मुंबई के मझगाँव सिविल कोर्ट में तैनात एडिशनल सेशंस जज एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी पर गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने उन्हें 15 लाख रुपये की रिश्वत मामले में वांटेड घोषित किया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जज एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी फरार चल रहे हैं, जबकि उनके क्लर्क चंद्रकांत वासुदेव को 11 नवंबर 2025 को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया। यह मामला एक पुराने जमीन विवाद से जुड़ा है, जहाँ एक व्यक्ति के पक्ष में फैसला देने के बदले पैसे माँगे गए।
मामला 9 सितंबर 2025 से शुरू हुआ जब जमीन विवाद का केस जज काजी की कोर्ट में सुनवाई के लिए आया। क्लर्क वासुदेव ने शिकायतकर्ता के साथी से कोर्ट के वॉशरूम में संपर्क किया और कहा, “साहब के लिए कुछ करो, फैसला आपके हक में हो जाएगा।” बाद में चेंबूर के एक कैफे में मिलकर पहले 25 लाख माँगे- खुद के लिए 10 लाख और जज के लिए 15 लाख। मोलभाव के बाद रकम 15 लाख पर तय हुई।
शिकायतकर्ता ने 10 नवंबर को ACB से शिकायत की। अगले दिन ट्रैप लगाया गया। क्लर्क कैफे में 15 लाख लेते पकड़ा गया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद ACB के निर्देश पर क्लर्क ने गवाहों के सामने जज काजी को फोन किया। जज ने रकम पर सहमति जताई और पैसे घर लाने को कहा।
इस मामले में कॉल रिकॉर्डिंग और व्हाट्सएप चैट सबूत बने हैं। गिरफ्तार क्लर्क वासुदेव ने पूछताछ में बताया कि जज एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी से उसके बहुत करीबी संबंध हैं, जज ने उसके पारिवारिक मामलों में मदद की थी।
ACB की टीम 12 नवंबर 2025 को जज के घर पहुँची तो ताला लगा मिला। दूसरे जज और पंचों के सामने घर सील किया गया। जज की कॉल डिटेल्स वेरिफाई की जा रही हैं। क्लर्क को 17 नवंबर को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, उसकी जमानत अर्जी 19 नवंबर को सुनवाई होगी।
ACB ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है। जज की जाँच और गिरफ्तारी के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से इजाजत माँगी जा रही है। ACB का कहना है कि जज ने इस रिश्वत रैकेट में सक्रिय भूमिका निभाई। सबूतों में रिश्वत की रकम, मोबाइल, कॉल रिकॉर्डिंग और वीडियो शामिल हैं।
यह अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एएजाजुद्दीन काजी है, जो मुंबई में तैनात हैं।
एक व्यवसायी टोनी (नाम बदला हुआ) ने अपनी पत्नी की जमीन पर अतिक्रमण के मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाया।
मामला न्यायाधीश काजी की अदालत में आया। एक सुनवाई के दौरान, अदालत ने थोड़ा ब्रेक लिया। टोनी शौचालय गए। न्यायाधीश काजी के क्लर्क ने चुपचाप उनका पीछा किया। जब दोनों शौचालय में थे, क्लर्क ने कहा, “जज साहब का थोड़ा ख्याल रख लोगे तो फैसला आपके पक्ष में आएगा।”
टोनी ने पूछा, “मतलब?” “₹25 लाख,” क्लर्क ने जवाब दिया।
टोनी ने मना कर दिया। उस दिन के लिए मामला स्थगित कर दिया गया।
दो दिन बाद, टोनी को एक कॉल आया। वही क्लर्क था: “सोच लो। बाद में मत रोना कि फैसला पक्ष में नहीं आया।” टोनी ने कॉल काट दी। क्लर्क ने कॉल करना जारी रखा, और आखिरकार ₹15 लाख पर सौदा तय हुआ।
तंग आकर टोनी ने भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) से संपर्क किया। उन्होंने टोनी से क्लर्क को कॉल करने और हामी भरने को कहा। टोनी ने ऐसा किया। क्लर्क ने पैसे लेने के लिए एक स्थान तय किया। टोनी पैसे लेकर पहुंचे, और एसीबी उनके पीछे थी। क्लर्क को रंगे हाथ पकड़ लिया गया।
जब क्लर्क से पूछताछ की गई, तो उसने कहा, “मैं जज साहब के कहने पर कर रहा था।” एसीबी ने उसे न्यायाधीश को कॉल करने को कहा। उसने न्यायाधीश काजी को बताया कि पैसे मिल गए हैं। काजी ने कहा, “अच्छा, कल मुझे दे देना।” लेकिन “कल” कभी नहीं आया, क्योंकि क्लर्क अब जेल में था।
न्यायाधीश काजी ने क्लर्क को कॉल और मैसेज करना जारी रखा, शायद यह सोचकर कि क्लर्क पैसे लेकर भाग गया है। एसीबी ने सभी मैसेज पढ़ लिए थे, जो अब ठोस सबूत थे। उन्होंने न्यायाधीश के घर पर छापा मारा। घर बंद था। न्यायाधीश काजी फरार हो गए थे।






