डीप स्टेट संगठन और साजिशें
अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक डिक्शनरी में एक शब्द तेजी से प्रचलित हुआ है –“डीप स्टेट”।
सामान्य अर्थो में यह वह कभी न दिखाई देने वाले दवाब समूह हैं जो सरकारों की घरेलू नीतियों को ही नहीं बल्कि अपने आर्थिक स्वार्थ व शक्ति के लिये वैदेशिक नीतियों को भी प्रभावित करते हैं।
चूँकि वर्तमान एक ध्रुवीय विश्व में अमेरिका वैश्विक राजनीति का केंद्र है तो जाहिर है ‘अमेरिकी डीप स्टेट’ ही विश्व का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष सत्ता केंद्र है।
परंतु यह कोई वास्तविक संगठन नहीं बल्कि अपने आर्थिक हितो को सर्वोपरि रखने वाले वित्त संस्थानो का समूह है जो लोबीइंग के जरिये अपनी नीतियाँ लागू करने का दवाब डालते हैं जैसे —
1)अमेरिकी हथियार लॉबी
नेशनल राइफल एसोसिएशन और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स जैसे लॉकहीड मार्टिन राजनीति में भारी इन्फ्लुएंस रखते हैं।
2024 के चुनाव में गन राइट्स को प्रमोट करने में में 50 मिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च किए गये।
2023 में इस लॉबी ने कई अतिवादी ग्रुपों और संगठनों को भारी फंडिंग दी।
2) मेडिसिन लॉबी या फार्मा इंडस्ट्री:-
फार्मा कंपनियां जैसे फाइजर, जॉनसन & जॉनसन सालाना 300 मिलियन डॉलर से ज्यादा लॉबिंग पर खर्च करती हैं, जो दवा कीमतों को ऊँचा रखने में मदद करता है।
केवल यही नहीं लॉबीइंग की प्रक्रिया में इन्होंने मानवता विरोधी कार्य भी किये जो कई स्कैन्डल्स के रूप में सामने आये जैसे– -ओपिओइड क्राइसिस, जहां Purdue Pharma ने 1990s-2000s में आक्रामक मार्केटिंग से लाखों एडिक्शन पैदा किए।
-FDA अप्रूवल्स में भी फेल्योर्स जैसे OxyContin को ‘नॉन-एडिक्टिव’ बताना।
-‘वैक्सीन कंट्रोल’ करने की कोशिश।
3) पेप्सी और कोकाकोला
ये सॉफ्ट ड्रिंक जायंट्स हेल्थ पॉलिसीज़ पर लॉबिंग करते हैं उदाहरण के लिये-
-2011-2015 में कोका-कोला ने $ सोडा टैक्स के खिलाफ 30 मिलियन डॉलर खर्च किए।
वे हेल्थ ग्रुप्स को दान देते हैं, जैसे $10 मिलियन पब्लिक हेल्थ को लेकिन उसी समय वह जनकल्याणकारी व स्वास्थ्य बिल्स के खिलाफ लॉबिंग करते हैं जैसे कि बिग टोबैको जैसी टैक्टिक्स।
ये घटनाएं साफ-साफ इशारा करती हैं कि कॉर्पोरेट लॉबिंग के जरिए राजनीति को प्रभावित करते हैं जिसमें अमेरिका में लगभग 3 बिलियन डॉलर सालाना खर्च होता है।
अब सोचिये कि ये कारपोरेट अमेरिका तक में लॉबिंग के जरिए नीतियां प्रभावित करते हैं, तो विदेशी बाजारों में अपने आर्थिक हितों के लिए ऐसा क्यों न करेंगे ?
