Monday, February 2, 2026
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पप्पू मत बनिए,सोनिया गांधी वाला ही काफी है

क्या चाबहार से भारत हो गया है बाहर?

यह शोर पिछले दो-तीन दिन से मचाया जा रहा है…. कि भारत ने अमेरिका के दबाव में इरान में बनाया चाबहार पोर्ट छोड़ दिया है.

राहुल गांधी की तरह ही ‘सरेंडर’ का शोर मचाकर देश को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है…. लोग बिना जानकारी के जज़्बात की रौ में बहे जा रहे हैं… और वैसे भी भारत में Popcorns की कमी कहाँ है?

सच क्या है?

सच यह है कि चाबहार पोर्ट पर भारत ने न तो नियंत्रण छोड़ा है और न ही कोई परियोजना बंद हुई है—यह दावा पूरी तरह निराधार है।

सच्चाई यह है कि US Treasury ने भारत को चाबहार संचालन के लिए प्रतिबंधों से छूट दी है, जो 26 अप्रैल 2026 तक मान्य है… यह छूट पिछले अक्टूबर में दी गई थी.

भारत का इस पोर्ट पर आज भी पूर्ण नियंत्रण बरकरार है और विकास कार्य जारी हैं. हाँ यह भी जोड़ दूँ… कि कल को अमेरिका अगर इरान पर हमला कर दे… तब भारत को temporary तौर पर Operations रोकने पड़ सकते हैं…. क्यूंकि हम अपने लोगों को मरने तो छोड़ेंगे नहीं वहां….. जरूरत पड़ी तो उन्हें rescue करके लाया भी जाएगा.

चाबहार पोर्ट हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है…. क्यूंकि इससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक हमारा रणनीतिक रास्ता सुरक्षित रहता है और पाकिस्तान को बायपास किया जाता है।

2024 में भारत ने ईरान के साथ 10 वर्षीय अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जिसमें इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने 370 मिलियन डॉलर का निवेश करने का वादा किया… और यह investment किया भी गया.

अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने भारत को विशेष छह महीने की छूट दी, जबकि ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध बरकरार हैं… दुनिया में सिर्फ भारत ही ऐसा देश है.. जिसे यह Exemption मिला है…. और वह भी ट्रम्प administration ने दिया है.

चाबहार का महत्व मानवीय सहायता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में है, और इसे 2018 में ट्रंप प्रशासन के दौरान भी मान्यता प्राप्त हुई थी.

चाबहार हिंद महासागर में भारत की पहुंच मजबूत करता है और अफगानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करता है। यह भारत-ईरान आर्थिक संबंधों का प्रतीक है तथा पेट्रोकेमिकल और LNG टर्मिनलों के लिए निवेश के अवसर खोलता है।

अमेरिकी चिंताओं के बावजूद, भारत इसे व्यावसायिक और रणनीतिक दोनों रूप से आवश्यक मानता है।

भारत सरकार इस मुद्दे पर अमेरिका से लगातार बातचीत इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए हो रही है—यही परिपक्व और मजबूत कूटनीति है।

याद कीजिये…. जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा किया था… तब क्या कहा जा रहा था?

सब कह रहे थे कि भारत के 3 बिलियन USD डूब गए.

लेकिन उसके बाद क्या हुआ?

पिछले 3-4 साल में भारत का अफ़ग़ानिस्तान में investment और दखल कई गुणा बढ़ा ही है.

वही इरान में भी होगा.

और यह कोई पहली और आखिरी बार भारत को विशेष Exemptions नहीं मिले हैं.

भारत एकमात्र देश है दुनिया में…जिसे CAATSA, NSG, परमाणु परीक्षण, STA-1 जैसे Exemptions मिले हुए हैं.

आगे भी मिलेंगे….. सब निर्भर करता है negotiations कैसे होते हैं…… सबसे बड़ी बात है कि आज भारत को जितनी जरूरत पश्चिम की है, उससे कहीं ज्यादा उन्हें भारत की जरूरत है…… और इस सच्चाई से मुँह मोडा नहीं जा सकता

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