नेहरू की इंटेलिजेंस की अनदेखी से लेकर इंदिरा गाँधी की CIA से जुड़ी दखलअंदाजी तक: निजी फायदे के लिए देश के हितों को बेचने का कॉन्ग्रेस का रहा है इतिहास

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।
केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?
राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।
यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।
उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।
चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू
इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कॉन्ग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।

यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।
इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।

लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कॉन्ग्रेस ने दे दिया
युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कॉन्ग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कॉन्ग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कॉन्ग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।
बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी
भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कॉन्ग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
अगर राहुल गाँधी ‘देश को बेचने’ की बात पर सीरियस हैं, तो उन्हें यह बताना चाहिए कि एक विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसी कथित तौर पर भारत के राजनीतिक नतीजों को प्रभावित करने के लिए उनकी पार्टी को फाइनेंस क्यों कर रही थी। दो सॉवरेन देशों के बीच ट्रेड फ्रेमवर्क पर बातचीत करने के बजाय राष्ट्रीय सॉवरेनिटी से समझौता करने के टेक्स्टबुक केस के ज़्यादा करीब लगता है।
कॉन्ग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’
बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कॉन्ग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कॉन्ग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कॉन्ग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कॉन्ग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।






