शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का कॉन्ग्रेस प्रेम कोई रहस्य नहीं था, खासकर सोनिया गाँधी से उनकी नज़दीकी।
उन्होंने कई बार सोनिया गांधी के पक्ष में खुले बयान दिए थे।
यहां तक की जब कुम्भ स्नान के लिए आये थे तब उन्होंने कहा था कि सोनिया हर तरह से भारतीय है।
वो सोनिया गाँधी को भारत का प्रधानमंत्री बनाये जाने का समर्थन भी करते थे।
वो भाजपा और आरएसएस का विरोध करते थे।
वो राम मंदिर आंदोलन को अ-शास्त्रीय कहते थे।
वो कहते थे कि राम की पूजा भक्ति के चलते नहीं, राजनीती के चलते की जा रही है।
वो संघ के हिन्दुत्व को गैर सनातनी मानते थे और दिग्विजय सिंह को सच्चा सनातनी।
दिग्विजय सिंह उनके परम शिष्य थे।
दिग्विजय सिंह वही है जिन्होंने भगवा आतंकवाद की थ्योरी दी थी।
साल 1980 के आसपास विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत की।
1984 में धर्मसंसद में राम मंदिर निर्माण के लिए वीएचपी ने एक न्यास का गठन किया था, श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति।
इस समय पूज्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी दो पीठ के शंकराचार्य थे, द्वारका शारदा पीठ और ज्योतिष पीठ, लेकिन उन्होंने इस आंदोलन का समर्थन नहीं किया।
1986 में जब फैजाबाद कोर्ट के आदेश से रामलला के ताले खुले तो उन्होंने कहा कि मंदिर शास्त्रसम्मत विधि से बने।
1989 में शिलान्यास होता है तो स्वामी स्वरूपानंद कहते हैं, विवादित भूमि पर शास्त्रों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं होना चाहिए।
इस दौरान वीएचपी लगातार सड़को पर थी, आंदोलन, धर्मसंसद, राजनौतिक और कानूनी प्रयास कर रही थी तब तक स्वामी स्वरूपानंद जी इस आंदोलन से दूरी बनाकर शास्त्र सम्मत आलोचना करते रहे।
फिर आता है साल 1992, बाबरी ढांचे की शहादत हो जाती है। स्वामी स्वरूपानंद ने इसे ‘अधर्म’ कहा।
मामला अब पूरी तरह कोर्ट में चला गया।
मौका भुनाते हुए केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकार ने ‘अयोध्या एक्ट 1993’ बनाया।
इस एक्ट के तहत मंदिर की पूरी जमीन केंद्र सरकार के कंट्रोल में चली गई।
1993 के इसी एक्ट के सेक्शन 6/7के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई कि वह मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दे सकती है, केंद्र सरकार यानि कॉन्ग्रेस।
बस इसी एक्ट के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती यकायक एक्टिव होते हैं और राममंदिर आंदोलन में अप्रत्यक्ष रूप से इंट्री करते हुए वो एक ट्रस्ट बनाते है, ‘श्रीराम जन्मभूमि रामालय न्यास।’
इस न्यास का उद्देश्य था कि मंदिर निर्माण पर न्यास का नियंत्रण रहे, न कि जनता या किसी अन्य संगठन का, मंदिर बने लेकिन संपत्ति और चंदा इसी न्यास के नियंत्रण में रहे और निर्माण प्रक्रिया शास्त्र सम्मत और परंपरा के अनुसार हो।
दावा था कि इस न्यास को चारों शंकराचार्य का समर्थन प्राप्त है लेकिन यह दावा सिर्फ रामालय ट्रस्ट की ओर से था।
उस दौरान दबी जुबान में कहा जाता था कि ये ट्रस्ट, कॉन्ग्रेस, स्वामी स्वरूपानंद और दिग्विजय सिंह की मिलिभगत से बनाया गया था।
अब मंदिर शास्त्र सम्मत विधि से बने, चंदा शास्त्र सम्मत विधि से आये और शास्त्र सम्मत विधि से ही खर्च हो इसके लिए सारा नियंत्रण कॉन्ग्रेस द्वारा नियंत्रित शंकराचार्य के नियंत्रण में रहना जरूरी था।
शंकराचार्य स्वरूपानंद के निधन के बाद आज उनके उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का भी कॉन्ग्रेस प्रेम किसी से छिपा नहीं है।
यानी कॉन्ग्रेस और सोनिया गांधी के प्रति झुकाव गुरु से शिष्य तक चला आ रहा है।
इस बीच सरकार बदली, मोदी आये तो उनके प्रयासों से सुनवाई में तेजी आई।
इस बीच मंदिर पर फैसला टालने की भी कोशिश की गई।
वजह वही थी, मंदिर की संपत्ति पर अधिकार लेकिन घटनाक्रम ऐसा बदला कि सुप्रीम कोर्ट ने नया ट्रस्ट ही बनाने का फैसला दे दिया।
कोर्ट के निर्देश पर केंद्र की मोदी सरकार ने नया ट्रस्ट बनाया, ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ और मंदिर निर्माण का पूरा कंट्रोल कोर्ट द्वारा तय ट्रस्ट को मिल गया।
दिग्विजय सिंह का बिलबिलाता हुआ बयान आया कि मंदिर निर्माण सरकारी या कोर्ट के ट्रस्ट से नहीं, रामालय न्यास से होना चाहिए।
वजह वही थी कि राम मंदिर निर्माण से जुड़ा सारा चंदा, दान और संसाधन रामालय न्यास के हाथ में रहे, फिर पैसा, मंदिर की सम्पत्ति और कंट्रोल कॉन्ग्रेस के पास ही रहता।
लेकिन मोदी सरकार होने से गेम पलट गया।
पैसा हाथ से गया, समानांतर सत्ता खत्म और हिंदुओं के धार्मिक मामलों से कांग्रेस इकोसिस्टम बाहर और तभी से शुरू हुआ मोदी योगी पर हमला।
प्राण-प्रतिष्ठा पर आपत्ति, हर काम में शास्त्र का बहाना, राम मंदिर पर भी नुक्ताचीनी और अब माघ मेले में पहुँच कर अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दर्द राम मंदिर की सम्पत्ति और नियंत्रण रामालय ट्रस्ट के हाथ से निकल जाने का है…
.. और उनका यह दर्द शास्त्र सम्मत है।