घाना के पूर्व राष्ट्रपति क्वामे नक्रुमाह ने 1965 में अपनी किताब Neo-Colonialism: The Last Stage of Imperialism में इसे ‘अदृश्य साम्राज्यवाद’ कहा—जहां कंपनियां सरकारों को ‘पिम्पल’ की तरह इस्तेमाल करती हैं।
अब IMF/World Bank जैसे संस्थान कर्ज देते हैं, लेकिन शर्तें लगाते हैं जैसे बाजार उदारीकरण, जो बहुराष्ट्रीय कारपोरेट्स को फायदा पहुंचाती हैं।
अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) सरकारों के ‘माध्यम’ या ‘प्रॉक्सी’ की तरह काम करती हैं। यह वैश्वीकरण और पूंजीवाद का सिस्टमिक परिणाम है, जहां कंपनियां कानूनी लॉबिंग, निवेश, या दबाव के जरिए प्रभाव डालती हैं।
अमेरिका में घरेलू लॉबिंग से लेकर विदेशों में FDI के जरिए और अधिकतर राजनेताओं व प्रभावी संस्थाओं को चंदे के नाम पर रिश्वत देकर, ये अपनी नीतियाँ लागू करवाते हैं। WTO के नियम भी MNCs को ही फायदा देते हैं। उदाहरण के लिये —
A)अफ्रीका में तेल कंपनियां
शेल और एक्सॉनमोबिल जैसी कंपनियां नाइजीरिया और इक्वेटोरियल गिनी में दशकों से सक्रिय हैं। नाइजीरिया के ओगोनी क्षेत्र में शेल के ऑयल ड्रिलिंग से पर्यावरण तबाह हुआ, लेकिन कंपनी ने स्थानीय सरकार को रिश्वत देकर बच निकली। 2019 में शेल ने111 मिलियन डॉलर का सेटलमेंट किया प्रदूषण के लिए, लेकिन प्रभाव बरकरार है—यह ‘कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद’ का क्लासिक उदाहरण है।
इसी तरह, इक्वेटोरियल गिनी में तेल राजस्व का 90% विदेशी कंपनियों को जाता है, जबकि स्थानीय गरीबी बनी रहती है।
B)अफ्रीका में खनन और कृषि में शोषण:
कांगो में चाइनीज/अमेरिकी माइनिंग कंपनियां (जैसे Freeport-McMoRan) बैटरी के लिए कोबाल्ट निकालती हैं, लेकिन मजदूरों को न्यूनतम मजूरी और बाल श्रम का सामना करना पड़ता है।
C)अफ्रीका में MNCs ऊर्जा, टेलीकॉम और कृषि पर हावी हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को ‘कॉर्पोरेट उपनिवेश’ में बदल देती हैं।आज भी, मोन्सैंटो (Bayer) जैसी कंपनियां अफ्रीकी किसानों को GMO बीज बेचकर निर्भर बनाती हैं।
D) वेस्टर्न बैंक जैसे जे पी मॉर्गन विकासशील देशों को कर्ज देते हैं, लेकिन ब्याज दरें ऊंची रखकर नियंत्रण बनाए रखते हैं। ब्राजील में विदेशी कंपनियों के अधिग्रहण (acquisitions) ने स्थानीय उद्योगों को नियो-कॉलोनियल ‘शोषण’ में बदल दिया।
स्वतंत्रता के बाद भी, विकसित देशों की कंपनियां आर्थिक दबाव, कर्ज, या लॉबिंग के जरिए नियंत्रण बनाए रखती हैं।
कॉर्पोरेट्स कंपनियां विदेशों में लॉबिंग, निवेश, या राजनीतिक दबाव से अपने हित साधते हैं और अगर लॉबीइंग फेल हो जाती है तो ये वैश्विक कॉर्पोरेशन्स अब ‘राज्यों की संप्रभुता को चुनौती’ देने में नहीं हिचकिचाते।
यहां कुछ हाल के क्लासिक केस:
1)लैटिन अमेरिका में, यूनाइटेड फ्रूट कंपनी (अब Chiquita) ने 1950s में ग्वाटेमाला सरकार को गिराने में CIA के साथ मिलकर कॉर्पोरेट हितों के लिए उन्हें ‘बनाना रिपब्लिक’ बना दिया।
