफ सख्त लहजे में कुछ भी कहते नहीं देखा गया।
स्वरा ने इजरायल की सेना पर लगे आरोपों की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट शेयर की और गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके नफरत फैलाने की कोशिश की। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब ईरान में सरेआम महिलाओं को फाँसी दी जाती है या हिजाब न पहनने पर उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है, तब स्वरा की ‘महिला सुरक्षा’ वाली बातें कहीं गायब हो जाती हैं। वहाँ हो रहे जुल्म पर उन्हें ‘सांप सूंघ जाता है’ और वह पूरी तरह खामोश रहती हैं।
स्वरा का दोहरापन तब और भी साफ दिखा जब आगरा के आदर्श कुमार की गिरफ्तारी हुई। उन्होंने तुरंत उसे उसके ‘हिंदू धर्म’ से जोड़ दिया और तंज कसा कि ‘कोई उसके धर्म को बुरा नहीं कहेगा क्योंकि वह मुस्लिम नहीं है।’ लेकिन जब भी किसी मुस्लिम अपराधी का नाम सामने आता है, तो वह उसे ‘गरीबी’ या ‘पैसों का आपसी विवाद’ बताकर बचाने की कोशिश करने लगती हैं। चाहे वह नूँह की घटना हो या कोई और मामला, उनके ट्वीट सिर्फ यह साबित करने के लिए होते हैं कि भारत में एक खास धर्म के लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, जबकि वह दूसरे पक्ष के पीड़ितों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती हैं।
लॉरा लुमर का जवाब और आरफा की तिलमिलाहट
अभी हाल ही में जब विदेशी पत्रकार लॉरा लुमर ने राजदीप सरदेसाई को टोकते हुए साफ कह दिया कि ‘इस्लाम से डरना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक हकीकत है और इसे गलत कहना बेवकूफी है,’ तो यह सुनकर आरफा खानम आगबबूला हो गईं। आरफा ने फौरन उनके खिलाफ पोस्ट किया और लिखा कि ‘भारत कभी हिंदू राष्ट्र नहीं था और न ही कभी बनेगा।’ उन्होंने तो उस न्यूज चैनल (इंडिया टुडे) की भी जमकर बुराई की जिसने लॉरा को बोलने का मौका दिया था।
यह बात साफ तौर पर दिखाती है कि ये लोग अपने से अलग राय रखने वालों को बिल्कुल भी झेल नहीं पाते। इनके लिए ‘लोकतंत्र’ और ‘अपनी बात कहने की आजादी’ का मतलब सिर्फ तब तक है, जब तक सब इनके हिसाब से बोलें। जैसे ही कोई इनके एजेंडे के खिलाफ सच बोल देता है, ये उसे दबाने और चुप कराने की कोशिश में जुट जाते हैं।
सुनील शेट्टी बनाम बॉलीवुड का सन्नाटा
जहाँ स्वरा और आरफा, सायमा, जैसे लोग गाजा और ईरान के लिए रोते हैं, वहीं बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी ने एक अलग स्टैंड लिया। उन्होंने काबुल में हमले पर लिखा, “जो काबुल में हुआ वह विनाशकारी है। सभी युद्ध रुकने चाहिए। हम मानवता के साथ खड़े हैं। भारत शांति के साथ खड़ा है”
सुनील शेट्टी का यह पोस्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जहाँ स्वरा भास्कर और उनका गिरोह केवल एकतरफा पोस्ट करता है, वहीं सुनील शेट्टी ने उस अफगानिस्तान के लिए आवाज उठाई है। यह दिखाता है कि बॉलीवुड में भी कुछ लोग सचमुच ‘शांति’ चाहते हैं, जबकि स्वरा जैसे ‘इडियट्स’ केवल सिलेक्टिव आउटरेज (चुनिंदा नाराजगी) के भूखे हैं।
पत्रकारिता के नाम पर समाज के साथ विश्वासघात
इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का पूरा काम ‘चुनिंदा हमदर्दी’ पर टिका है। ये असल में पत्रकार नहीं हैं, बल्कि एक खास सोच को बेचने वाले सेल्समैन की तरह काम करते हैं। राजदीप सरदेसाई के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सरकार का विरोध करना रह गया है, चाहे इसके लिए उन्हें देश की अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों को डराना ही क्यों न पड़े।
आरफा खानम और आरजे सायमा के लिए मानवाधिकारों का मतलब सिर्फ एक खास समुदाय के हितों तक सीमित है। उनके लिए तरुण जैसे हिंदू युवक की जान की कोई कीमत नहीं है, लेकिन अगर मामला ‘रिजवान’ का हो, तो वे पूरा आसमान सिर पर उठा लेते हैं।
वहीं स्वरा भास्कर जैसी हस्तियाँ केवल आग में घी डालने का काम करती हैं। वे हर अपराध को धर्म के चश्मे से देखती हैं और समाज को आपस में बाँटने की कोशिश करती हैं।
इनकी असलियत यह है कि ये एक पूरे सिस्टम (इको-सिस्टम) के इशारे पर चलते हैं। इन्हें ईरान में हो रहे अत्याचारों में ‘बहादुरी’ दिखती है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर हिंदू युवाओं की बेरहमी से हत्या होने पर इन्हें कोई दुख नहीं होता। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ एक छिपी हुई जंग है, जिसका मकसद सिर्फ पब्लिसिटी पाना और विदेशी एजेंडे को बढ़ावा देना है।






