धनबाद जिले के तोपचांची स्थित झारखंड आम्र्ड पुलिस पिकेट पर हमले की साजिश भाकपा माओवादी के पोलित ब्यूरो के सदस्य व एक करोड़ के इनामी प्रशांत बोस उर्फ किशन दा ने रची थी। प्रशांत बोस की इस साजिश को एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा, प्रयाग मांझी, पतिराम मांझी उर्फ अनल दा एवं शीला मरांडी ने मिलकर अंजाम दिया था। प्रशांत बोस एवं उसकी पत्नी शीला मरांडी को पुलिस ने 12 नवंबर को चाईबासा से गिरफ्तार किया था। दोनों होटवार रांची जेल में बंद हैं। बावजूद पुलिस तोपचांची पिकेट हमले को लेकर प्रशांत बोस, मिसिर बेसरा, प्रयाग मांझी, पतिराम मांझी एवं शीला मरांडी पर शिकंजा नहीं कस सकी।
शाली को रिमांड पर लेने में पुलिस ने नहीं दिखाई दिलचस्पी
शीला मरांडी वर्ष 2006 से 2016 तक भी जेल में बंद रही, मगर तोपचांची पिकेट हमले में पुलिस उसे रिमांड पर नहीं ले सकी। जमानत पर जेल से रिहा होने के बाद शीला मरांडी टुंडी के नावाटांड़ स्थित अपने घर पर भी कई महीने तक रही। बाद में वह वापस सारंडा जंगल लौट गई। चार जनवरी को पश्चिमी सिंहभूम के गोईलकरा में मनोहरपुर के पूर्व भाजपा विधायक गुरुचरण नायक पर माओवादियों ने हमला किया था। पूर्व विधायक बाल-बाल बच गए थे, जबकि उनके दो अंगरक्षक शहीद हो गए थे। मिसिर व पतिराम के नेतृत्व में माओवादी उनके हथियार भी लूटकर ले गए थे। एक दिन पूर्व तीन जनवरी को इसी इलाके में मिसिर बेसरा के दस्ते के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई थी।
इस तरह दिया था घटना को अंजाम
31 अक्टूबर, 2001 को जीटी रोड के किनारे तोपचांची प्रखंड कार्यालय परिसर स्थित जैप के पिकेट पर दिन दहाड़े माओवादियों ने हमला कर दिया था। बगल में हटिया लगी थी। सब्जी बेचने के बहाने महिला माओवादी कैंप के अंदर प्रवेश कर गईं। इसके बाद अचानक हमला कर दिया। 12 जवान व एक आम नागरिक को शहीद कर माओवादी पारसनाथ पहाड़ की ओर भाग गए थे। 20 मिनट में माओवादियों ने इस कांड को अंजाम दिया था। पहला मौका था जब माओवादी जंगलों से निकले व इतने बड़े कांड को अंजाम दिया। इस कांड के बाद मिसिर बेसरा, प्रशांत बोस एवं प्रयाग मांझी का संगठन में कद बढ़ गया था।
21 साल गुजर गए
करीब 21 साल बाद भी पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि किसने इस कांड को अंजाम दिया था। दर्जन भर माओवादियों पर इस कांड को लेकर मामला चला। अदालत ने सभी को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। पुलिस इस कांड में प्रशांत बोस के अलावा मिसिर बेसरा एवं प्रयाग मांझी के शामिल होने की बात कहती रही है।
पुलिस का अनुसंधान काफी कमजोर था। अभियोजन पक्ष ने यह तो साबित कर दिया कि घटना घटी है, लेकिन घटना को किसने अंजाम दिया था यह साबित नहीं कर सकी। जिन लोगों को जेल भेजा गया था, सभी निर्दोष थे। गवाह बने पुलिस अधिकारियों ने भी अदालत में अभियुक्तों को नहीं पहचाना।
-विदेश कुमार दा, बचाव पक्ष के अधिवक्ता





