AR रहमान रो रहे हैं। कह रहे हैं कि उन्हें काम नहीं मिल रहा है। पहली बात तो ये कि ऑस्कर विजेता होने के बावजूद आपको काम नहीं मिल रहा है तो आपकी ग़लती है।
दूसरी बात, 2025 में इन्होंने 5 फ़िल्मों में संगीत दिया है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ये 65 फ़िल्मों में संगीत दे चुके हैं, पैंसठ। अब कितना काम करना है भाई? इतने भी लालची मत बनो। फिर भी, अगर इन्हें लगता है कि इन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है तो इसका सबसे बड़ा कारण है तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में अनिरुद्ध रविचंदर के रूप में एक युवा संगीतकार का उद्भव, जो रजनीकांत-अजीत-विजय सहित सभी बड़े एक्शन अभिनेताओं की फ़िल्मों के लिए पहली पसंद बने हुए हैं।
34 वर्षों से लगातार इंडस्ट्री में प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहने के बावजूद शिकायत करने का इतना शौक़ है इन्हें कि हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए तुरंत पक्षपात का आरोप लगा दिया। एक तो इन्होंने ‘छावा’ फ़िल्म में अरबी स्टाइल का संगीत देकर इसके बैकग्राउंड स्कोर को बर्बाद कर दिया, ऊपर से इसी फ़िल्म की बुराई करते हुए इसे विभाजनकारी बता रहे। ये फ़िल्मकारों के लिए भी एक सन्देश है – अपने फ़िल्म से उन्हीं लोगों को जोड़िए जो आपकी कहानी में श्रद्धा रखते हों, उन्हें नहीं जो काम भी ख़राब करें और बाद में गाली भी दें। ‘रामायण’ के निर्माताओं को पुनर्विचार करना चाहिए, रविंद्र जैन जैसा कोई ढूँढिए।
जिस व्यक्ति ने अपना करियर ही आतंकियों के महिमामंडन वाली फ़िल्म से शुरू किया हो, उसे छत्रपति संभाजी महाराज की वीरता और औरंगज़ेब की क्रूरता पर्दे पर दिखाए जाने से समस्या है। वाह! एआर रहमान पहले ये तो बताएँ कि ‘रोज़ा’ में एक खूँखार आतंकवादी थोड़े से ज्ञान से कैसे बदल जाता है? आप भूल गए जब ‘बॉम्बे’ फ़िल्म के ख़िलाफ़ मुस्लिमों ने हिंसक प्रदर्शन करके कई थिएटरों में इसे बंद करवा दिया था और डायरेक्टर के घर पर बम फेंके थे?
कहते हैं, नया-नया मुल्ला ज़्यादा प्याज खाता है, यही हो रहा है रहमान साहब के साथ। एकेडमी-ग्रैमी-बाफ्टा-गोल्डन ग्लोब-फिल्मफेयर-पद्म थोक में जीतने के बावजूद उन्हें कमी लग रही है, इसीलिए सनातन धर्म में संतोष को परम सुख कहा गया है। आख़िर वो ये साबित कैसे करें कि उनके भीतर का ‘दिलीप कुमार राजगोपाल’ मर चुका है, तो चलो ये नरेटिव गढ़ें कि भारत में अब सबकुछ नकारात्मक हो गया है।
वैसे एक तथ्य ये भी है कि 1989 में दिलीप ‘अल्लाह रक्खा’ बन जाते हैं और 1992 में उन्हें मणिरत्नम की फ़िल्म मिल जाती है और उनका करियर बन जाता है।