2) यूक्रेन-रूस युद्ध मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स का हिस्सा लगता है, जहां अमेरिकी कारपोरेट युद्ध को लंबा खींचकर मार्केट एक्सेस पाते हैं। एक ओर अपार हथियार सप्लाई करके अमेरिकी हथियार लॉबी यूक्रेन को दी जा रही युरोपीय मदद को चाँप लेती है, वहीं यूक्रेन को कर्जदार भी बनाया जा रहा है ताकि उस कर्ज वसूली के लिये यूक्रेन के रेयर अर्थ मिनरल्स पर कब्जा किया जा सके। केवल यही नहीं रूस की आर्थिक रीढ़ अर्थात तेल व गैस सप्लाई (जो उसकी GDP का 40% है, को गिराने के लिये ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के लिये अमेरिका के एनर्जी सेक्टर के TNCs जैसे ‘शेल’, ‘एक्सॉनमोबिल’ और ‘BP’ ने रूस से बाहर यूक्रेन में निवेश बढ़ाया। उदाहरण: 2025 में US-यूक्रेन इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट के तहत अमेरिकी TNCs जैसे चेवरॉन, यूक्रेन के एनर्जी रिकंस्ट्रक्शन में 10 बिलियन+ डॉलर निवेश करने को तैयार हैं, जो ‘रूसी प्रभाव’ से बचाने का बहाना बनता है।
3). बांग्लादेश में सत्तापलट (2024)
अगस्त 2024 में शेख हसीना का पतन आरक्षण विरोधी आंदोलन से हुआ, जिसमें 300+ मौतें हुईं। USAID द्वारा छात्र आंदोलन को फंडिंग और शेख हसीना के अमेरिका पर सीधे आरोप इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। कारण था चीन व भारत का निवेश, अमेरिका की उपेक्षा और चीन व भारत पर निगरानी के लिये एक द्वीप की मांग को ठुकराना।
4) भारत में विपक्षी नेताओं को फंडिंग सत्तापलट के लिये 2024-2025 में विदेशी फंडिंग का बड़ा विवाद USAID से जुड़ा हुआ है। ‘वोटर टर्नआउट बूस्ट’ के नाम पर, जिसे ट्रंप ने फरवरी 2025 में कैंसल किया था,21बिलियन डॉलर का फंड जारी किया गया।
कांग्रेस-अलाइंड NGOs जैसे Catholic Relief सर्विसेज को218 मिलियन डॉलर मिले जो कथित तौर पर 2024 लोकसभा चुनावों को ‘इन्फ्लुएंस’ करने की कोशिश कर रही थीं।
5) वेनेजुएला पर आक्रमण : अभी दो दिन पहले ही हुआ आक्रमण स्पष्ट रूप से अमेरिकी तेल लॉबी का दवाब था। अभी या देर से अब वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी कम्पनियों का कब्जा होगा और वह तेल यूरोप को सप्लाई कर न केवल पैसे कमाएंगी बल्कि रूस की अर्थव्यवस्था को तहस नहस करवाएंगी।
नवउपनिवेशवाद के इन तीन कारपोरेट स्तम्भों के साथ तीन अन्य स्तम्भ भी हैं जो प्रायः दिखाई नहीं देते लेकिन उनका प्रभाव सभी को महसूस होता है।
1)मीडिया घराने और मनोरंजन इंडस्ट्री –
यह डीप स्टेट का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जो न केवल सूचनाओं पर नियंत्रण रखता है बल्कि प्रॉपगेंडा , सिनेमा, चित्र आदि के जरिये जनता के अवचेतन में नैरेटिव स्थापित करता है और जनता के ही माध्यम से सरकारों पर दवाब बनवाता है और इस डीप स्टेट के गुलाम राजनेता जनता के दवाब के सामने झुकने का नाटक करते हुए वही नीतियाँ लागू कर देते हैं जो इनके हित में होती हैं। उदाहरण के लिये समुद्र तट पर मरे पड़े मुस्लिम शरणार्थी के बच्चे के जरिये नैरेटिव बनाया गया और यूरोप के नेताओं पर जनता का दवाब बनाया गया कि वे मुस्लिम शरणार्थियों के लिये सीमाएं खोल दें।
यही नहीं वे सारी हदे पार करते हुए पोर्न, सैक्स और हनीट्रैप के जरिये भी प्रभावशाली राजनेताओं व बुद्धिजीवियों को अपनी मुट्ठी में रखते हैं। एप्सटीन फाइल्स उदाहरण हैं जिनके कारण ही सम्भवतः आज ट्रम्प उन्हीं नीतियों पर चल रहे हैं जिनके विरोध में उनका पहला कार्यकाल बीता था।
2)वैटिकन और चर्च : यह डीपस्टेट का वह हथियार है जिसके जरिये वह विभिन्न देशों में फंड पहुंचाते हैं, डेमोग्राफी चेंज कर दवाब समूह बनाते हैं और धार्मिक उत्पीड़न का हवाला देकर सरकारों पर दवाब बनाते हैं।
3)अरबी पैट्रो डॉलर — यह डीप स्टेट का वह हिस्सा है जो सदा छिपा रहता है। तेल में धनी देशों का अधिकांश धन कुछ परिवारों के हाथों में है और उस धन के अधिकांश भाग का निवेश डीप स्टेट की कम्पनियों में होता है जिसके बदले में इन परिवारों को अमेरिका की सुरक्षा की छाया मिलती है। तेल में धनी जिन देशों ने अपना निवेश अपने ही देश में करने की सोची वह किसी न किसी तरह निबटा दिए गये। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी इनके उदाहरण हैं।
अब आप समझ गये होंगे क्यों एक मरे बच्चे की तस्वीर और गाजा में कुछ मौतों से पूरे संसार में ‘पीड़ित मुस्लिम’ का नैरेटिव खड़ा कर दिया जाता है जबकि पाकिस्तान में 9% से घटकर 1% और बांग्लादेश में 28% से 7% रह जाने, सामूहिक रेप, धर्मांतरण और जिंदा जलाये जाते हिंदुओं के विषय में इंटरनेशनल मीडिया में हल्की आहट तक नहीं होती।
इस तरह अमेरिकी हथियार लॉबी +फार्मा लॉबी+ माइनिंग और तेल कम्पनियाँ+कृषि लॉबी+मीडिया घराने +राजनेता +बुद्धिजीवी और बाहरी इन्वेस्टमेंट सदस्यों के रूप में अरब देशों के पैट्रो घराने मिलकर बनाते हैं –‘डीप स्टेट’ जिनका जाल पूरे संसार में बिखरा हुआ है और इसका सबसे बड़ा प्रतीक है अमेरिकी कंपनी ‘पलेन्टिर टेक्नोलॉजी’।
जॉर्ज सोरोस इस डीप स्टेट का छोटा सा ‘कारपोरेट चेहरा’ है ठीक वैसे ही जैसे कभी हेनरी किसिंजर इस डीप स्टेट का ‘राजनयिक
चेहरा’ था।
अंतर इतना आया है कि पहले ‘डीप स्टेट’ के असली कर्णधार ये कारपोरेट खुलकर दिखाई नहीं देते थे और नीति निर्धारण राजनेताओं के हाथ में था क्योंकि एक तो प्रतिरोध के रूप में कम्युनिस्ट क्रांति का डर था जिसका युवाओं में क्रेज था और दूसरे उस समय सारे संचार व प्रचार साधन सरकार के हाथों में थे।
लेकिन अब मीडिया उनके द्वारा ही संचालित है और राजनेता उनकी जेब में तो अब वह खुलकर राजनैतिक खेल भी खेलने लगे हैं।
हिटलर भले राक्षस था लेकिन उसने ‘माइन काम्फ’ में एक बात सटीक कही थी– “जब कारपोरेट राजनीति को नियंत्रित करने लगेंगे, मानवता अंधकार में डूब जायेगी।”
चीन, रूस और भारत, केवल तीन देश हैं जो इस डीप स्टेट के रास्ते की बाधा हैं लेकिन , जैसे-जैसे अन्य देशों के कारपोरेट अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ में शामिल होते जाएंगे वैसे-वैसे मानवता अँधेरे में डूबती जायेगी।






